करवा चौथ क्यों मनाया जाता है | Why is Karva Chauth celebrated?

करवा चौथ क्यों मनाया जाता है

करवा चौथ क्यों मनाया जाता है | Why is Karva Chauth celebrated?

वैदिक युग से दंपतियों के प्रगाढ़ प्रेम और संवेदनशील रिश्तों की बनियाद रखने वाले इस व्रत का बहुत प्रचलन रहा है। मानव समाज में स्त्री परुष एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं, जिनके द्वारा समाज की संपूर्ण सभ्यता पनपती और आगे बढ़ती है। भारतीय ग्रंथों में जहां स्त्री और पुरुष के वैवाहिक रिश्ते को एक पवित्र आधार देने की चेष्टा की गई है, उसके समक्ष आज का खुलापन और दांपत्य जीवन की विसंगतियां एक उपहास लगती हैं। करवा चौथ की संकल्पना में विवाहित अथवा विवाह योग्य स्त्री द्वारा अपने पति के सौभाग्य और दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत अपने आपमें बहुत ही पवित्र और प्रगाढ़ रिश्तों का प्रतीक है। आज के दौर में जब विवाहेतर संबंध समाज के आधार-परिवार को कमजोर कर रहे हैं, यह व्रत शाश्वत आदर्श की हमें याद दिलाता है।

Why is Karva Chauth celebrated

समाज की नींव रखने और चरित्र निर्माण करने में युवा स्त्री और पुरुष की जो पारंपरिक समन्वयकारी भूमिका मानी गई थी, उसके पीछे कई आधार थे-एक वैज्ञानिकता थी, जो आने वाली पीढ़ी को बिना बताए एक सीख दे जाती थी। परिवार के बच्चों पर इस बात का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता था कि उनके माता-पिता एक दूसरे के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं कि हर वर्ष मां द्वारा करवा चौथ का व्रत कर पिता के दीर्घजीवन की कामना की जा रही है। लेकिन इस बदलते समय में यह आदर्श तब टूटने लगता है जब सिर्फ रस्म अदायगी या बाहरी दिखावे के लिए इस व्रत का आयोजन किया जाता है। यह कड़वा सच ही कभी-कभी करवा चौथ के व्रत को कुछ लोगों द्वारा ‘कड़वा-चौथ’ कहने की धृष्टता भी करवा देता है। इसलिए जरूरी है कि इस अवसर पर पारिवारिक विश्वास के आदर्श को याद कर सच्चे मन से व्रत किया जाए। 

व्रत-उपवास और नियम-संयम समाज की ऐसी संहिताएं हैं, जिनमें हर दंपति को वफादार और संरक्षक सदस्य की भूमिका का निर्वाह करना है। 

चाहे विज्ञान और तकनीक कितनी आगे चली जाए, स्त्री और पुरुष के बनते बिगड़ते संबंध ही भविष्य की उस पीढी का चरित्र तय करेंगे, जिसे एक दिन समाज के उत्तरदायित्व निभाने होते हैं। समाज कोई भी हो व्यक्तित्व, नैतिकता और चरित्र ही उसे सफल बनाता है। मान्यता और सदाशयता का यही रूप है, जिसके दायरे में भारतीय समाज की अवस्थाओं को सींचने के लिए करवा चौथ प्रतिवर्ष आता है। एकतरफा प्रेम और पति के द्वारा प्रताड़ना का शिकार होकर भी चरित्रवान स्त्री अगर यह व्रत रखकर रात्रि प्रथम पहर में चंद्रमा का दर्शन करे, तो विरक्त पति भी पिघलकर अपनी भल पर पश्चाताप कर सकता है। याद रहे कि व्रत मन की स्वच्छता के दर्पण हैं। उन्हें छल की तरह इस्तेमाल करना सुखकारी नहीं हो सकता। यह भी एक सत्य है कि समाज की बुराई चाहे कितनी ही व्यापक हो, उसके रास्ते सुधार की ओर भी जाते हैं। फिलहाल एक दंपति के बीच चाहे साल भर कितनी ही कटुता रही हो, अगर पत्नी नियम से करवा चौथ का व्रत रखती है, तो यह जीवन बदलाव का अवसर बन सकता है। यकीनन करवा चौथ के दिन माहौल भी कुछ तो बदल ही जाता है। यही वजह है कि दूसरे समाजों को भी रिश्तों की जरूरत साबित करने के लिए विशिष्ट अवसर खोजने पड़ते हैं। पश्चिम का वेलेंटाइन-डे इसका एक उदाहरण है, जिस दिन प्रेम का इजहार किया जाता है। 

सच तो यह है कि मानवीय संबंध भी अव्यक्त रह कर नहीं चलते। भावनाओं को अभिव्यक्ति की जरूरत होती है। धार्मिक संदर्भ के अलावा तमाम पर्व-त्योहार इस व्यावहारिक जरूरत की पूर्ति के साधन हैं। यह समाज की संरचना को टिकाए रखने का सबसे असरदार तरीका है, इसलिए चाहे विकसित देश हों या विकासशील, त्योहार का रोमांच एक-सा होता है। आज भले ही पर्व-त्योहारों का मतलब बाजार तक सीमित मान लिया गया को लेकिन मलभूत आस्थाएं जीवित हैं। वैसे तो जीवन का हर दिन हर रिश्तों को सींचने का एक पवित्र पर्व है, लेकिन किसी खास दिन किसी खास मनःस्थिति में पूरा समाज अपनी बुनियाद को एकजुट होकर मजबूत बनाए यही इन पर्वो का सार है और करवा चौथ का भी।

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