श्रीकृष्ण की पत्नियां | Wives of Shri Krishna

श्रीकृष्ण की पत्नियां | Wives of Shri Krishna

श्रीकृष्ण की पत्नियां | Wives of Shri Krishna

भगवान कृष्ण के द्वारका महल में उनकी बहुत-सी रानियां थीं, लेकिन उनमें से आठ रानियां खास मानी जाती थीं, जिन्हें ‘अष्ट-भार्या’ कहा जाता था। वे रानियां थीं-रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवंती, कालिंदी, मित्रविंदा, नग्नजिति, भद्रा और लक्ष्मणा। बाकी सभी रानियां नरक नामक राक्षस से संबंध रखती थीं। वे उसके महल में बंदी थीं। जब भगवान कृष्ण ने उस राक्षस का वध किया, तो वे आजाद हो गईं। भगवान कृष्ण ने उनसे अपने घर वापस जाने को कहा, तो वे बोली, “आप हमसे विवाह कर लें। अब हम अपने घर वापस नहीं जा सकतीं।” यह कहकर वे रोने लगीं।

तब भगवान कृष्ण ने अलग-अलग रूप धारण करके उन सबसे शुभ मुहूर्त में विवाह कर लिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया, ताकि वे समाज में विवाहित स्त्रियों की तरह मान-सम्मान से जी सकें। भगवान कृष्ण ने उन सबके लिए अलग-अलग महल बनवाए, जिनमें विशाल बगीचे भी थे। भगवान कृष्ण का उन सभी रानियों के साथ रहना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने अपने बहुत से रूप बना लिए, ताकि उन सभी के साथ उसी तरह रह सकें, जैसे वे अपनी खास आठ रानियों के साथ रहते थे। 

इस प्रकार उन सभी रानियों को यह लगता था कि भगवान कृष्ण पति के रूप में उनके ही साथ हैं। वे अपने-अपने महल में उनके साथ गृहस्थी रचाती थीं। ऐसे में उन रानियों के मन में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना नहीं पैदा होती थी। 

Lord Krishna Stories in Hindi- मुनि दुर्वासा द्वारा रुक्मिणी को शाप 

भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी उनकी पटरानी थीं। वे बहुत सौम्य और उदार स्वभाव की थीं। उनके पिता और भाई की इच्छा थी कि उनका विवाह शिशुपाल से हो। लेकिन वे भगवान कृष्ण को चाहती थी, इसलिए उन्होंने उन्हें पत्र लिखकर विनती की थी कि वे उनका अपहरण करके ले जाएं। भगवान कृष्ण उन्हें द्वारका ले गए और उनसे विवाह कर लिया। फिर वे अपने महल में सुखपूर्वक रहने लगीं। रुक्मिणी लक्ष्मी जी की अवतार थी, इसलिए वे श्रीकृष्ण रूपी अपने पति श्रीविष्णु के साथ ही रहना चाहती थीं।। 

Lord Krishna Stories in Hindi- मुनि दुर्वासा द्वारा रुक्मिणी को शाप 

एक बार श्रीकृष्ण और रुक्मिणी ने मुनि दुर्वासा को अपने यहां भोजन का न्योता दिया। यह तो सभी जानते हैं कि जब तक मेहमान का भोजन पूरा न हो जाए, मेजबान को कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। लेकिन उस दिन रुक्मिणी को बहुत प्यास लगी थी। अतः श्रीकृष्ण ने धरती पर अपना पैर मारा और वहां से गंगा जी प्रकट हो गईं। जब रुक्मिणी पानी पी रही। थीं, तो मुनि दुर्वासा ने उन्हें देख लिया। उन्होंने गुस्से में आकर रुक्मिणी को शाप दे दिया कि उन्हें अपने पति से दूर रहना होगा। वह शाप इतना कठोर था कि आज भी द्वारका में भगवान कृष्ण का मंदिर है, लेकिन रुक्मिणी का मंदिर द्वारका के बाहर स्थित है। 

कहते हैं कि रुक्मिणी का मंदिर द्वारका के भीतर नहीं बना है। भक्तगण द्वारका में जाकर भगवान कृष्ण के दर्शन करते हैं, लेकिन रुक्मिणी का दर्शन करने हेतु उन्हें नगर से बाहर जाना पड़ता है। रुक्मिणी आज भी वह शाप झेल रही हैं। 

krishna katha in hindi-स्यमंतक रत्न

द्वारका का एक वासी सत्राजित सूर्यदेव का उपासक था। सूर्यदेव उसके तप से प्रसन्न हुए और उसे उपहार में स्यमंतक रत्न दिया। वह रत्न एक दिन में आठ बार सोना उत्पन्न करता था। इस प्रकार सत्राजित कुछ ही दिनों में बहुत धनी हो गया। भगवान कृष्ण ने उससे कहा कि उसे वह रत्न द्वारका के लोगों के साथ बांटना चाहिए? यदि वह उसे राजा उग्रसेन को दे दे, तो प्रजा का बहुत कल्याण हो सकता है। सत्राजित ने कहा, “नहीं, यह रत्न मेरा है। मैं इसे किसी दूसरे को नहीं दे सकता।” 

यह सुनकर भगवान कृष्ण ने सत्राजित को चेतावनी दी, “ठीक है, लेकिन इस रत्न को सावधानी से रखना। यह रत्न समस्त दुखों को दूर तो करता है, मगर विनाश का कारण भी बन सकता है।” 

krishna katha in hindi-स्यमंतक रत्न

कुछ दिनों बाद सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस रत्न को गले में पहनकर जंगल में शिकार करने गया। जब वह एक पेड़ पर बैठा था, तभी अचानक वहां एक शेर आ गया। उसे देखकर प्रसेनजित अपनी सुध खो बैठा। वह पेड़ से गिरा और उसकी मौत हो गई। इस दुर्घटना के कारण स्यमंतक रत्न पेड़ की शाखा में अटक गया। शेर भी उस रत्न की चमक से खिंचता चला गया। जब वह उसे ले जा रहा था, तो अचानक भालुओं के राजा जाम्बवंत का ध्यान उस ओर गया। उसने शेर को मार डाला और वह रत्न अपने पुत्र को उपहार में दे दिया। 

सत्राजित ने सोचा कि भगवान कृष्ण ने ही उसके भाई प्रसेनजित को मारा होगा, ताकि वे उससे वह रत्न हथिया सकें। ऐसे में भगवान कृष्ण अपने आपको निर्दोष साबित  करने के लिए सत्राजित के भाई प्रसेनजित को जंगल में खोजने चल दिए। जब उन्हें प्रसेनजित का शव मिला, तो उसके शरीर पर शेर के पंजों के निशान दिखाई दिए। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें वह शेर भी मरा दिखाई दिया। भगवान कृष्ण ने देखा कि शेर के शरीर पर भालू के पंजों के निशान थे, यानी उसकी मौत किसी भालू के द्वारा हुई थी। इस प्रकार वे भालू के पंजों के निशान का पीछा करते-करते जाम्बवंत की गुफा के पास पहुंच गए। श्रीकृष्ण ने खोजी दल से बाहर रुकने को कहा और स्वयं गुफा के भीतर चले गए। 

गुफा के अंदर भगवान कृष्ण ने देखा कि जाम्बवंत का पुत्र उस रत्न से खेल रहा था। श्रीकृष्ण को देखते ही उसने जोर से चीख मारी, जिससे जाम्बवंत सावधान हो गया। उसने सोचा कि भगवान कृष्ण ने उसके पुत्र पर हमला कर दिया था। वह उनसे लड़ने को तैयार हो गया। उनके बीच पूरे अट्ठाईस दिनों तक भयंकर युद्ध होता रहा। 

krishna katha in hindi-स्यमंतक रत्न

इस युद्ध में भगवान कृष्ण का मुकाबला जाम्बवंत से था, जिसने समुद्र पर पुल बनाने और रावण से युद्ध करने के दौरान श्रीराम की सहायता की थी। जाम्बवंत केवल श्रीराम के सामने ही झुक सकता था, इसलिए उनके बीच लगातार संघर्ष होता रहा। अंततः श्रीकृष्ण भगवान राम के रूप में सामने आए। तब जाम्बवंत ने उन्हें पहचान लिया और उनके पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। वह भगवान राम का परम भक्त था। अतः जाम्बवंत ने स्यमंतक रत्न देने के अलावा अपनी पुत्री जाम्बवंती का हाथ भी भगवान . कृष्ण को सौंप दिया। श्रीकृष्ण स्यमंतक रत्न और नई पत्नी जाम्बवंती के साथ द्वारका की ओर रवाना हो गए।

श्रीकृष्ण ने स्यमंतक रत्न उसके मालिक सत्राजित को दे दिया, लेकिन वह बहुत शर्मिंदा था, क्योंकि उसने उन पर झूठा इल्जाम लगाया था। सत्राजित ने कहा कि वह अपनी बेटी सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से करना चाहता है। सत्यभामा से विवाह की इच्छा रखने वालों की कमी नहीं थी। अक्रूर, कृतवर्मा तथा शतधन्वा उससे विवाह करना चाहते थे। श्रीकृष्ण और सत्यभामा के विवाह की बात सुनकर उनके गुस्से की सीमा न रही। 

krishna katha in hindi-स्यमंतक रत्न

स्यमंतक रत्न का समाचार जंगल की आग की तरह चारों ओर फैल गया। बहुत से लोग उस रत्न को पाना चाहते थे। शतधन्वा भी वह रत्न प्राप्त करने का इच्छुक था। एक रात वह चुपके से सत्राजित के कक्ष में घुस गया, ताकि स्यमंतक रत्न चुरा सके। लेकिन चोरी करने के बाद वह डर गया और स्यमंतक रत्न अक्रूर को सौंपकर वहां से चला गया। जब भगवान कृष्ण और बलराम को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने शतधन्वा को उसके किए की 

सजा के फलस्वरूप उसे मौत के घाट उतार दिया। लेकिन जब उसके पास रत्न नहीं मिला, तो श्रीकृष्ण ने सोचा कि उसने वह रत्न अक्रूर को सौंप दिया होगा। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने दरबार में सभा बुलाई और अक्रूर से रत्न दिखाने को कहा। सभी लोग अक्रूर का नाम सुनकर चौंक गए। भगवान कृष्ण जानते थे कि अक्रूर भी इस खेल का एक हिस्सा था। वह भगवान कृष्ण के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा। इस प्रकार भगवान कृष्ण को स्यमंतक रत्न की चोरी के इल्जाम से मुक्ति मिल गई। 

भगवान कृष्ण की तीसरी पत्नी सत्यभामा अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने अपने पिछले जन्म में बहुत से कष्ट उठाए थे। जब उनकी मृत्यु हुई, तो उन्होंने वैकुंठ धाम में शरण पाई। सत्यभामा ने वहां अथक भाव से भगवान विष्णु की सेवा की। भगवान विष्णु सत्यभामा की सेवाओं से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें वचन दिया कि वे आगामी अवतारों में से किसी एक अवतार की पत्नी होंगी। 

इस तरह भगवान कृष्ण ने सत्यभामा को अपनी पत्नी बनाया, ताकि उन्हें सदा प्रसन्न रख सकें। सत्यभामा को धनुष-बाण चलाने की कला में महारत हासिल थी और वे इस कला में श्रीकृष्ण का मुकाबला कर सकती थीं। 

सत्यभामा प्रायः भगवान कृष्ण के साथ इस कला का अभ्यास करती थीं। शीघ्र ही वे इस कला में निपुण हो गईं। एक बार नरकासुर ने भगवान कृष्ण पर हमला कर दिया था। उस समय रानी सत्यभामा ने अपनी वीरता का उचित प्रदर्शन करते हुए अपने पति की रक्षा की थी। 

krishna katha in hindi-स्यमंतक रत्न

जब सत्यभामा ने नरकासुर को अपने पति की ओर तीव्र गति से जाते देखा, तो वे क्रोधित हो उठीं। उन्होंने अपनी ताकत को दुगना किया और तत्काल उस राक्षस पर अपना तीर छोड़ दिया। 

नरकासुर ने अपनी मौत से पहले सत्यभामा से यह वचन लिया कि लोग उसकी मौत को रंग-बिरंगी रोशनियों के बीच मनाएं। तभी से दीपावली का पहला दिन नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। दीपावली से एक दिन पहले के दिन को छोटी दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर लोग अपने घरों के बाहर दीपक जलाते हैं। 

उपर्युक्त कथा हमें यह संदेश देती है कि अगर दुष्ट व्यक्ति भी समय रहते अपने बुरे कर्मों का पश्चाताप कर ले, तो उसे भी प्रभु की कृपा मिल सकती है। नरकासुर को अपने पाप कर्मों का एहसास हो गया था, इसलिए सत्यभामा ने उसकी मृत्यु से पूर्व उसे वचन दिया कि उसके मरने के बाद भी लोग उसे उत्सव मनाते हुए याद रखेंगे। 

स्यमंतक रत्न की कथा से भगवान कृष्ण ने यह संदेश दिया कि मनुष्य को किसी भी वस्तु का लोभ नहीं करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को ईश्वर की ओर से ऐसा उपहार मिले, जो उसके अतिरिक्त दूसरों के कल्याण और उत्थान के भी काम आ सकता हो, तो उसे बेहिचक जनकल्याण के लिए उच्च अधिकारी या राजा को सौंप देना चाहिए। 

krishna katha in hindi-स्यमंतक रत्न

जब स्यमंतक रत्न द्वारका नगरी के कोष में शामिल हो गया, तो उससे प्रजा का बहुत कल्याण हुआ। वह रत्न जादुई रूप से दिन में आठ बार सोना पैदा करता था। उस धन से द्वारका नगरी की प्रजा के लिए बहुत से कुएं खुदवाए गए, धर्मशालाएं बनवाई गईं तथा दुर्बलों और निर्धनों को अन्न एवं वस्त्र प्रदान किए गए। 

श्रीकृष्ण ने कालिंदी से विवाह किया 

एक दिन भगवान कृष्ण और अर्जुन इंद्रप्रस्थ के पास वाले जंगलों में शिकार करने गए। उनके साथ सेना भी थी। वे यमुना नदी के किनारे पहुंचे, ताकि अपनी प्यास बुझा सकें। तभी अचानक उन्हें उधर से एक सुंदर युवती जाती दिखाई दी। वे उसके बारे में जानने के लिए इच्छुक हुए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भेजा, ताकि वह उसके बारे में पता लगाकर आ सके। अर्जुन ने उस युवती के पास जाकर पूछा, “आप कौन हैं? इस वन में क्यों घूम रही हैं?” युवती बोली, “मैं सूर्यदेव की पुत्री कालिंदी हूं। मैं भगवान विष्णु को अपना पति बनाना चाहती हूं। उनके अलावा मैं किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह नहीं करूंगी।” 

श्रीकृष्ण ने कालिंदी से विवाह किया 

अर्जुन ने पूछा, “तुम यहां अकेली क्या कर रही हो।” कालिंदी बोली, “मैं भगवान कृष्ण को पाने के लिए कठोर तप कर रही हूं। मैं पास ही में रहती हूं। वह घर मेरे पिता ने यमुना नदी के जल में बनवाया है। आशा करती हूं कि एक दिन भगवान कृष्ण स्वयं यहां आएंगे।” 

अर्जुन ने जाकर सारी बातें भगवान कृष्ण को बता दीं। श्रीकृष्ण कालिंदी को अपने साथ इंद्रप्रस्थ ले गए। इसके बाद वे उन्हें अपने साथ द्वारका ले आए और उनसे विवाह कर लिया। 

इस घटना से स्पष्ट होता है कि भगवान कृष्ण अपने सभी भक्तों पर अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखते हैं तथा विकट समय आने पर वे उनके हित के लिए वैकुंठ छोड़कर भी पहुंच जाते हैं। 

मित्रविंदा ने किया श्रीकृष्ण से विवाह

मित्रविंदा अवंती देश की राजकुमारी थीं। वासुदेव की बहन रजाधिदेवी उनकी माता थीं। मित्रविंदा को भगवान कृष्ण से बहुत प्रेम था, परंतु वे अपने भाइयों विंद और अनुविंद से बहुत डरती थीं। उन्होंने मित्रविंदा के लिए स्वयंवर का आयोजन किया, ताकि वे अपने पति का चुनाव कर सकें। इस अवसर पर उनके पिता ने सभी राजाओं और राजकुमारों को दरबार में निमंत्रित किया था। 

भगवान कृष्ण भी दरबार में बुलाए गए थे। मित्रविंदा के भाइयों ने पहले से ही सोच रखा था कि वे श्रीकृष्ण के साथ अपनी बहन का विवाह नहीं होने देंगे। उन्होंने अपनी बहन मित्रविंदा को आदेश दिया कि वह भगवान कृष्ण के अलावा किसी भी राजा या राजकुमार का चयन अपने पति के रूप में कर सकती है। बलराम जानते थे कि मित्रविंदा श्रीकृष्ण को चाहती हैं, इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण को सलाह दी कि वे उनका अपहरण कर लें। 

मित्रविंदा ने किया श्रीकृष्ण से विवाह

श्रीकृष्ण इस बारे में निश्चित रूप से नहीं जानते थे, इसलिए वे अपनी बहन सुभद्रा को अपने साथ ले गए। उन्होंने मित्रविंदा से बात की और श्रीकृष्ण को बताया कि वे उनसे ही विवाह करना चाहती हैं। यह जानकर श्रीकृष्ण ने सभी राजाओं को लड़ाई में हरा दिया। वे मित्रविंदा को अपने साथ द्वारका ले गए और वहां उनसे विवाह कर लिया। 

इस तरह मित्रविंदा की हार्दिक इच्छा पूरी हुई और भगवान कृष्ण ने एक बार फिर यह प्रमाणित कर दिया कि वे अपने भक्तों की पुकार को कभी अनसुना नहीं करते। वे उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। 

नग्नजिति से विवाह

कौशल नरेश नग्नजित की एक सुंदर बेटी थी, जिसका नाम नग्नजिति था। राजा नग्नजित ने संकल्प कर रखा था कि जो व्यक्ति उनके सात बैलों को पकड़कर उनकी नाक में नकेल पहना देगा, वे उसी के साथ अपनी पुत्री का विवाह करेंगे। लेकिन कोई भी राजा या राजकुमार ऐसा नहीं कर सका। जब भगवान कृष्ण ने राजा नग्नजित का संकल्प सुना, तो वे अपनी सेना के साथ वहां जा पहुंचे। राजा नग्नजित ने उनका काफी आदर-सत्कार किया। नग्नजिति भी उनसे विवाह करना चाहती थीं। 

जब भगवान कृष्ण ने राजकुमारी नग्नजिति से शादी करने का प्रस्ताव रखा, तो राजा नग्नजित ने अपनी शर्त दोहरा दी। तब भगवान कृष्ण ने अपने सात रूप बनाए, ताकि वे सातों बैलों को एक साथ काबू में कर सकें। 

नग्नजिति से विवाह

सातों बैल बड़े गुस्से से हुंकार रहे थे। यह देखकर वहां आए राजा और राजकुमार अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। भगवान कृष्ण ने बैलों के सिर को प्यार से सहलाया और उन्हें देखकर मुस्कराए। सातों बैल तत्काल शांत हो गए। फिर उन्होंने बड़ी आसानी से सातों बैलों को नकेल पहना दी, मानो यह कार्य उनके लिए बच्चों का कोई खेल हो। 

जब अन्य देशों के राजकुमार और राजा भगवान कृष्ण से लड़ने आए, तो उन्होंने सबको हरा दिया। राजा नग्नजित भगवान कृष्ण की बहादुरी से बहुत खुश हुए और उन्होंने अपनी पुत्री नग्नजिति का विवाह उनके साथ कर दिया। भगवान कृष्ण अपनी नई पत्नी नग्नजिति को लेकर द्वारका नगरी की ओर चल पड़े। 

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