जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है | Why is Janmashtami celebrated?

जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है

जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है | Why is Janmashtami celebrated?

भारतीय संस्कृति में गौरवपूर्ण अतीत पर पर्व का अनुभव करने के साथ-साथ हमें इस बात को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि समृद्धि, आलस्य, प्रमाद, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, संकीर्णता, सत्तालोलुपता, अतिवासना एवं कायरता के कारण हमारे देश के राजा कर्तव्यबोध को विस्मृत कर और स्वधर्म से विचलित होकर मद्यपान, दुराचार, द्यूतक्रीड़ा एवं परस्पर युद्ध में उद्यत हो गए थे। प्रजा में दुष्ट राजाओं का आतंक मचा हुआ था। मगध नरेश जरासंध, चेदि देश का राजा नरकासुर आदि महाबलशाली थे, परंतु सत्ता, संपत्ति एवं शक्ति से इनकी मति भ्रमित हो गई थी। इन राजाओं ने असंख्य निर्दोष सुंदर कन्याओं को दुराचार के लिए बंदी बनाकर रख लिया और प्रजाजनों पर अत्याचार करने लगे। विद्या विशारद ब्राह्मण भी अर्थ लोलुप होकर राजकुलों का स्तुतिगान एवं सेवा करने लगे। यही कारण था कि गुरु द्रोणाचार्य एवं भीष्म पितामह जैसे परम ज्ञानी ऋषि-मुनि भी राजसत्ता के प्रभाव में आकर धर्मसत्ता से विमुख होने लगे और अपनी आंखों के सामने हो रहे अत्याचार एवं अधर्म को मौन होकर देखते रहे।

ऐसे संकट के समय ही भगवान धर्म, मर्यादा, सदाचार एवं सामाजिक मूल्यों एवं आदर्शों की रक्षा के लिए महान धर्मोद्धारक आत्माओं का अवतरण धरती पर करते हैं। ऐसे ही एक धर्मोद्धारक के रूप में शूरसेन देश की राजधानी मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। माना जाता है कि श्रीकृष्ण का जन्म आज से 5233 साल पहले भाद्रपद में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।

शूरसेन देश के वृद्ध राजा उग्रसेन को उसी के दुराचारी पुत्र कंस ने बंदी बनाकर जेल में डाल दिया और खुद राजा बन बैठा। इसी दुराचारी, पिताद्रोही दुष्ट कंस को जरासंध की दो पुत्रियां अस्ति और प्राप्ति ब्याही थीं। इन दुष्ट व अत्याचारी राजाओं के अत्याचार से प्रजा को बचाने के लिए न्यायप्रिय वीर महापुरुष यादव वंशावसंत वसुदेव अहर्निश प्रयत्नशील थे। अत: कंस वसुदेव से सदा भयभीत रहता था। कंस के पिता उग्रसेन के छोटे भाई देबल की कन्या अर्थात कंस की चचेरी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था। 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा

कंस देवकी एवं वसुदेव की तेजस्विता से सदा आशंकित रहकर उनके विरुद्ध अत्याचार करता रहता था और उनको घर में बंदी बना लिया था। ज्योतिषियों के सुझाव से कंस ने देवकी के छ: पुत्रों को जन्मते ही मार डाला। सातवें गर्भ का भावी नाश के भय से पता हो गया। भाद्रपद की अष्टमी को आधयारी रात में घनघोर वष्टि के समय भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। वर्षा की शीतल वायु ने पहरेदारों को झपकी देकर घोर निद्रा में सुला दिया। वसुदेव बालक को रातों-रात यमुना पार करके नंद के यहां गोकुल पहुंचा आए और उसी रात नंद के यहां यशोदा की कोख से तुरंत जन्मी कन्या को उसके बदले में लाकर देवकी के पास लाकर लिटा दिया। कंस ने उस कन्या को देवकी की पुत्री समझकर मार डाला। योगेश्वर श्रीकृष्ण ईश्वरीय व्यवस्था अनुसार धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए थे। अत: जीवन के प्रभात से लेकर प्रयाण तक वे अन्याय एवं अधर्म को मिटाने के लिए संघर्ष करते रहे। वे असत्य के सामने नहीं झुके, महाबलशाली दुष्ट राजाओं को उन्होंने यमलोक पहुंचाया। कंस जैसे दुराचारी राजाओं को पापी देह से सदा के लिए मुक्त कर उनके पिता उग्रसेन को सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाया।

दिव्य संदेश

 श्रीकृष्ण ने हमें त्याग सिखाया तथा संघर्ष, स्वाभिमान, पुरुषार्थ, साहस, धैर्य एवं आत्म-विश्वास के साथ जीने का पाठ पढ़ाया। श्रीकृष्ण हमें भाग्यवादी नहीं पुरुषार्थवादी बनाते हैं। वे हमें पलायन नहीं सिखाते अपितु कर्तव्यपालन के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमें बार-बार उत्तिष्ठित, जाग्रत होने का पाठ पढ़ाते हैं। वे हमें अन्याय के सामने झुकना या मौन रहना नहीं, अपितु संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। वे हमें भेदभाव से परे आत्मभाव में जीने का संकल्प देते हैं। विश्व के सर्वाधिक जनमानस को यदि किसी महापुरुष ने प्रभावित किया तो वे योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं।

जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है

एक ओर जहां उन्होंने राधा व अन्य गोपिकाओं के माध्यम से संसार में प्रेम, विरह एवं वैराग्य की सरल धारा प्रवाहित की, वहीं दूसरी ओर अर्जुन के माध्यम से सनातन ब्रह्मज्ञान का प्रकटीकरण किया। उनकी साधारण लीलाओं में भी असाधारण व प्रेरणात्मक संदेश छिपे हुए थे। उदाहरण के लिए वृंदावन की कुंज-गलियों में ग्वालबालाओं के संग माखन चुराना यह लीला एक संकेत है कि संसार द्वैतात्मक है। इसमें सार रूपी माखन एवं आसार रूपी छाछ, दोनों ही विद्यमान हैं। माखन चुरा कर प्रभु यही समझा रहे हैं कि संसार में परमसार अर्थात ईश्वर का वरण करो, असार रूपी माया का नहीं। 

इसी प्रकार विषधर कालिया का मर्दन भी एक प्रतीकात्मक घटना है। कालिया नाग के विषैले फनों के समान मन के विकार हमारे अंत:करण को विषाक्त करते हैं। ये विकार हमें सांसारिक मोह-माया के बंधन में कसकर जकड़ लेते हैं। लेकिन जैसे ही हमारे जीवन में श्रीकृष्ण रूपी सद्गुरु का पदार्पण होता है, तो उसके द्वारा प्रदत्त ब्रह्मज्ञान से हमारे विकार क्षीण होने लगते हैं। यही संदेश श्रीकृष्ण के अधरों पर सुशोभित बांसुरी भी देती है। बांसुरी, जो आरंभ में लचीले बांस का एक टुकड़ा मात्र हुआ करती है, जब स्वयं को सुयोग्य के हाथों में समर्पित करती है, तो वह मुरलीधर के कर कमलों का मंत्र बन उनके भावों को स्वर दे पाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब भक्त भी विकारों से खाली अर्थात अहंकार शून्य हो जाता है, तभी वह प्रभु के चरणों में स्थान पा जगह को भी अलौकिक कर पाता है।

महारास का रहस्य 

सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है। उनके आनंद भाव का पूर्ण विकास उनकी मधुर रस लीला में हुआ है। यह मधुर रस लीला उनकी दिव्य रास क्रीड़ा है। जो शृंगार और रस से पूर्ण होते हुए भी इस स्थूल जगत के प्रेम व वासना से मुक्त है। इस रासलीला में वे अपने अंतरंग विशुद्ध भक्तों (जो उनकी निज रसरूपा राधा की सोलह हजार काया रूपा गोपियां हैं) के साथ शरद की रात्रियों में विलास करते हैं। कृष्ण की इस रासलीला में दो धाराएं हैं, जो दोनों ओर से आती हैं और एकाकार हो जाती हैं। हर क्षण नया मिलन, नया रूप, नया रस और नई तृप्ति-यही प्रेम-रस का अद्वैत स्वरूप है और इसी का नाम रास है। 

श्रीमद्भागवत में लिखा है कि भगवान के साथ रासलीला के लिए जीवात्मा का दिव्य शरीर और दिव्य मन होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में, इस मधुर रस लीला में शुद्ध जीव का ब्रह्म से विलासपूर्ण मिलन है, जिसमें लौकिक प्रेम व काम अंशमात्र भी नहीं है। शुद्ध जीवन का अर्थ है-माया के आवरण से रहित जीव। ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन होता है। इसीलिए गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व ‘चीरहरण’ की लीला की थी। जीवात्मा का परमात्मा के सामने कोई परदा नहीं रह सकता। परदा माया में ही है-परदा होने से वासना और अज्ञान आत्मा को ढक देते हैं और परमात्मा को दूर करते हैं। 

जीव का ब्रह्म से मिलन सहज नहीं होता। वह जब परमात्मा के निकट पहुंचता है, तब’ वे उससे पूछते हैं-मेरे पास क्यों आया है? जैसे कृष्ण ने गोपियों से कहा-‘कहो, कैसे आना हुआ इस घोर रात्रि में? अपने पति, पुत्र, सगे-संबंधी, गुरु और प्रियजनों की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। तुम लौट जाओ अपने घर।’ गोपियां स्वर्ग-मोक्ष-काम आदि से रहित हैं। उन्होंने उत्तर दिया : ‘पादौ पदं च चलतस्तव पादभूलाद, यामः कथं ब्रजमधो करवाम किं वा।’ अर्थात (हे गोविंद! हमारे पांव आपके चरण-कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। हम ब्रज को लौटें तो कैसे? और यदि हम लौटें भी तो मन के बिना हम क्या करें?) तब कृष्ण ने अपने अंतिम प्रश्न में गोपियों को उनके संतान मोह की ओर इशारा करते हुए कहा-“तो क्या तुम्हें अपने पुत्रों का भी मोह नहीं है?” गोपियों का उत्तर था- “हे मोहन ! 

आप में ही हमारा मोह सर्वोपरि है, क्योंकि पुत्रादि में भी आप ही स्थित हैं। ऐसी कौन सी वस्तु है, जो आपसे अलग है?” कृष्ण उनके प्रेम में रम गए और उनके साथ नृत्य करने लगे। नृत्य करते हुए कृष्ण ने महसूस किया कि गोपियों को उनके साथ नृत्य करने, उन्हें पा लेने का अभिमान होने लगा है। लेकिन कृष्ण और राधा के इस रास में जैसे दैहिक वासना की कोई जगह नहीं है। उसी तरह किसी अभिमान के लिए भी जगह नहीं है। गोपियों में व्याप्त अभिमान के इस भाव को दूर करने के लिए वे एकाएक अंतर्धान हो गए।”

ऐसे में गोपियां अपने प्रियतम को न देखकर स्वयं को भूल जाती हैं और कृष्णमयी होकर उन्हीं की पूर्व लीलाओं का अनुकरण करने में लीन हो जाती हैं। वे श्रीकृष्ण की चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन आदि में उनके समान ही बनकर सुख पाती हैं। यह देखकर कृष्ण द्रवित हो जाते हैं और पुनः उनके बीच प्रकट हो कहते हैं-मैं तुम्हारे त्याग और प्रीति का ऋणी हूं। वे हाथ आगे पसार कर कहते हैं-‘आओ, महारास करें।’

जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है

कृष्ण प्रत्येक दो गोपियों के बीच में प्रकट होकर सोलह हजार गोपियों के साथ नृत्य करने में लीन हो गए। सभी गोपियों के हाथ उनके हाथ में थे। यह महारास देखते-देखते ब्रह्मा (सृष्टि के रचियता) सोचने लगे कि कृष्ण और गोपियां निष्काम तो हैं, फिर भी देह का भान भूलकर इस प्रकार क्रीड़ा करने से क्या व्यवस्था, शास्त्र और मर्यादा का उल्लंघन नहीं होगा? वे यह नहीं समझ सके कि प्रेम का रास, विलास नहीं, धर्म का फल है, यानी प्रेम का फल है। कृष्ण ने अचानक सभी सोलह हजार गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया और सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देने लगे। गोपियां हैं कहां? महारास प्रेम का अद्वैत स्वरूप है. जिसमें भगवत स्वरूप हो जाने के बाद जीव का स्वत्व नहीं रहता है।

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