यदि मुझे लॉटरी लग गई तो पर निबंध | Yadi mujhe lottery lag gai to par nibandh

यदि मुझे लॉटरी लग गई तो पर निबंध |

यदि मुझे लॉटरी लग गई तो पर निबंध | Yadi mujhe lottery lag gai to par nibandh

 “जी, केवल एक रुपया लगाकर आप अपना भाग्य आजमाइए। कौन कहता है कि आपकी किस्मत का दरवाजा कभी खुल नहीं सकता, कौन कहता है कि आप कंगाल-के-कंगाल ही बने रहेंगे, कौन कहता है कि पारे की तरह चंचल लक्ष्मी आपकी बाँहों में मुसकराती हुई समा नहीं जाएगी? बस, चौबीस घंटे के अंदर आपकी तकदीर का रोशनदान खुलने ही वाला है-संपत्ति के सूरज की सुनहली रश्मियाँ आपके दरिद्र जीवन के अँधियारे को उजागर करने ही वाली हैं। एक रुपया तो आप पान खाकर थूक देते हैं, बीड़ी-सिगरेट के धुएँ उड़ाकर फेंक डालते हैं। वहीं एक रुपया आपको रातोंरात लखपती बना डालेगा।”-इस प्रकार के मोहक वाक्यों के चारे पर किसी का भी मन मछली की तरह फँस जाता है, इसके झाँसे में किसी का भी मन पंछी की तरह उलझ जाता है, इसकी छलनाओं के खंदक में किसी का मन-मतंग गिरकर कैदी बन जाता है। 

देश की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ऐसे लोगों का है, जिनकी आय बहुत कम है। वे अपनी गाढ़ी कमाई के रुपयों से अधिक-से-अधिक टिकट इसलिए खरीदते हैं कि उनके अमीर बनने की संभावना अधिक-से-अधिक हो जाए। वे ऐश्वर्यशाली बनने की अपनी इंद्रधनुषी कल्पना के कनकलोक में विचरण करने लगते हैं। वे तरह-तरह की योजनाओं की कल्पना से अपने अंतःकरण का आँगन सजाते रहते हैं। कभी उनके मन में भव्य वातानुकूलित भवन निर्मित करने का विचार उठता है, तो कभी सुखद कीमती कार खरीदने का खयाल पैदा होता है। कभी चारों धाम की तीर्थयात्रा कर परलोक सँवारने का भाव जगता है, तो कभी बेटे को बिलायत भेजकर उच्च शिक्षा दिलाने का सपना मचलता है। उनका मन बाजरे के लहलहाते खेतों की तरह दिवास्वप्नों की बयार में झूमता रहता है, किंतु लॉटरी निकलने के दिन दुर्भाग्यवश यदि उनका नंबर नहीं निकला, तो उनकी गुलाबी कल्पनाओं का काँचमहल चकनाचूर हो जाता है, उनकी आशाओं का ताशमहल बिखर जाता है। ऐसे बेचारों की स्थिति एंटन चेखव के ‘लॉटरी का टिकट’ कहानी के नायक-नायिका से भी बदतर हो जाती है। बेचारे की हालत कहानी के उस पात्र की तरह होती है, जिसने अपनी जायदाद बेचकर शराब की दकान खोली थी। उसकी आय से वह सपनों की दुनिया में सैर कर ही रहा कि एक बैल आया और उसने शराब के सारे घड़े फोड़कर उसके ख्वाब के शीशमहल को मटियामेट कर दिया। 

प्रलंब प्राप्त्याशा के पश्चात् आई हई यह हताशा उसकी जीवंतता का तंतुजाल छिन्न-भिन्न कर देती है। अपार धनलाभ के मायामग से प्रवंचित व्यक्ति व्यसन, मानसिक तनाव और अनिद्रा का शिकार बन जाता है। उसकी स्थिति कबीर की नायिका-सी हो जाती है—’दिन नहिं चैन, रात नहिं निदिया, तलफ-तलफकर भोर किया।’ 

यह लॉटरी मनुष्य को भाग्यवादी बना डालती है. उसे अंधविश्वास का आखेट बना डालती है। टिकट खरीदते ही वह हस्तरेखाविशारदों एवं ज्योतिषियों के पास दौड़ने लगता है। लोलुप ज्योतिषी ऐसे आतुर असामी को पाकर काफी धन ऐंठते हैं। उसके ‘लकी नंबर’ और ‘लकी दिन’ की भविष्यवाणी कर अपनी मुट्ठी गरम करते हैं। एक खाई से निकला हुआ व्यक्ति दूसरी खाई में गिर जाता है। 

यह लॉटरी राज्य सरकारों के सुसाधनसंपन्न शोषण के तरकस से निकला हुआ विषैला बाण है। यह शकुनि का वह पासा है, जिसपर बड़े-बड़े धर्मराज युधिष्ठिर भी फँस जाते हैं और उनकी द्रौपदी का चीरहरण तक हो जाता है। यह वह मोहिनी है, जिसके रूपाकर्षण में कितने बेचारों को नारद की तरह बंदरमुँहा बनकर उपहास का गरल पीना पड़ता है। 

लॉटरी के समर्थकों का कहना है कि इससे लोगों द्वारा नगण्य रुपये लगाए जाते हैं, किंतु इनसे राज्य सरकारें बड़े ही उपयोगी सार्वजनिक कार्य करती हैं। 

ठीक ही है कि जिस देश में घूसखोरी, चोरबाजारी और तस्कर-व्यापार से कमाए गए दूषित पैसों से मंदिर, धर्मशाला या पनशाला बनवाना उचित और प्रशंसनीय है, वहाँ लॉटरी का टिकट बेचकर विकासकार्य में लगाना अनुचित कैसे माना जाएगा? उत्तरप्रदेश ने स्वास्थ्य-सेवा, दिल्ली-सरकार ने कम मूल्य के मकान बनवाने, केरल ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, तमिलनाडु ने पाठशाला-निर्माण के नाम पर लॉटरी चालू की है, किंतु इससे आई हुई आय राज्य सरकारों की सामान्य तृषा की शांति में खर्च होती जा रही है। 

देश के कुछ नेताओं एवं समाजशास्त्रियों ने इसका विरोध किया है, इसकी वैधता को चुनौती दी है, किंतु उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर ही रह जाती है। यह घोर आश्चर्य है कि जहाँ जूआबाजी नाजायज है, वहाँ लॉटरी जायज। लॉटरी ऐसी जूआबाजी है, जिसे किसी माँद में छिपकर खेलने की जरूरत नहीं, इस जएबाजी के ऊपर तो सरकार की छत्रच्छाया है। लॉटरी वह जहर की शीशी है, जिसके ऊपर मधुर पेय का लेबुल चिपका है। इसके पान के परिणाम में अनभिज्ञ व्यक्ति इसके फेर में पड़कर अपना सत्यानाश कर डालता है।

 राज्य लॉटरी वह पौराणिक दानवी है, जो अपनी तीक्ष्ण दंष्ट्राओं से जीवित मनुष्यों का जीवनरक्त अच्छी तरह चूसने में समर्थ है। यह रावण का दूत है, जो निरीह मुनियों से गर्म शोणित का कर उगाहता है। यह वह पारपत्र है, जिसके द्वारा सरकार निर्लज्ज पापाचार के लोक में रमण का विशेषाधिकार प्राप्त कर लेती है। यह वह सड़ांध है, जो हमारे समाज में चारों ओर दुर्गंध के कीटाणु फैलती है। यह नैतिकता की जड़ काटनेवाली कुदाली है, यह भाग्यवादिता की नींव मजबूत करनेवाली रसायनचूर्णिका है। यही कारण है कि अलास्का ने 1899 ई० में, हवाई द्वीप ने 1900 ई० में, स्वीडेन ने 1841 ई० में, बेल्जियम ने 1830 ई० में तथा स्विट्जरलैंड ने 1865 ई० में इसे बंद कर दिया। दुराचार का जो विषघट शताब्दियों पहले दफना दिया गया था, उसे ही हमारे देश ने फिर बाहर निकाला है-समता का समुद्घोष करनेवाला हमारा देश ही ऐसा कर सकता है। 

हम तो चाहते हैं कि हमारी राज्य-सरकारें दीन-हीन जनता को अपार धनलाभ के . मृगमोह में फँसाकर उसके दुर्बल आर्थिक ढाँचे को और झटका न दें; उन्हें सब्जबाग दिखाकर अपना उल्लू सीधा न करें, उन्हें भाग्यवाद, निराशा और असंतोष का विषैला उपहार न दें, दरिद्र जनता को और दरिद्र न बनाएँ, नंगी जनता को और भी निर्वस्त्र न करें तथा अधमरी जनता की खाल उतारकर स्वयं पौ-बारह न हों।। 

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