रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है | Why is Raksha Bandhan celebrated?

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है | Why is Raksha Bandhan celebrated?

पर्व के रूप में रक्षा बंधन कब से मनाया जाने लगा, इसके बारे में ठीक-ठीक कुछ कहना कठिन है। मगर हमारी संस्कृति में इसकी मूल भावना अत्यंत प्राचीन काल से मौजूद रही है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के वामनावतार ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था और उसके बाद ही उन्हें पाताल जाने का आदेश दिया था। आज भी रक्षा बंधन के समय जो मंत्र पढ़ा जाता है, उसमें इसका जिक्र होता है। 

येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः। 

।तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

अर्थात यह वही रक्षा सूत्र है, जिससे महाबलवान राक्षसों के राजा बलि बांधे गए। रक्षा सूत्र, तुम चल-विचल मत हो, प्रतिष्ठित बने रहो। 

प्राचीन भारत में ऋषि सामान्यतः श्रावण के कार्तिक तक के चार महीनों में भ्रमण नहीं करते थे। इस अवधि में वे किसी एक ही स्थान पर रुक कर प्रवचन, यज्ञ आदि किया करते थे। यज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्यक्तियों के हाथों में अक्सर चिह्न के रूप में यज्ञ सूत्र बांध दिया जाता था। यही यज्ञ सूत्र आगे चलकर रक्षा सूत्र के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। रक्षा सूत्र का अर्थ है रक्षा की व्यवस्था। जिस व्यक्ति के रक्षा सूत्र बंध जाता है, उसकी रक्षा की भावना ही रक्षा के सूत्र में निहित है। आज भी यज्ञ, कथा और पूजन आदि में रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा है। तांत्रिक साधना में भी गुरुजन अपने शिष्यों को भूत-प्रेत आदि के आक्रमण से बचाने के लिए रक्षा सूत्र बांधते हैं। 

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है

महाभारत की एक कथा के अनुसार एक समय देवताओं और राक्षसों में भयानक युद्ध हुआ। जो लंबे समय तक चला। इसमें राक्षस विजयी हो रहे थे। यह आशंका होने लगी कि राक्षस देवताओं से इंद्रलोक छीन लेंगे। इस पर इंद्राणी भयभीत होकर देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास पहुंची और उनसे समस्या का समाधान पूछा। गुरु बृहस्पति ने बताया कि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को इंद्राणी, इंद्र को तिलक लगाए और उसकी दाहिनी भुजा पर वेदज्ञ ऋषियों द्वारा अभिमंत्रित रक्षा सूत्र बांध दे, इंद्राणी ने ऐसा ही किया और इससे या पासा पलटने लगा। देवताओं की जीत हुई। यह पौराणिक घटना हमारे पास समाज में महिलाओं की प्रतिष्ठा और उनके विशिष्ट स्थान को भी उजाल करती है। महिलाएं शक्ति और प्रेरणा की स्रोत हैं। उनके द्वारा दिया गया स्नेह पुरुषों में शक्ति का संचार करता है और उन्हें सफलता की तरफ आगे बढाता है। रक्षा बंधन में मूलतः दो भावनाएं काम करती रही हैं। प्रथम, जिस व्यक्ति को रक्षा सूत्र बांधते हैं, उसके कल्याण की कामना और दूसरे रक्षा बंधन करने वाली की, उनके प्रति स्नेह भावना। इस प्रकार रक्षा बंधन वास्तव में स्नेह, अपनत्व, शांति और रक्षा का बंध है। 

मध्यकाल में रक्षा की इस भावना का दोहरा अर्थ माना जाने लगा। प्रथम, जिस व्यक्ति को राखी बांधी जाए, उसकी कल्याण की कामना और दूसरे राखी बांधने भेजने वाले की सहायता। मुगल शासन काल में अनेक महिलाओं ने आक्रमणकारियों से बचने के लिए, बहादुर व्यक्तियों को रक्षा सूत्र भेजे और उन व्यक्तियों ने बिना किसी धर्म या जाति का भेदभाव किए, उन महिलाओं की रक्षा की। इसमें महारानी कर्णवती की घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हुमायूं के बाद, अन्य बादशाह भी, रक्षा बंधन के महत्व को स्वीकारते रहे और अपनी प्रजा के साथ उत्साह से यह उत्सव मनाते रहे। फलस्वरूप रक्षा बंधन का उत्सव सांप्रदायिक सौहार्द का भी प्रतीक बन गया है। 

रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है

अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासनकाल में रक्षा बंधन की शान-शौकत और भी बढ़ गई। इस अवसर पर लाल किले में आठ दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं। झूले डाले जाते थे, तरह-तरह के पकवान तैयार होते थे। रक्षा बंधन के दिन हिंदू महिलाएं बादशाह को राखी बांधती थीं और सम्राट स्नेहपूर्वक स्वीकार करते हुए उन्हें तरह-तरह के उपहार देते थे। 

हमारे राष्ट्रीय आंदोलन में भी रक्षा बंधन का विशेष योगदान रहा है। 1905 में जब अंग्रेजी सरकार ने बंगाल का विभाजन करके उसकी बढ़ती हई राधीयता को रोकने का प्रयत्न किया था तो दोनों क्षेत्रों की जनता ने आपस में एक दुसरे के राखी बांधकर, अपनी एकता की दृढ़ भावना को व्यक्त किया था। स्वदेशी आंदोलन के समय भी सबको विदेशी सूत्र की राखी बांधने का आह्वान किया गया था।

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