धन के देवता कुबेर की पूजा क्यों की जाती है ?

धन के देवता कुबेर की पूजा क्यों की जाती है

धन के देवता कुबेर की पूजा क्यों की जाती है ?

भाव, कुबेर को लक्ष्मी से भिन्न एक दूसरा ही रूप प्रदान करता है। 

कहा जाता है कि पूर्वजन्म में कुबेर चोर थे। एक बार चोरी के लिए वे एक शिव मंदिर में घुसे। तब मंदिरों में बहुत खजाना रहता था। उसे ढूंढने के लिए कुबेर ने दीपक जलाया, लेकिन हवा के झोंके से वह बुझ गया। कुबेर ने फिर दीपक जलाया, लेकिन वह फिर बुझ गया। जब यह क्रम कई बार चला, तो भोले-भाले औढरदानी शंकर ने इसे अपनी आराधना समझ लिया और प्रसन्न होकर अगले जन्म में कुबेर को धनपति होने का आशीष दिया।

कुबेर के संबंध में प्रचलित है कि उनके तीन पैर और आठ दांत हैं। अपनी कुरूपता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी मूर्तियां अधिकतर बेडौल पाई जाती हैं। शतपथ ब्राह्मण में तो इन्हें राक्षस ही कहा गया है। वहां वे चोरों, लुटेरों और ठगों के सरदार के रूप में वर्णित हैं। इन बातों से स्पष्ट है कि धनपति होने पर भी कुबेर का व्यक्तित्व और चरित्र वैसा नहीं था, जैसा विष्णु प्रिया धन की देवी लक्ष्मी का। 

कुबेर रावण के ही कुल-गोत्र के कहे गए हैं। रावण ने भी तो अपार स्वर्ण भंडार किया था, क्या यह सब कुबेर का था? नहीं, वह रावण की अपनी करतूतों का परिणाम था। वह बहुत निर्ममता से अपनी प्रजा से धन वसूलता था, अपनी प्रजा से रक्त वसूलने से भी नहीं हिचकता था और उसे घड़े में भरकर जमीन के अंदर गाड़कर रखता था। जब उसके पाप के घड़े भर गए, तो उसी से सीता का जन्म हुआ, जो उसके विनाश का कारण बनी। ऐसे रावण के अग्रज कुबेर कैसे रहे होंगे और उन्होंने कैसे धन बटोरा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। 

कबेर को राक्षस के अतिरिक्त यक्ष भी कहा गया है। यक्ष धन का रक्षक ही होता है। उसे भोगता नहीं। कुबेर का जो दिक्पाल रूप है, वह भी उसके रक्षक और प्रहरी रूप को ही स्पष्ट करता है। पुराने मंदिरों के बाहरी भागों में कुबेर की मूर्तियां इसीलिए बनी होती थीं कि वे मंदिरों के धन के रक्षक के रूप में कल्पित और स्वीकृत हैं। कौटिल्य ने भी खजानों में रक्षक के रूप में कबेर की मूर्तियां रखने के बारे में लिखा है। 

शुरू के अनार्य देवता कुबेर, बाद में आर्य देव भी मान लिए गए। यह संभवतः उनके धन के प्रभाव के कारण ही हुआ होगा। काला धन कम प्रभावशाली हुआ होगा। काला धन कम प्रभावशाली नहीं होता। बाद में पुजारी और ब्राह्मण भी कुबेर के प्रभाव में आ गए और देवों की भांति उनकी पूजा का विधान भी प्रचलित हो गया। तब विवाह आदि मांगलिक अनुष्ठानों में कुबेर के आह्वान का विधान हुआ। लेकिन यह सब होने पर भी ये द्वितीय कोटि के देवता ही माने जाते रहे। धन को शुचिता के साथ जोड़कर देने की जो आर्य परंपरा रही है, संभवत: उसमें कुबेर का अनगढ़ व्यक्तित्व नहीं खप सका होगा। 

बाद में शास्त्रकारों पर कुबेर का यह प्रभाव बिलकुल नहीं रहा। वे देवताओं के धनपति होकर भी दूसरे स्थान पर ही रहे, लक्ष्मी के समकक्ष न ठहर सके। इसलिए बाद में लक्ष्मी पूजन की परंपरा ही कायम रही। लोग धीरे-धीरे कुबेर को पूजने से निरंतर कतराते चले गए।

कुबेर की पूजा क्यों की जाती है ?

लक्ष्मी के धन के साथ मंगल का भाव भी जुड़ा हुआ है। साथ ही वे धन देने वाली भी हैं। धन संचित रखती हैं और दूसरों को नहीं देतीं, ऐसा कोई जिक्र कहीं नहीं मिलता। जबकि कुबेर के धन के साथ लोकमंगल का भाव प्रत्यक्ष नहीं है। लक्ष्मी का धन स्थायी नहीं, गतिशील है। इसलिए उनका चंचला नाम प्रचलित हुआ। जबकि कुबेर का धन खजाने के रूप में जड़, अत्यंत भौतिक और स्थूल है।

एक पाषाण पुरुष के धन से यह अपेक्षा भी कैसे की जा सकती है कि. वह लोकोपकारी और गतिशील होगा? ऐसा अगतिशील धन काला धन ही हो सकता है। 

कुबेर का निवास वटवृक्ष पर बताया गया है, ऐसे वृक्ष घर आंगन में नहीं होते, गांव के केंद्र में भी कम ही होते हैं, वे अधिकतर गांव के बाहर या बियाबान में होते हैं। उन्हें धन का घड़ा लिए कल्पित किया गया है। कहां लक्ष्मी के धन की मनोरम कल्पना, धान की बालियां और पिटारी आदि और कहां कुबेर का बनियों सा महाजनी रूप। दोनों में कहीं कोई समानता नहीं है। लोक मानस में उनका महत्व इससे ज्यादा कैसे हो सकता था? 

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