विलियम हार्वे की जीवनी | William Harvey biography in hindi

विलियम हार्वे की जीवनी

विलियम हार्वे की जीवनी | William Harvey biography in hindi

सन् 1578 ई० में विश्व के महान् वैज्ञानिक और चिकित्सक विलियम हार्वे का जन्म हुआ। विलियम हार्वे बचपन से कुशाग्र बुद्धि के थे और वे जैसे-जैसे बड़े होते गए, वैसे-वैसे उनकी रुचि शरीर-रचना-विज्ञान की ओर बढ़ती गई। जब विलियम पन्द्रह-वर्ष के थे, तब उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहां उन्होंने अपना प्रिय विषय शरीररचना-विज्ञान ही लिया था। अपना प्रिय विषय पढ़ते हुए उनका ध्यान उन धमनियों और शिराओं की ओर केन्द्रित हो गया, जिनके द्वारा रक्त शरीर में भ्रमण किया करता था। 

उन दिनों तक किसी को रक्त और शरीर के भीतर उसके संचार की विशेष जानकारी नहीं थी। कुछ वैज्ञानिकों का कहना था कि रक्त यकृत में बनता है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना था कि रक्त उदर से आता है। जबकि तत्कालीन सुविख्यात डॉक्टर का 

कथन था कि रक्त दो प्रकार का होता है, एक धमनियां नामक बड़ी वाहिकाओं में आगे-पीछे चलता है और दूसरा शिरा नामक छोटी नलियों में प्रवाहित होता है। इस विषय में शरीर रचना का हर एक अध्यापक अपना अलग सिद्धान्त पढ़ाता था।

अंग्रेज युवक विलियम हार्वे ने कैम्ब्रज में बहुत अच्छे अंकों से परीक्षा पास की, किन्तु उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जो कुछ, सीखा, उससे सन्तुष्ट नहीं हुए। रक्त संचरण के विषय में इतने सारे मत थे कि उनमें गलत-सही का निर्णय लेना कठिन था। मगर फिर भी कदाचित उस समय उन्होंने यह आभास नहीं किया कि वह एक ऐसी विकट समस्या है जिसे पूरी तरह से हल करने में कितने ही वर्ष लग जाएंगे। 

विलियम हार्वे चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने के लिए पौडुआ विश्वविद्यालय इटली चले गए। उन दिनों यहां खगोल विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में गैलीलियो गैलिली कार्यरत थे। इसे विलियम का सौभाग्य ही कहा जाएगा, जो उन्हें उस विश्वविद्यालय में शरीर-रचना-विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में कुशल शल्य-चिकित्सक फैब्रिशस मिले। इस कुशल शल्य चिकित्सक को कुछ दिन पहले ही यह पता चला था कि शिराओं में नन्हीं कपाटिकाएं अथवा वाल्व होते हैं। वे अपनी खोज मे यहीं तक पहुँचे थे, किन्तु इतना संकेत इनके शिष्य विलियम हार्वे के लिये पर्याप्त था। 

विलियम ने निश्चय किया कि इन नन्हीं कपाटिकाओं तथा उनके कार्य के सम्बन्ध में और अधिक जानकारी जुटाएंगे। इस निश्चय के साथ ही जब भी उन्हें मौका मिलता, वे पक्षियों, मेंढकों और खरगोशों के शरीर की चीर-फाड़ करके उनकी रक्तवाही नलिकाओं को बड़े ध्यान से देखते थे। उन्होंने देखा कि शिराओं की कपाटिकाएं सदैव हृदय की ओर ही खुलती हैं तथा धमनियों में भी कपाटिकाएं होती हैं, जो हमेशा हृदय से परे को खुलती हैं। विलियम हार्वे ने जब जीवित जन्तुओं पर प्रयोग करने शुरू किए तो, उन्हें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संकेत प्राप्त हुए-शिराओं में सदैव रक्त हृदय की ओर बहता है और धमनियों में रक्त सदैव हृदय से दूर को बहता है। कपाटिकाएं सिर्फ एक ओर को रक्त को सही दशा में बहता रखने के लिए खुलती हैं।

अब उनके सामने पड़ा पर्दा धीरे-धीरे हटता जा रहा था। डॉक्टर की उपाधि लेकर विलियम हार्वे ने अपना चिकित्सालय लंदन में खोला। शीघ्र ही उनके पास रोगियों की भीड़ लगने लगी। अब उन्हें जन्तुओं के साथ मानव हृदय एवं रक्त को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। 

उन्होंने रक्त के सम्बन्ध में जो कुछ देखा, उस सबका सावधानी से ब्यौरा लिख लिया। अवकाश के समय में वह जन्तुओं पर प्रयोग करते रहते थे। फिर रात-दिन उन्होंने अपने सिद्धान्त की रचना की और उसके लिए पर्याप्त प्रमाण एकत्रित किए। अपने विषय पर अनुसंधान करते हुए वर्षों बीत गए। 

अन्त में विलियम हार्वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हृदय हमारी मुट्ठी के बराबर खोखली पेशी है। यह पम्प के समान कार्य करता है। जब हृदय सिकुड़ता है, तो अनुमानतः 60 ग्राम रक्त धमनियों में भेजता है और फिर हृदय ढीला पड़ जाता है और उस वक्त तक फूलता है जब तक कि दूसरी बार सिकुड़ने का वक्त नहीं आ जाता। जब चिकित्सक आपकी नाड़ी का निरीक्षण करता है, तो वह उसकी धड़कनों के माध्यम से, रक्त पम्प करने की क्रिया मे हृदय की धड़कनों को गिनता है। अवस्था और लिंग के अनुसार नाड़ी की धड़कन 72-90 प्रति मिनट होती है। 

सामान्य युवक का हृदय प्रति मिनट 60 से 90 बार रक्त पम्प करता है। उन्होंने हिसाब लगाया कि मानव हृदय प्रति घण्टा 290 लीटर से अधिक रक्त पम्प करता है। यह उनके लिए अन्तिम संकेत था। निश्चय ही मानव हृदय प्रति घण्टा 290 लीटर रक्त बनाकर शरीर का विनाश नहीं कर सकता था। सामान्य मानव के शरीर में रक्त की 4.5 से 5.7 लीटर रक्त मात्रा रहती है। ऐसी दशा में वही रक्त मानव देह के भीतर एक तरह के चक्र में घूमता रहता है।

डॉ० विलियम हार्वे को अंततः सिद्धान्त मिल गया कि रक्त मानव शरीर में परिसंचरित होता है। रक्त हृदय से धमनियों की एक दिशा की कपाटिकाएं रक्त को हृदय से दूर बहाती हैं। शिराओं की कपाटिकाएं रक्त को हृदय की ओर वापस लाने में सहायता करती हैं। ने हृदयों, धमनियों तथा शिराओं की बारम्बार तब तक परीक्षा की, जब तक उन्हें खुद अपने सिद्धान्त पर पूर्ण सन्तोष नहीं हो गया। तत्पश्चात, उन्होंने अपने विचार अन्य चिकित्सकों के सामने रखे। इस कार्य में बारह वर्ष बीत गए। 

आखिर में विलियम हार्वे ने अपने समस्त कार्यों को सावधानी से किया और उसे एक कृति का रूप दे दिया, जिसका नाम ‘हृदय और रक्त की गति’ है। इस पुस्तक के प्रकाशन से चिकित्सक जगत में खलबली मच गई। यह सत्ररहवीं शताब्दी का युग था, जब लोग डायनों और प्रेतों में विश्वास करने वाले अंधविश्वासी थे। नए विचार और नई धारणाएं उनके गले नहीं उतरती थीं। कुशल और सुशिक्षित चिकित्सक भी पुराने अंधविश्वासों से जुड़े हुए थे। किन्तु अंत में सत्य की जीत हुई और डॉ० विलियम हार्वे का रक्त परिसंचरण का सिद्धान्त वैज्ञानिक रूप से स्वीकारा गया।

 विलियम हार्वे की मृत्यु सन् 1657 ई० में हुई। शल्य चिकित्सा के जगत् में वह अपने सिद्धान्तों के रूप में आज भी जिन्दा हैं। 

 

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