नागपंचमी क्यों मनाई जाती है | Why is Nagpanchami celebrated?

नागपंचमी क्यों मनाई जाती है

नागपंचमी क्यों मनाई जाती है | Why is Nagpanchami celebrated?

सावन के महीने में शुक्लपक्ष की पंचमी को नागपंचमी का पर्व माना जाता है। वर्षा ऋतु में अपने बिलों से निर्वासित हुए सर्प हमें अक्सर दिखाई देते हैं, तब हम उन्हें संरक्षण एवं आश्रय देकर तथा उनकी पूजा कर स्वयं को कृतज्ञ समझते हैं। हमारी संस्कृति की यह विशेषता है कि इसमें जीवन को पोषित करने वाले जीवनोपयोगी पशु-पक्षी, पेड़-पौधे एवं वनस्पति सभी को आदर दिया गया है। जहां एक ओर गाय, पीपल, बरगद तथा तुलसी आदि की पूजा होती है, वहीं अपने एक दंश से मनुष्य की जीवन लीला समाप्त करने वाले नाग को भी अभय प्रदान करने की व्यवस्था है। इस विषधर जीव को शास्त्रों में देवतुल्य माना गया है। 

पौराणिक कथाओं में देवाधिदेव शिव अपने गले में सांपों की माला धारण करते हैं। पशुओं के संरक्षक होने के कारण ही शिव को पशुपतिनाथ कहा जाता है। शिव के उपासकों के लिए पशुओं के प्रति दया का व्यवहार आवश्यक है, तभी वे पशुपतिनाथ की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। भगवान विष्णु के मानवेतर अवतारों के पीछे इसी दर्शन की प्रधानता रही है। भगवान विष्णु द्वारा शेषनाग की शय्या पर शयन करने का भी यही आशय है कि यदि दुर्जन प्रभु के कार्य में जुट जाएं तो वह भी भगवान का प्रिय बन सकता है तथा भगवान उसे स्वीकार भी करते हैं। 

नागपंचमी क्यों मनाई जाती है

नागों एवं सर्पो का सृष्टि के विकास से बहुत पुराना संबंध रहा है। देवों दानवों द्वारा किए गए सागर मंथन के समय सुमेरू पर्वत को मथनी तथा वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया था। अपने इस कार्य से वासुकि नाग ने दुर्जनों के लिए भी सामाजिक कार्य में भागीदारी का मार्ग खोला था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि दुर्जन ठीक मार्ग पर आ जाएं तो वह भी समाज के उन्नयन में बहुत बड़ा योगदान कर सकता है। देव, दानव एवं अनेक मानवेतर जातियों ने मिलकर ही सागर के गर्भ में छिपे असंख्य मणि, मोती, मुक्ताओं एवं रत्नों की प्राप्ति के लिए प्रयास किया तथा इस कार्य में नाग-जाति ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। 

भारत कृषि प्रधान देश रहा है। हमारे खेतों में खड़ी फसलों को अनेक जीव-जंतु, चूहे आदि नुकसान पहुंचाते हैं। सर्प इन जीवों को नष्ट कर हमारे खेतों की रक्षा करते हैं। इसीलिए सर्पो को क्षेत्रपाल’ भी कहा गया है। वराह पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने शेषनाग को पृथ्वी का भार उठाने के लिए भेजा था। शायद पृथ्वी को धारण करने का अर्थ खेती और फसलों की रक्षा ही है। इसीलिए वास्तुपुरुष के रूप में भी सर्प की ही पूजा की जाती है। 

वस्तुतः सर्पो की रक्षा पर्यावरण एवं संस्कृति दोनों के लिए आवश्यक है। इस प्रजाति को कहीं हम उपयोगी एवं हानिकारक समझकर समाप्त ही न कर दें। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने यह व्यवस्था की कि वर्ष में कम से कम एक दिन नागपंचमी के रूप में हम इस विषय पर अपना ध्यान केंद्रित कर लें। इस पर उन्होंने धर्म का स्वरूप प्रदान कर हमारे लोक जीवन में सुनिश्चित किया। यह प्रकृति संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम है। वैसे भी सर्प किसी को अकारण नहीं काटता, जब हम उसे कोई हानि पहुंचाते हैं, तभी वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने विष का प्रयोग करता है। आत्मरक्षा तो सभी प्राणी करते हैं। क्या हम अपने ऊपर होने वाले आक्रमण का प्रतिकार नहीं करते? 

हमारी संस्कृति में श्राद्ध एवं तर्पण के अवसर पर ऋषियों, अन्य मनुष्यों, पशुओं और वनस्पतियों के लिए भी तृप्ति की कामना की जाती है। उस समय नागों, राक्षसों को भी तृप्त करने की परंपरा है, जो हमारी ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ की भावना की पुष्टि करती है। आश्चर्यजनक रूप से विश्व के लगभग हर कोने में किसी न किसी रूप में नागों की अथवा सर्पो की पूजा होती है। विश्व के कई राजवंश स्वयं को नागवंशी मानते हैं। बाली एवं जावा के निवासी आज भी स्वयं को नागजाति का वंशज मानते हैं। जापान, कोरिया, मिस्र, यनान, चीन, दक्षिण एशिया एवं अफ्रीका के अनेक देशों में आज भी सर्पो की पूजा की जाती है।

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