नवजागरण के प्रतीक युवा विवेकानंद | स्वामी विवेकानंद पर निबंध-Swami Vivekananda Essay in Hindi

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नवजागरण के प्रतीक युवा  विवेकानंद| स्वामी विवेकानंद पर निबंध(Symbol of Indian Renaissance Young Vivekanand) 

“यद्यपि विवेकानंद अतीत भारत की नींव पर दृढ़ और परंपरा के प्रति गौरावान्वित रहे हैं, तो भी जीवन की समस्याओं के प्रति उनकी विचारधारा आधुनिक थी। अवसादग्रस्त तथा हतोत्साह हिन्दू मन के लिए वे एक संजीवनी शक्ति के रूप में सामने आए थे और उसमें उन्होंने आत्मविश्वास तथा अतीत पर श्रद्धा का भाव भी पैदा किया।” –पं. जवाहर लाल नेहरू

यकीनन युवा विवेकानंद नवजागरण के प्रतीक थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि युवावस्था मानव जीवन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण काल है। यह वह अवस्था है, जिसमें मानव की अन्तर्निहित शक्तियां विकासोन्मुख होती हैं। हितकर क्रांतियों का मूलस्रोत युवा शक्ति ही होती है। वर्तमान युग में मोहनिद्रा में मग्न हमारी मातृभूमि की दुर्दशा तथा अध्यात्मज्ञान के अभाव से उत्पन्न समग्र मानवजाति के दुख क्लेश को देखकर जब युवा विवेकानंद व्यथित हृदय से इसके प्रतिकार का उपाय सोचने लगे, तो उन्हें यह एहसास हुआ कि हमारे शक्तिमान, बुद्धिमान, पवित्र एवं निःस्वार्थ युवकों द्वारा ही भारत एवं समस्त संसार का पुनरुत्थान होगा। 

नवजागरण के लिए स्वामी विवेकानंद ने युवकों का आह्वान करते हुए युवा अस्मिता को जगाया। उन्होंने युवकों को ललकारा “उठो जागो, तुम्हारी मातृभूमि तुम्हारा बलिदान चाहती है। उठो जागो, सारा संसार तुम्हारा आह्वान कर रहा है।” 

विवेकानंद ने राष्ट्रनिर्माण एवं देश को शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे उत्तम माध्यम युवा शक्ति को ही माना और अपने उपदेशों के माध्यम से युवकों को इस दिशा में प्रेरित भी किया। अपने एक सार्वजनिक भाषण में विवेकानंद जी ने युवकों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करते हुए कहा, “हम सभी लोगों को इस समय कठिन परिश्रम करना होगा। अब सोने का समय नहीं है। हमारे कार्यों पर भारत का भविष्य निर्भर है। भारतमाता तत्परता से प्रतीक्षा कर रही है। वह केवल सो रही थीं। उसे जगाइये और पहले की अपेक्षा और भी गौरवमण्डित और शक्तिशाली बनाकर भक्तिभाव से उसे उसके चिरन्तन सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दीजिए।” 

युवा विवेकानंद ने युवकों को धर्म से जोड़कर धर्म की श्रेष्ठता को भी स्थापित किया। इसे उनके वेदांत दर्शन के नाम से जाना जाता है। गीता में कहा गया है—’स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।’ अर्थात् धर्म का थोड़ा भी कार्य करने पर परिणाम बहुत बड़ा होता है। स्वामीजी गीता की इस उक्ति के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने वेदान्त का उपदेश देकर युवकों को धर्म की महत्ता से परिचित करवाया। उनका मानना था कि हमारी मातृभूमि भारत वर्ष का मेरुदंड धर्म है। धर्म की महत्ता को उन्होंने कुछ इस प्रकार स्थापित किया—’यह कदापि संभव नहीं हो सकता कि यह देश अपने धर्ममय जीवन के विशिष्ट मार्ग को छोड़ सके और अपने लिए राजनीति अथवा अन्य किसी नवीन मार्ग का प्रारंभ कर सके। जिस रास्ते में बाधाएं कम हैं, उसी रास्ते में तुम काम कर सकते हो और भारत के लिए धर्म का मार्ग ही स्वल्पतम बाधा वाला मार्ग है। धर्म के पथ का अनुसरण करना हमारे जीवन का मार्ग है। हमारी उन्नति का मार्ग और हमारे कल्याण का मार्ग भी यही है।’ स्वामीजी धर्म को अस्तित्व के लिए आवश्यक मानते थे और इसीलिए कहा करते थे कि यदि तुम धर्म को त्यागकर राजनीति, समाजनीति अथवा अन्य किसी दूसरी नीति को अपनी जीवन-शक्ति का केन्द्र बनाने में सफल हो जाओ, तो उसका फल यह होगा कि तुम्हारा अस्तित्व तक न रह जाएगा। यदि तुम इससे बचना चाहो तो जीवन-शक्तिरूपी धर्म के बीच से ही तुम्हें अपने सारे कार्य करने होंगे, अपनी प्रत्येक क्रिया का केंद्र इस धर्म को ही बनाना होगा। 

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय युवकों को न सिर्फ धर्म के प्रचार प्रसार के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें दृढ़ इच्छा-शक्ति के प्रभाव से भी अवगत करवाया। उन्होंने मद्रास में दिए अपने एक भाषण में कहा कि मेरा विचार है कि मैं भारत में कुछ ऐसे शिक्षालय स्थापित करूँ, जहां हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान में शिक्षित होकर भारत तथा भारत के बाहर अपने धर्म का प्रचार कर सकें। तेजस्वी, श्रद्धासम्पन्न और दृढ़विश्वासी, निष्कपट नवयुवक मिलकर संसार का कायाकल्प कर सकते हैं। इच्छाशक्ति संसार में सबसे अधिक बलवती है। उसके सामने दुनिया की कोई चीज नहीं ठहर सकती, क्योंकि वह साक्षात् भगवान से आती है। विशुद्ध और दृढ़ इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान नवजागरण के प्रतीक युवा विवेकानंद सहिष्णुता एवं समानता के भी पक्षधर थे। ऊंच-नीच में उनका विश्वास नहीं था। वह सब को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे। समाज सुधार का रास्ता उन्होंने समानता के जरिये भेद-भाव को दूर रखकर सुझाया। यह कार्य बिना भर्त्सना या दबाव के किए जाने को प्रेरित किया। इसके लिए उन्होंने हमें उन मार्गों पर चलने के लिए प्रेरित किया, जो रामानुज, शंकर, नानक, चैतन्य, कबीर और दादू जैसे महान समाज सुधारकों ने दिखाए थे। स्वामीजी समता एवं सहिष्णुतामूलक समाज की पैरोकारी करते हुए कहते हैं—’रामानुज, शंकर, नानक चैतन्य, कबीर और दादू कौन थे? ये सब बड़े-बड़े धर्माचार्य, जो भारत गगन में अत्यंत उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह एक के बाद एक उदित हुए और अस्त हो गये कौन थे? क्या रामानुज के हृदय में नीच जातियों के लिए प्रेम नहीं था? क्या उन्होंने अपने सारे जीवनभर चाण्डाल को अपने सम्प्रदाय में लेने का प्रयत्न नहीं किया? क्या उन्होंने अपने सम्प्रदाय में मुसलमान तक को मिला लेने की चेष्टा नहीं की? क्या नानक ने मुसलमान और हिन्दू दोनों को समान भाव से शिक्षा देकर समाज में 

एक नई अवस्था लाने का प्रयत्न नहीं किया? इन सब ने प्रयत्न किया और उनका काम आज भी जारी है।’ 

स्वामी विवेकानंद ने इसी कार्य को आगे बढ़ाया और युवाओं को प्रेरित किया कि वे बल, पवित्रता और जीवनशक्ति के उद्भूत आधार प्राचीन महान आचार्यों तथा महान समाज संस्थापकों के । उपदेशों का अनुसरण करें। 

युवा विवेकानंद राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक थे तथा राष्ट्रवाद के प्रबल पक्षधर भी थे। देशभक्ति में उनका गहरा विश्वास था और अपने भाषणों के माध्यम से उन्होंने देशभक्ति की घुट्टी भारतीय युवकों को पिलाई। उन्होंने राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए युवाओं को कुछ इस प्रकार प्रेरित किया—’लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं, किंतु मैं देशभक्ति में विश्वास करता हूं। बड़े काम करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है। पहला है हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या विचार शक्ति में क्या है, वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर हृदय तो प्रेरणास्रोत है। प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता है। यह प्रेम ही जगत् के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव हे मेरे भावी सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो। क्या तुम अनुभव कर रहे हो? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशुतुल्य हो गई हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखों मर रहे हैं। लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं। क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बादलों ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या तुम यह सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमकों निद्राहीन कर दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में बहती है? क्या वह तुम्हारे हृदय के स्पंदन से मिल गई है? क्या इसने तुम्हें पागल सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से तुम अपने नाम, । यश, धन-सम्पत्ति यहां तक कि अपने शरीर की भी सध बिसर गये हो? क्या तुमने ऐसा किया है? यदि ‘हाँ’, तो जानो कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है, हाँ, केवल पहली सीढ़ी पर।’ उक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि युवा विवेकानंद ने जिस गहराई से युवकों | को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया, उतनी गहराई से संभवतः कोई दूसरा नहीं पढ़ा पाया। 

स्वामी विवेकानंद ने बताया कि देश राष्ट्रीय जीवन रूपी जहाज है, अतः तुम्हारा यह कर्त्तव्य बनता है कि यदि इस जहाज में छेद हो गये हों, तो उन्हें बंद करो। चूंकि तुम इसकी संतान हो, अतः इन छेदों को बंद करने में अपनी सारी शक्ति लगा दो। वह कहते हैं ‘आओ चलें, उन छेदों को बंद कर दें, उसके लिए हंसते-हंसते अपने हृदय का रक्त बहा दें। और यदि हम ऐसा न कर सकें तो हमारा मर जाना ही उचित है। 

राष्ट्र और संसार के कल्याण के लिए स्वामीजी ने ज्ञान की महत्ता पर भी बल दिया। उन्होंने युवकों को यह संदेश दिया कि संसार में ज्ञान के प्रकाश का विस्तार करो, प्रकाश सिर्फ, प्रकाश लाओ। प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करे। जब तक सब लोग  भगवान के निकट न पहुंच जाएं, तब तक तुम्हारा कार्य शेष नहीं हुआ है। गरीबों में ज्ञान का विस्तार करो, धनियों पर और भी अधिक प्रकाश डालो, क्योंकि दरिद्रों की अपेक्षा, धनियों को अधिक प्रकाश की आवश्यकता है। अपढ़ लोगों को भी प्रकाश दिखाओ। शिक्षित मनुष्यों के लिए और अधिक प्रकाश चाहिए, क्योंकि आजकल शिक्षा का मिथ्याभिमान खूब प्रबल हो रहा है। इसी तरह सब के निकट प्रकाश का विस्तार करो। 

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय युवकों को विश्वविजय का मूल मंत्र दिया और बताया कि विश्वविजयी कैसे हुआ जा सकता है। वह जीवन के लिए विस्तार को आवश्यक मानते थे। उन्होंने युवकों का आह्वान करते हुए कहा कि हमें संपूर्ण संसार जीतना है। भारत को अवश्य ही संसार पर विजय प्राप्त करनी होगी। इसकी अपेक्षा किसी छोटे आदर्श से मुझे कभी संतोष न होगा। यह आदर्श, संभव है, बहुत बड़ा हो और तुममे से अनेक को इसे सुनकर आश्चर्य होगा, किन्तु हमें इसे ही अपना आदर्श बनाना है। या तो हम संपूर्ण संसार पर विजय प्राप्त करेंगे या मिट जाएंगे। इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं है। जीवन का चिह्न है विस्तार। हमें संकीर्ण सीमा के बाहर जाना होगा. हृदय का प्रसार करना होगा। यह दिखाना होगा कि हम जीवित हैं। स्वामी विवेकानंद ने इस तरह बड़े आदर्शों को हमारे सम्मुख रखकर नवजागृति तथा नवचेतना लाने का प्रयास किया। उन्होंने इसके लिए यवकों को–’उत्तिपठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ का संदेश दिया। यही उनका ध्येय वाक्य था। 

स्वामीजी का दृष्टिकोण आधुनिक था। वे स्थापित प्राचीन मान्यताओं, धर्म और मानव सेवा के साथ आधुनिकता के समन्वय के अधर थे। वे यह चाहते थे कि भारतीय युवक पश्चिम के देशों से तकनीक और प्रौद्योगिकी का ज्ञान लें और बदले में उन्हें भारतीय धर्म और दर्शन की सीख दें। एक मुलाकात के दौरान जब राजा गायकवाड़ ने उनसे पूछा, “महाराज, क्या चाहिए? कोई मंदिर, कोई मठ, काइ गुरुकुल, कोई वेदशाला?” तो उनका जवाब था- “नहीं, टेक्निकल स्कूल और इंजीनियरिंग कॉलेज।” 

युवा विवेकानंद इस बात के पक्षधर थे कि हमें आधुनिक ज्ञान से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, बल्कि पुरातन और आधुनिक के बेहतर समन्वय पर बल देना चाहिए। उन्होंने अमेरिका में कहा भी था कि धर्म हमारे पास बहुत है। तुम हमें उद्योग-धंधे दो, धर्म हम तुम्हें देंगे। उन्होंने सदैव प्रबंधन, संगठन और व्यवस्था को वरीयता दी। 

स्वामी विवेकानंद चरमकोटि के महत्त्वाकांक्षी भी थे तथा देश और इसके युवाओं को भी महत्वाकांक्षी बनाना चाहते थे। वे यह चाहते थे कि देश का युवा बड़े आदर्शों को लेकर चले तथा महान कार्य करे। वह ऊंचे स्वप्न देखे। उन्होंने युवकों को विराटता एवं दिव्यता का संदेश देकर नवजागरण का काम किया। आज हमारे देश के युवा विवेकानंद की कसौटियों पर खरे उतरते नजर आ रहे हैं। भारतीय मेधा का लोहा पूरा विश्व मान रहा है। विश्व मंच पर यदि भारत की एक पुख्ता पहचान बनी है, तो इसमें भारतीय युवकों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भारतीय युवा, भारत का पुराना गौरव लौटाने में लगे हैं और स्वामी विवेकानंद के सपनों को सार्थक बना रहे हैं। इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। ऐसा लगता है कि युवा विवेकानंद ने अपने उपदेशों और भाषणों से जो बीज बोए थे, उन्होंने आकार लेना शुरू कर दिया है। भारत ‘विश्व गुरु’ का खोया गौरव प्राप्त करने की तरफ सधे कदमों से बढ़ रहा है। भारतीय युवकों में एक नवजागृति तथा नवचेतना का संचार हो चुका है और वे राष्ट्रीय युवा दिवस, 12 जनवरी, स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन की अहमियत को समझने लगे हैं। 

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