महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है | Why is Mahashivratri celebrated?

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है

फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अतः उनकी रात्रि में व्रत किए जाने से इस व्रत का नाम शिवरात्रि होना सार्थक हो जाता है। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है, किंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ (अर्धरात्रि) में शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था, इस कारण यह महाशिवरात्रि मानी जाती है। चतुर्दशी की इस रात्रि के चारों पहरों में अलग-अलग विधियों द्वारा भगवान भोलेनाथ की पूजा एवं अभिषेक करने का शास्त्रीय विधान है। 

शिवरात्रि के व्रत में कठिनाई तो इतनी है कि इसे वेदपाठी विद्वान ही यथाविधि संपन्न कर सकते हैं और सरलता इतनी है कि पठित-अपठित, धनी निर्धन सभी अपनी-अपनी सुविधा तथा सामर्थ्य के अनुसार शिव का पूजन कर सकते हैं । दयालु आशुतोष भगवान छोटी से छोटी तथा बड़ी से बड़ी सभी पूजा से प्रसन्न होते हैं । शिव-शक्ति के प्रतीक ज्योतिर्लिंग (शिवलिंग) का प्रादुर्भाव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को निशीथकाल में हुआ था। शिव पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने इसी दिन रुद्ररूपी शिव को उत्पन्न किया था। भगवान शिव एवं हिमाचल पुत्री पार्वती का विवाह भी इसी दिन हुआ था। अत: यह शिव एवं शक्ति के पर्ण समरस होने की रात्रि है।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है

मनुष्य सृष्टि चालक के स्वरूप एवं उसके साथ अपने संबंधों के बारे में सहस्रों वर्षों से विचार करता रहा है। सृष्टि का सृजन हुआ है, उसका पालन हो रहा है और जिसका सर्जन होता हो, उसका विनाश निश्चित है। इसी भावना के अनुरूप सर्जक, पोशण एवं संहारक हेतु ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश | एक ही शक्ति को दिए गए अलग-अलग नाम हैं। भगवान शिव का एक |स्वरूप अर्धनारीश्वर भी माना गया है। एक ही चिरंतन शक्ति की शास्त्रकारों  ने कभी पुरुष रूप में तो कभी स्त्री रूप में कल्पना की है। वास्तव में वह  शक्ति न तो पुरुष है और न ही स्त्री। उस शक्ति के पौरुष और साहस की कल्पना करके हमारे ऋषियों ने उसे पुरुष ठहराया, तो इसमें उपस्थित प्रेम एवं कारुण्य देखकर उसकी स्त्री रूप में कल्पना की है-‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव।। 

पुरुष के विवेक, कर्तव्य, पौरुष, निर्भयता, ज्ञान-ये सभी गुण स्त्री में आने चाहिए तथा स्त्री से लज्जा, स्नेह, प्रेम, दया, माया, ममता आदि गुण पुरुष में आने चाहिए। स्त्री-पुरुष के गुणों के परस्पर मिलने से ही उत्कल मानव का सृजन होता है। इसी कारण भगवान शिव ने अपना आधा अंग पार्वती को दे दिया-‘अर्धांगे पार्वती दधौ।’ 

सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि के मूल में दो तत्व हैं-प्रकृति एवं पुरुष। श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि प्रकृति एवं पुरुष के आधार पर यह स  सृष्टि निर्मित हुई है। एक तत्व के बिना दूसरा तत्व पंगु है। 

भारतीय संस्कृति की भांति शिव-परिवार में भी समन्वयकारी गुण दृष्टिगोचर होते हैं। वहां जन्मतः विरोधी स्वभाव के प्राणी भी शिव के प्रताप से परस्पर प्रेमपूर्वक निवास करते हैं। भगवान शंकर का वाहन बैल है तथा माता पार्वती का वाहन सिंह, गणेश का वाहन मूषक है तो शिव के गले का हार सर्प एवं कार्तिकेय का वाहन मयूर है। ये सभी परस्पर वैरभाव छोडकर सहयोग एवं सद्भाव से रहते हैं। शिव परिवार का यह आदर्शतम रूप प्रत्येक परिवार एवं समाज के लिए ग्राह्य है। वस्तुत: अपने विरोधियों एवं शत्रुओं को मित्रवत बना लेना ही सच्ची शिव भक्ति है। जिनका जगत में कोई नहीं है, उनके अशरण-शरण भगवान शंकर हैं। जिन्हें समाज तिरस्कृत करता है, उन्हें भगवान शिव गले लगाते हैं। तभी तो अछूत सर्प उनके गले का हार है अधमरूपी भूत-पिशाच शिव के साथी एवं गण हैं। जिनकी उपेक्षा समाज करता है, भगवान शिव उन्हें आमंत्रित करते हैं। भगवान शिव की बारात में आए नंग-धडंग, अंग-भंग, भूत-पिशाच इसी तथ्य को दृढ़ करते हैं। भगवान शिव सच्चे पतितपावन हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण देवताओं के अलावा दानव भी शिव को आदर देते हैं एवं उनकी भक्ति करते हैं। 

भगवान शिव ने जगत की रक्षा हेतु सागर मंथन के समय निकले विष का पान किया और नीलकंठ कहलाए। संसार में रहते हुए जीवन चक्र में भी विविध प्रकार का संघर्ष होता रहता है, उससे अनेक तत्व-रत्नों की प्राप्ति होती है। किंतु उसी में से अपमान, कष्ट संकटरूपी कालकूट की भी प्राप्ति होती है। ये चीजें विष से भी अधिक बुरी मानी जाती हैं। जो व्यक्ति समभाव रखते हुए धैर्य-पूर्वक इनका पान करता है, वह भी सर्वलोकेश्वर भगवान के समान नीलकंठ कहलाता है। 

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