नवरात्र क्यों मनाया जाता है, जानिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण | नवरात्रि क्यों मनाई जाती है

नवरात्रि क्यों मनाई जाती है

नवरात्र क्यों मनाया जाता है, जानिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण | नवरात्रि क्यों मनाई जाती है |नवरात्र में शक्ति पूजन 

नवरात्र शब्द से नव अहो रात्रियों का बोध होता है। इस काल में शक्ति के नव रूपों की पूजा दिन से लेकर रात्रि पर्यंत की जाती है । रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। भारतीय ऋषि-मनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है, इसलिए वर्ष में दो बार नवरात्रों का उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यदि रात्रि का कोई विशेष वैज्ञानिक रहस्य न होता, तो ऐसे विशेष उत्सवों को रात्रि न कहकर दिन ही कहा जाता। किंतु दीपावली को दिन नहीं रात्रि ही कहा गया है। इसी प्रकार महारात्रियों में होलिका महारात्रि और महाशिवरात्रि और इसी भांति ये दो नवरात्रियां ही होती हैं, नव दिन नहीं। भारतीय मनीषियों ने वर्ष में दो बार विशेष रूप से नवरात्रियों का पर्व मनाने का विधान बताया है। सर्वप्रथम विक्रम संवत् के प्रारंभ के दिन से अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) में दो दिन पर्यंत अर्थात नवमी तक नवरात्र निश्चित किए गए हैं। इसी प्रकार ठीक छह मास बाद शारदीय नवरात्र आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयदशमी से एक दिन पूर्व तक नवरात्रियों का पर्व माना गया । परंतु शारदीय नवरात्र ही सभी दृष्टियों से सबसे महत्वपूर्ण नवरात्रियां मानी गई 

इन नवरात्रों में विशेष आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए सभी प्रकार के उपवास, ध्यान, व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, साधना आदि करते हैं। विशेष साधक इन रात्रियों में पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या विशेष योग साधना या विशेष बीजमंत्रों का निरंतर जाप करके सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं।

नवरात्र क्यों मनाया जाता है

नवरात्रों में देश के 51 शक्ति पीठों पर बड़े उत्साह से शक्ति उपासना करने के लिए अपार जनसमुदाय एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं जा पाते, वे अपने आवास पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं। आजकल ज्यादातर उपासक यह शक्ति पूजा रात्रि में नहीं, पंडित जी को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। पंडित, विद्वान, साधु, महात्मा नवरात्रि में कोई जागना नहीं चाहता, कोई आलस्य को नहीं त्यागना चाहता। इसलिए सभी पूजा-पाठ दिन में संपन्न करा लिए जाते हैं। शक्ति की पूजा के लिए प्रधान बीजमंत्र ‘ऐं ह्रीं क्लीं’ है और ये तीनों ध्वनियां (बीज या मंत्र) संसार को संचालित करने वाली सर्जक, पालक और संहारक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। 

हमारे मनीषियों ने रात्रि के महत्व को वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध कम हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से पूर्णतः सहमत है कि दिन में आवाज हो जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी, किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो बहत दूर तक जाती है। दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियों तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल हो जाता है, जबकि सूर्य अस्त हो जाने के बाद छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है। इसी प्रकार शायद मंत्र, तप या विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती हो। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। 

मंदिरों में आरती सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के उपरांत अर्थात रात्रि में करने की व्यवस्था शास्त्रों में की गई है। घंटे और शंख भी मंदिरों में प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व व सायंकाल में सूर्यास्त के बाद बजाए जाते हैं। घंटा और शंख के शब्द घोष के उत्पन्न कंपन्न रात्रिकाल में अधिक दूरी तक वातावरण को प्रभावित करते हैं। इसलिए ऋषि-मुनियों ने आत्मिक, मानसिक शक्तियों के संचय के लिए उपासना के लिए सभी धर्मों में रात्रि के समय ही यंत्र साधना, उपासना, यौगिक साधना, इबादत या प्रेयर आदि करने का विशेष विधान बनाया है। नवरात्रियां संधिकालों में आती हैं। विशेष रूप से दोनों नवरात्र ऋतु परिवर्तन के समय ही आते हैं। इसलिए नवरात्रों के समय व्रत करने की धार्मिक आज्ञा की गई है। 

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