महिला सशक्तिकरण पर निबंध | Essay on Women Empowerment in Hindi

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

महिला सशक्तिकरण पर निबंध | Essay on Women Empowerment in Hindi

महिला सशक्तीकरण (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2011) अथवा स्त्री विमर्श : दशा और दिशा (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2016) अथवा महिला शक्तिसम्पन्नकरण : चनौतियां और संभावनाएं (आईएएस मुख्य परीक्षा, 1999) अथवा केवल राजनीतिक अधिकार महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं ला सकता (आईएएस मुख्य परीक्षा, 1997) अथवा नारी सशक्तीकरण : दशा एवं दिशा (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2003) अथवा केवल शक्ति और अधिकार से औरतों की मदद नहीं कर सकते (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2001) अथवा महिला मुक्ति किस ओर (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2004) 

“स्त्री पुरुष की गुलाम नहीं – सहधर्मिणी, अर्धांगिनी और मित्र है।-महात्मा गांधी 

जिस समाज में नारी का स्थान सम्मानजनक होता है, वह उतना ही प्रगतिशील और विकसित होता है। परिवार और समाज के निर्माण में नारी का स्थान महत्त्वपूर्ण होता है। जब समाज सशक्त और विकसित होता है तब राष्ट्र भी मजबूत होता है। इस प्रकार राष्ट्र निर्माण में भी नारी केन्द्रीय भूमिका निभाती है। माता के रूप में नारी प्रथम गुरु होती है। जार्ज हर्बर्ट के अनुसार- “एक अच्छी माता सौ शिक्षकों के बराबर होती है, इसलिए उसका हर हालत में सम्मान करना चाहिए।” 

“स्त्री पुरुष की गुलाम नहीं – सहधर्मिणी, अर्धांगिनी और मित्र है।” 

भारतीय समाज में वैदिक काल में नारी का स्थान बहुत सम्मानजनक था और हमारा अखंड भारत विदुषी नारियों के लिए जाना जाता था। कालांतर में नारी की स्थिति में ह्रास हुआ और मध्यकाल आते-आते यह ह्रास अपने चरम पर जा पहुंचा। चूंकि अंग्रेजों का मकसद भारत पर शासन करना था, न कि समाज सुधार करना, इसलिए ब्रिटिशकाल में भी भारतीय नारी की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। हां, कुछ छोटी-मोटी पहलें अवश्य शुरू हुईं। आजादी के बाद ऐसा सोचा गया था कि भारतीय नारी एक नई हवा में सांस लेगी तथा शोषण | और उत्पीड़न से मुक्त होगी, किंतु हुआ उलटा ही। आजादी के बाद कानूनी स्तर पर नारी को सशक्त बनाने के प्रयास तो खूब हुए, किंतु | सामाजिक स्तर पर जो बदलाव आना चाहिए था, वह परिलक्षित नहीं | हुआ, जिसका मुख्य कारण रहा, हमारी पुरुष प्रधान मानसिकता, जीसे हम बदल नहीं पाए और नारी के प्रति हमारा रवैया दोयम दर्जे का रहा। यही कारण है कि वैदिककाल में जो नारी शीर्ष पर थी, आज उसके सशक्तीकरण की आवश्यकता महसूस की गई। 

भारतीय नारी के साथ विरोधाभासी स्थितियां सदैव रहीं। पहले भी थीं, आज भी हैं। प्राचीन धर्म ग्रन्थों में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ सूत्र वाक्य द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि जहां नारी पूजनीय होती है, वहां देवता निवास करते हैं। हमारे देश भारत में जहां एक ओर लक्ष्मी, सीता, दुर्गा, पार्वती के रूप में नारी को देवतुल्य बताया जाता है वहीं उसे अबला बता कर परंपरा एवं रूढ़ियों की बेड़ी में भी जकड़ा जाता रहा है। हालांकि यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद अपनाए गए विभिन्न कार्यक्रमों और नारी अधिकारों के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों के कारण महिलाओं की स्थिति में गुणात्मक सुधार हुआ है और इसी के कारण आज देश की आर्थिक गतिविधियों में नारी की सहभागिता दर में वृद्धि भी दिखाई दे रही है किंतु लैंगिक आधार पर विषमता स्पष्ट दिखाई देती है। यही कारण है कि भारत में आज तक महिलाओं के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाने वाला ‘महिला आरक्षण विधेयक’ लागू नहीं हो पाया है। इस विधेयक में लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने के लिए चक्रानुक्रम पद्धति का प्रावधान किया गया है। महिला आरक्षण विधेयक का लागू न हो पाना यह साबित करता है कि नारी सशक्तीकरण को लेकर हमारी नीयत साफ नहीं है। जब तक राजनीति में नारी की भागीदारी नहीं बढ़ेगी तब तक सही अर्थों में उसका सशक्तीकरण नहीं हो सकेगा। हालांकि यहां यह स्पष्ट कर देना उचित रहेगा कि केवल अधिकतर राजनीतिक अधिकार महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं ला सकता। राजनीतिक अधिकार से ज्यादा जरूरी है सामाजिक स्तर पर महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव। जब तक यह बदलाव नहीं आता, महिला मुक्ति एवं सशक्तीकरण के प्रयास फलीभूत नहीं होंगे। आइये, अब हम भारत में नारी सशक्तीकरण की दशा एवं दिशा के साथ इसकी चुनौतियों और संभावनाओं का जायजा लें। 

ऐसा नहीं है कि भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रयास नहीं हुए। हमारे देश में नारी शक्ति को बल देकर महिलाओं के उन्नयन के प्रयास बराबर जारी हैं, किंतु लैंगिक भेदभाव की प्रवृत्तियां सदैव आड़े आती रहीं। भारत में सैन्य क्षेत्र में वर्ष 1992 से जहां देश में महिलाओं को कमीशन देने की शुरुआत हुई, वहीं केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण दिये जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जा चुकी है। भारतीय संविधान में भी महिला सम्मान का पूरा ध्यान रखते हुए भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से महिला अधिकारिता को संविधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। यहां उन उपायों के बारे में संक्षेप में जान लेना जरूरी होगा, जो अब तक नारी सशक्तीकरण हेतु किये गये हैं। 

“भारत सरकार ने अगस्त, 2019 में नारी सशक्तीकरण की ओर एक बड़ा कदम उठाते हुए तीन तलाक को प्रतिबंधित कर दिया। यह मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए ऐतिहासिक कदम है।” 

9 सितम्बर, 2005 को पैतृक संपत्ति में बेटे के समान बेटी (साथ ही बेटों के बच्चों के समान ही पुत्रियों के बच्चों को भी इसमें समान दर्जा देने की व्यवस्था) को अधिकार देने वाला कानून (हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956 की धारा-6 में संशोधन) सरकारी अधिसूचना के साथ प्रभावी हो गया। 

“घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005″ 26 अक्टूबर, 2006 से भारत में लागू हो गया। अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को दण्डनीय अपराध के साथ साथ गैर-जमानती माना गया है और अपराधी को 1 वर्ष की कैद या 20,000 रुपए का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। 

भारत सरकार ने अगस्त, 2019 में नारी सशक्तीकरण की ओर एक बड़ा कदम उठाते हुए तीन तलाक को प्रतिबंधित कर दिया। | यह मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए ऐतिहासिक कदम है। 

31 जनवरी, 1992 को “राष्ट्रीय महिला आयोग” का गठन किया गया जो महिलाओं के सांविधानिक व कानूनी सुरक्षा के अधिकारों | को ठीक ढंग से लागू करता है। महिला हितों को ध्यान में रखकर 9 दिसंबर को भारत में ‘बालिका दिवस’ मनाया जाता है। देश में महिलाओं को मजबूत सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा लागू किए गए ‘आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013′ को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। यह कानून महिला सुरक्षा की दृष्टि में की गई एक नई पहल है तथा इसमें महिला सुरक्षा के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं। 

यहां पर प्रसंगवश महिलाओं के उत्थान के लिये किये गए कुछ ऐतिहासिक प्रयासों के बारे में भी जान लेना जरूरी होगा। लार्ड बिलियम बैंटिक और राजा राममोहन राय के प्रयासों से वर्ष 1829 में जहां सती प्रथा को प्रतिबंधित किया गया वहीं वर्ष 1856 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया और विधवा विवाह को वैध माना गया। वर्ष 1872 में केशव चन्द्र सेन के सद्प्रयत्नों से “ब्रह्म विवाह अधिनियम” (Native Marrige Act) पारित हुआ। इसमें 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह को वर्जित कर दिया गया। साथ ही, बहु विवाह को गैर-कानूनी घोषित किया गया, किन्तु यह कानून प्रभावशाली न हो सका। एक पारसी समाज सुधारक बम्बई के वी. एम. मालबरी के सद्प्रयत्नों के फलस्वरूप 1891 ई. में “सम्मति आयु अधिनियम’ (Age of Consent Act) पारित हुआ, जिसमें 12 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह पर रोक लगा दी गई। 1931 ई. में बड़ौदा सरकार ने “बाल विवाह निवारक अधिनियम’ (The Infant Marriage Prevention Act) पारित कर बाल विवाह का निषेध किया। 

1929 में भारत सरकार ने बाल विवाह के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया। उस समय हरविलास शारदा के सद्प्रयत्नों से “बाल विवाह निरोधक कानून” पारित हुआ, जिसे “शारदा एक्ट” के नाम से जाना जाता है। इसमें 14 वर्ष से कम उम्र की कन्या (एवं 18 वर्ष से कम उम्र के लड़के) का विवाह अवैध घोषित किया गया। ज्ञातव्य है कि 1978 में भारत सरकार द्वारा पारित “बाल विवाह निषेध अधिनियम के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु की कन्या (एवं 21 वर्ष से कम आयु के लड़के) का विवाह अवैधानिक करार दिया गया। 

भारतीय लड़कियों के लिए 1848 में फुले दम्पत्ति ने पहला स्कूल स्थापित किया था। परन्तु, भारतीय स्त्रियों में शिक्षा को बढ़ावा देने का विशेष प्रयत्न ईसाई मिशनरियों द्वारा किया गया। उनका उद्देश्य जो भी रहा हो, किन्तु 1819 में कलकत्ता में वे पहले लोग थे जिन्होंने “तरुण स्त्री सभा’ (Female Juvenile Society) की स्थापना की। आगे चलकर शिक्षा परिषद् के अध्यक्ष जे. ई. डी. बेथुम ने 1849 में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसे “बथुम स्कूल” के नाम से भी जाना जाता है। स्त्री शिक्षा के प्रसार में ईश्वर चंद्र विद्या सागर की देन स्पृहणीय थी। वे बंगाल में लगभग 35 बालिका विद्यालय से संबंधित रहे। बम्बई के एलफिस्टन स्कूल का भी बालिकाओं व स्त्री शिक्षा प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान था। 1854 ई० में चार्ल्स वुड के पत्र में भी स्त्री शिक्षा की योजना पर जोर दिया गया था। 1927 ई0 में “अखिल भारतीय महिला सभा” (All India Women Conference) की स्थापना की गई, जिसकी पहली अध्यक्ष सदाशिव अय्यर थीं। आज भारतीय महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और उनकी साक्षरता दर बराबर बढ़ रही है। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की संशोधित नीति (1992) व इसकी कार्ययोजना में महिलाओं की शिक्षा को उच्च प्राथमिकता दी गई है। नारी साक्षरता बढ़ाने के लिए जहां प्रत्येक नवोदय विद्यालय में कम-से-कम एक-तिहाई छात्राओं को अवश्य प्रवेश दिलाने के लिए प्रोत्साहन अभियान चलाया जा रहा है, वहीं “ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड’ योजना में संशोधित नीतिगत प्रावधानों के अनुसार भविष्य में अध्यापकों की भर्ती में 50% स्त्रियां होनी चाहिए। 

“आज की महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र और स्वावलम्बी है। वह पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर आज देश की आर्थिक गतिविधियों में अपनी भागीदारी प्रदर्शित कर रही है।” 

नारी को सशक्त बनाने के क्रम में वर्ष 1971 में केन्द्र सरकार द्वारा देश की महिलाओं की स्थिति पर गठित समिति द्वारा 1974 में “सामाजिक समानता की ओर” (Towards Social Equality) नामक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज निकाला गया। इसमें भारतीय महिलाओं के स्तर के संबंध में कई मुद्दे उठाए गए और नई नीतियों की आवश्यकता के बारे में बहस का आधार रखा गया। इसी क्रम में “राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति, 2001″ बनाई गई जिससे कि देश में महिलाओं के लिए विभिन्न क्षेत्रों में उत्थान व समुचित विकास की आधारभूत विशेषताएं निर्धारित किया जाना संभव हो सके। महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाने के उद्देश्य से जहां नीदरलैंड सरकार के सहयोग से ‘महिला समाख्या कार्यक्रम’ शुरू किया गया, वहीं ड्वाकरा (DWACRA) योजना (1982-83 से प्रारंभ) का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना था। इसी क्रम में “विमेन्स इंटीग्रेटेड लर्निंग फॉर लाइफ’ (WILL) योजना का उद्देश्य निरक्षर लड़कियों व युवतियों को साक्षर बनाना, स्वास्थ्य व पोषण, स्वच्छता, परिवार कल्याण जैसे आवश्यक विषयों के बारे में जागृति बढ़ाना था। हाल में शुरू की गई ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ एवं ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ आदि का उद्देश्य भी नारी की स्थिति में सुधार लाना है। इन सब के अलावा नारी सशक्तीकरण हेतु ढेरों ऐसे उपाय अब तक किए जा चुके हैं, जिनसे नारी की स्थिति में सुधार आया है, तथापि जिस स्तर का सशक्तीकरण दिखना चाहिए, वह नहीं दिख रहा है। इसके कुछ खास कारण हैं। 

1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी के शासन काल में पहली बार स्टेटस ऑफ वुमैन कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी की रिपोर्ट 1975 में आई। इसमें कहा गया था कि भारत में महिलाओं के विकास में सर्वाधिक बाधक तत्व हमारी रूढ़ियां एवं परंपराएं हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि पुरुषों के वर्चस्व वाले हमारे समाज में उन स्त्रियों को अच्छा माना जाता है जो कभी घर से बाहर नहीं निकलती। वस्तुतः नारी की स्थिति में अपेक्षित सुधार न आ पाने का सबसे बड़ा कारण है आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक गैर-बराबरी। इसके पीछे मुख्य कारण हैं समाज में व्याप्त वे मान्यताएं व प्रवृत्तियां हैं जिसके अनुसार लड़कियों का जन्म अशुभ माना जाता है। साथ ही, कुछ समुदायों में उन्हें पैदा होते ही मार दिया जाता है। 

भारत में घटता लिंगानुपात जैव-वैज्ञानिक घटना न होकर “बालिका भ्रूण हत्या” की ओर संकेत करती है, जो आधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी जैसे कि अल्ट्रा साउण्ड, अमीनोसेंटोसिस आदि द्वारा अंजाम दी जाती है। 

लड़कों तथा लड़कियों के लालन-पालन में भेदभाव के कारण लड़कियों को लड़कों की तुलना में कम पौष्टिक भोजन मिलता है। 

सामाजिक कुरीतियां बाल विवाह, दहेज प्रथा, बंधुआ मजदूरी, नशाखोरी आदि के प्रभाव से महिलाएं सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक दृष्टि से दबी रहती हैं। इसके साथ ही गृहस्थी के संचालन में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से महिलाएं अपना उत्तरदायित्व अधिक समझती हैं। 

उपर्युक्त उत्तरदायित्व का संस्कार मां अपनी बच्ची को बाल्यावस्था से ही प्रदान करती है। फलतः बालिकाएं शिक्षा एवं अन्य विकास के आयामों से वंचित होती रहती हैं।

महिला सशक्तीकरण से तात्पर्य है—‘महिलाओं को पुरुषों के बराबर वैधानिक, राजनीतिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में उनके परिवार, समुदाय, समाज एवं राष्ट्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में निर्णय लेने की स्वायत्तता।’ इस कसौटी पर हम शत प्रतिशत भले ही खरे नहीं उतरे हैं, किंतु स्थिति में बदलाव आया है। 

देश की स्वतंत्रता के समय की भारतीय महिला और आज की भारतीय महिला में काफी बदलाव आया है। आज की महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र और स्वावलम्बी है। वह पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर आज देश की आर्थिक गतिविधियों में अपनी भागीदारी प्रदर्शित कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्यमिता, सरकारी नौकरी तथा सामाजिक सरोकारों के सभी क्षेत्रों में आज महिलाएं अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। निश्चय ही इसका एक मात्र कारण महिला सशक्तीकरण की दिशा में किए गए विभिन्न सरकारी प्रयास हैं। देश में महिलाओं की स्थिति में प्रत्येक क्षेत्र में सुधार आया है किंतु हमें यह भी ध्यान रखना है कि अभी लक्ष्य बहुत दूर है। महिला सशक्तीकरण की बयार से अभी भी देश के सुदूरवर्ती ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्र अनछुए हैं। इक्कीसवीं शताब्दी में हमें इस लक्ष्य को शतप्रतिशत प्राप्त करना है और इसके लिए अभी कई कल्याणकारी योजनाओं को चलाना होगा। हमें देश की एक-एक नारी को न केवल शिक्षित और जागरूक बनाना है बल्कि उसे सम्मानजनक स्थिति तक लाना है। तभी भारत देवताओं का देश बन सकेगा क्योंकि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’। 

सारतः हम यह कह सकते हैं कि महिला शक्तिसम्पन्नकरण से जुड़ी चुनौतियों से निपटने की दिशा में हम सधे कदमों से आगे बढ़ रहे हैं, जिससे बेहतर संभावनाएं बनी हैं। नारी शक्ति को बल देने के प्रयास निरंतर जारी हैं। हम सही दिशा में जा रहे हैं। राजनीतिक अधिकारों से भी महिलाओं को लैस किया जा रहा है, तो उन्हें विधिक संरक्षण भी प्रदान किया जा रहा है। आर्थिक रूप से भी उन्हें सबल बनाने के प्रयास हो रहे हैं, तो उनकी साक्षरता बढ़ाने की दिशा । में भी प्रयास हो रहे हैं। ये पहले श्लाघनीय है, जिनके बेहतर परिणाम के लिए महिलाओं के प्रति सामाजिक नजरिए में बदलाव की सख्त जरूरत है। यह बदलाव भी होता दिख रहा है। इन सब के साथ यह रेखांकित किया जाना नितांत आवश्यक है कि केवल शक्ति और अधिकार ही औरतों की मदद नहीं कर सकते। खुद को सशक्त बनाने के लिए उन्हें स्वयं भी कमर कसनी होगी। 

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