राधा अष्टमी क्यों मनाई जाती है | Why is Radha Ashtami celebrated?

राधा अष्टमी क्यों मनाई जाती है

राधा अष्टमी क्यों मनाई जाती है | Why is Radha Ashtami celebrate

भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति राधिका का प्राकट्य ब्रज क्षेत्र में बरसाना गांव के सरदार वृषभानु के घर इसी दिन हुआ था। इसीलिए इन्हें वषभान कुमारी, बरसाने की बाला आदि नामों से भी पुकारा जाता है। समूचे ब्रज क्षेत्र में, इस दिन का महत्व जन्माष्टमी की भांति ही माना जाता है। इस दिन लोग उपवास रखते हैं, मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है एवं स्थान-स्थान पर राधा-कृष्ण की लीलाओं का मंचन होता है। दांपत्य जीवन में स्नेह एवं आनंद की कामना से इस उत्सव को बड़े उत्साह एवं पारंपरिक ढंग से मनाया जाता है। इस दिन राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है। 

ब्रज के प्राण ब्रजनंदन की आत्मा श्री राधिका हैं-‘आत्मा तु राधिका तस्य!’ एक रूप से राधा कृष्ण की आराधिका-उपासिका हैं तो दूसरे रूप में वे आराध्य और उपास्य भी हैं-‘आध्यते असौ इति राधा।’ शक्ति एवं शक्तिमान में वस्तुत: कोई भेद न होने पर भी भगवान के विशेष रूपों में शक्ति की प्रधानता है। शक्तिमान की सत्ता ही शक्ति के आधार पर है। शक्ति नहीं तो शक्तिमान कैसे? रस्यते असौ इति रस:-इस व्युत्पत्ति के अनुसार रस की सत्ता ही आस्वाद के लिए है। अपने आपको अपना आस्वादन कराने के लिए ही स्वयं रसरूप (रसो वैः) श्रीकृष्ण, राधा बन जाते हैं, इसीलिए ब्रज में राधा की विशेष महिमा है।

Why is Radha Ashtami celebrated

श्रीकृष्ण  प्रेम के पुजारी हैं इसीलिए वे अपनी पुजारिन के रूठ जाने पर उन्हें हर विधि से मनाते हैं। ‘चांपत चरन मोहनलाल’ तथा ‘देख्यो दुर्यो वह कुंज कुटीर में बेट्यो पलोटत राधिका पायन!’ आदि उक्तियों द्वारा कवियों ने कृष्ण की इसी प्रेम प्रवणता की ओर संकेत किया है। शक्ति की प्रधानता को घोषित करने के लिए ही राधाकृष्ण, सीताराम आदि युगल नामों में राधा और सीता के नामों का उल्लेख पहले किया जाता है। 

प्रेम का अर्थ त्याग है इसीलिए प्रेमियों ने भगवत प्रेम को अर्थ काम मोक्ष इन पुरुषार्थों से ही नहीं, मोक्षरूप परमपुरुषार्थ से श्रेष्ठ माना ।” की सर्वोच्च अभिव्यक्ति ही श्री राधारानी हैं। 

प्रेम की चरम परिणति गोपीजन में हुई है। इन्हें प्रेम की मर्तिमान कर कहें तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। गोपियां राधा की ही अंशभता है। ‘तत्सुखसुखित्वम्’ ही इनका आदर्श है, जो प्रेम का मूलमंत्र है। नारद ने अपने भक्ति सूत्रों में इन्हीं को भक्ति का सर्वश्रेष्ठ आदर्श माना है। 

राधा, रुक्मिणी और सीता में कोई भेद नहीं है। भगवान के विभिन्न सचिदानंदमय दिव्य लीला विग्रहों में विभिन्न नाम-रूपों में उनकी यह आह्लादिनी शक्ति सदा साथ रहती है। नाम-रूपों में पृथकता दीखने पर भी वस्तुतः वे सब एक ही हैं। राधा प्रेममयी है और कृष्ण आनंदमय हैं। राधा एवं कृष्ण का विछोह कभी संभव ही नहीं है। न राधा के बिना कृष्ण कभी रह सकते हैं, और न कृष्ण के बिना राधा। राधा नित्य निरंतर, अनंत ऐश्वर्य, अनंत सौंदर्य, माधुर्य लावण्य निधि, सचिदानंद कृष्ण को आनंद प्रदान करती हैं। इस आह्लादिनी शक्ति की लाखों अनुगामी शक्तियां मूर्तिमयी होकर प्रतिक्षण सखी, मंजरी, सहचरी और दूती आदि रूपों में राधाकृष्ण की सेवा किया करती हैं। राधा को सुख पहुंचाना एवं उन्हें प्रसन्न करना ही इनका एकमात्र कार्य होता है। इन्हीं का नाम गोपीजन है। 

वृंदावन की लीला कोई लौकिक लीला नहीं थी। लौकिक दृष्टि में तो 11 वर्ष की अवस्था में ही कृष्ण ब्रज का परित्याग करके मथुरा चले गए थे। इतनी छोटी अवस्था में स्त्रियों के साथ प्रणय की कल्पना नहीं की जा सकती। वास्तव में कृष्ण एवं राधा अलौकिक जगत में सर्वदा एक ही हैं। भागवत में राधा का रूप प्रकट रूप में नहीं आया है। परंतु वह उसमें उसी प्रकार छपा हुआ है, जैसे शरीर में आत्मा। राधा का अस्तित्व ही कृष्ण की दिव्य लीला को प्रकट करता है। 

राधा पूर्ण शक्ति हैं-कृष्ण पूर्ण शक्तिमान हैं। राधा दाहिका शक्ति हैं, कष्ण साक्षात अग्नि, राधा प्रकाश हैं-कृष्ण भुवन-भास्कर, राधा ज्योत्सना हैं-कष्ण पर्ण चंद्र हैं। इस प्रकार दोनों नित्य एक स्वरूप हैं। प्रेम शक्ति का चरमस्वरूप राधा हैं। प्रेमभक्ति के इस भाव का यथार्थ स्वरूप अतिरिक्त समस्त विश्व के दर्शन में कहीं नहीं मिलता।

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