भारत विज्ञान में वैश्विक शक्ति क्यों नहीं?अथवा राष्ट्र के विकास व सुरक्षा के लिए विज्ञान व प्रौद्योगिकी सर्वोपरि हैं (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2013)

भारत में विज्ञान : समग्र अवलोकन अथवा क्या हम विज्ञान में पिछड़ रहे हैं? अथवा भारत विज्ञान में वैश्विक शक्ति क्यों नहीं? अथवा क्या भारत ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यथेष्ट प्रगति कर ली है? अथवा राष्ट्र के विकास व सुरक्षा के लिए विज्ञान व प्रौद्योगिकी सर्वोपरि हैं (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2013) 

असिमोव के उक्त कथन से हम विज्ञान के महत्त्व को समझ विज्ञान न सिर्फ सामाजिक हित में महत्त्वपूर्ण भमिका जाता है, बल्कि मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह विकास का पर्याय भी का है। वस्तुतः राष्ट्र के विकास व सुरक्षा के लिए विज्ञान और असोगिकी सर्वोपचार हैं। सच तो यह है कि किसी देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता उसके आर्थिक विकास का पैमाना होती है। विज्ञान और तकनीक के विकास के बगैर कोई भी देश शिखर पर पहुंचने की कल्पना नहीं कर सकता। एक ऐसे देश में, जो गरीबी और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा हो, विज्ञान की भूमिका और बढ़ जाती है। इस परिप्रेक्ष्य में हम भारत में विज्ञान के विशेष महत्त्व को समझ सकते हैं, क्योंकि इस देश के समक्ष न सिर्फ विकास की चनौतियां हैं, बल्कि अनेक ऐसी समस्याएं भी हैं, जिनका समाधान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से ही संभव है। विज्ञान और तकनीक को देश में उत्कर्ष पर पहुंचाकर हम देश की तस्वीर को तो खुशरंग बना ही सकते हैं, अपनी वैश्विक स्थिति को भी सुदृढ़ बना सकते हैं। इसके लिए हमें समृद्ध वैज्ञानिक परंपराओं की नींव रख कर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उस दरिद्रता को दूर भगाना होगा, जिसकी वजह से हम विकास के पथ पर तो पिछड़े ही हैं, विज्ञान में वैश्विक शक्ति भी नहीं बन पाए हैं। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में वैज्ञानिक अध्ययनों और अनुसंधानों की एक सशक्त परंपरा प्राचीनकाल से रही है। ज्ञान और विज्ञान के प्रवाह को गति देकर हमने असाधारण उपलब्धियां भी हासिल की। इनके जरिये वैश्विक पहचान ही नहीं बनाई, बल्कि भारतीय मेधा का लोहा भी मनवाया। हमने विज्ञान की जो मान्यताएं बहुत पहले स्थापित कर दी थीं, उन्हें विश्व के दूसरे देश बहुत बाद में परख पाए। भारत में 476 ई. में जन्मे महान गणितज्ञ एवं खगोल विज्ञानी आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम इस वैज्ञानिक तथ्य को स्थापित किया था कि पृथ्वी प्रतिदिन अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। कोपरनिकस से बहुत पहले उन्होंने यह ढूंढ़ निकाला था पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है। उन्होंने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के असली कारण को भी उद्घाटित किया था और यह भी बताया था कि चन्द्रमा व अन्य ग्रह स्वयं प्रकाशमान नहीं हैं, बल्कि सूर्य की किरणों से प्रकाशित होते हैं। आर्यभट्ट की बेटी लीलावती भी उच्च कोटि की गणितज्ञ थीं। 1114 ई. में भारत में जन्मे भास्कराचार्य ने मात्र 36 वर्ष की अवस्था में ‘सिद्धांत शिरोमणि’ जैसे अंकगणित और बीजगणित के ग्रंथ की रचना कर गणित विज्ञान में भारतीय उन्नति का प्रतिमान स्थापित किया था। कहने का आशय यह कि 

विज्ञान के क्षेत्र में भारत की वैजयंती प्राचीनकाल से ऊंची रही। नालंदा और तक्षशिला जैसे ख्यातिलब्ध भारतीय विश्वविद्यालयों में उच्च कोटि के विज्ञान की शिक्षण व्यवस्था थी तथा अनुसंधान कार्य होते थे। ज्ञान-विज्ञान का जो प्रवाह प्राचीन भारत में वेगमान था, वह धीरे-धीरे क्षीण पड़ता गया और हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पिछड़ते गये। वैश्विक स्तर पर भी हमारे ज्ञान-विज्ञान का दबदबा कम हुआ। यहां तक कि हम चीन जैसे अपने पड़ोसी देश से भी पिछड़ गये। इसका प्रभाव देश के विकास पर भी पड़ा। हम अपेक्षित विकास इसलिए नहीं कर पाए, क्योंकि हम विज्ञान की दौड़ में पिछड़े। जो मुकाम हमें हासिल कर लेना चाहिए था, उसे नहीं कर पाए। 

“विज्ञान में निरंतर नई खोजें होती रहती हैं। उनके अनुरूप पाठ्यक्रम में बदलाव होता रहना चाहिए…” 

आज हमारे समक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी को लेकर अनेक सुलगते सवाल हैं। मसलन, भारत एक महान वैश्विक शक्ति क्यों नहीं है? राष्ट्र के विकास व सुरक्षा के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी रूपी सर्वोपचार में हम क्यों पिछड़ गए हैं। हम विज्ञान के क्षेत्र में क्यों पिछड़ रहे हैं? विज्ञान के क्षेत्र में हम विश्व मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति क्यों नहीं दर्ज करवा पा रहे हैं? वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या की दृष्टि से भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है, इनमें अच्छे वैज्ञानिक भी हैं, फिर भी भारत ऐसे श्रेष्ठ वैज्ञानिक क्यों नहीं उत्पन्न कर सका, जिनके द्वारा लकीर से हटकर की गई खोजों को संपूर्ण विश्व को शांत बैठकर देखते रहने पर बाध्य होना पड़े? क्या हमें उधार में प्राप्त तकनीकों से संतुष्ट होना अभी भी जारी रखना होगा? इन सवालों के जवाब हमें तलाशने होंगे। वस्तुतः भरत में वैज्ञानिक पिछड़ेपन के अनेक कारण हैं। यहां इन पर गौर करना आवश्यक है। 

पहला कारण तो हमारी शिक्षा व्यवस्था है। भारत का उच्च शिक्षा तंत्र विश्व में तीसरे स्थान पर है। हमारा स्थान अमेरिका और चीन के बाद आता है, इसके बावजूद हम विज्ञान को अपनी शिक्षा व्यवस्था से भली-भांति नहीं जोड़ पाए और व्यावहारिक प्रगति नहीं कर सके। हमारे देश में शिक्षा की स्थिति न सिर्फ दयनीय है, बल्कि शोचनीय भी है। शिक्षा में दोहरापन है, जो विसंगतियों को बढ़ाता है। शिक्षा का व्यावसायीकरण भी इन्हीं विसंगतियों में से एक है। एक तरफ तो चमक-दमक वाले पब्लिक व कानवेंट स्कूल हैं, तो दूसरी तरफ खपरैलों और छप्परों में चलने वाले विद्यालय। देश का आम आदमी अपने बच्चे को महंगे स्कूलों में पढ़ा नहीं पाता और इन महंगे स्कूलों का सच यह है कि इनमें काफी प्रतिस्पर्धा रहती है। वहां ज्यादा जोर ‘स्कोर’ पर रहता है। बच्चों पर बिना सोचे-समझे रटने और महज परीक्षोपयोगी पढ़ाई करने का दबाव रहता है। इस घातक दबाव के बीच अगर कोई वैज्ञानिक बन भी जाए, तो वह नौकरी पर केन्द्रित होकर रह जाता है। शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में आगे निकलने में उसकी दिलचस्पी नहीं रहती। 

दूसरी तरफ सामान्य सरकारी स्कूलों में न तो विज्ञान से संबंधित प्रेरक माहौल ही है और न ही पर्याप्त सुविधाएं ही। भारत एक कृषि प्रधान देश है। बावजूद इसके ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल सबसे ज्यादा उपेक्षित और बदहाल हैं। कहीं-कहीं तो पेड़ों की छांव में बच्चे पढ़ने को विवश हैं। उन्हें एक अदद ब्लैकबोर्ड तक मयस्सर नहीं है। प्रयोगशालाओं का अभाव है। शिक्षकों में भी ठंडापन देखने को मिलता है। वे प्रशिक्षित भी नहीं होते हैं। ये बच्चों में विज्ञान के प्रति उत्साह नहीं जगा पाते हैं। ये बातें विज्ञान की प्रगति में अवरोध पैदा करती हैं। परिणाम स्वरूप वैज्ञानिक अनुसंधानों में नगण्यता की स्थिति उत्पन्न होती है। 

विज्ञान की प्रगति को ध्यान में रखकर हमारे देश में शैक्षणिक पाठ्यक्रम पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान के नये आयामों को ध्यान में रखकर हम पाठ्यक्रम में तदनुसार बदलाव करते रहें, ताकि बच्चे अद्यतन रहें। विज्ञान में निरंतर नई खोजें होती रहती हैं। उनके अनुरूप पाठ्यक्रम में बदलाव होता रहना चाहिए, किन्तु हम ऐसा नहीं कर पाते। पुराने पाठ्यक्रम से ही काम चलाते हैं, जो बच्चों में नये शोधों या अनुसंधानों के लिए उत्साह पैदा नहीं कर पाता है।

किसी भी राष्ट्र की संस्कृति, विश्वास की परंपरा, मूल्य तथा दृष्टिकोण उसके वैज्ञानिक अनुसंधानों की गुणवत्ता के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम पूरब के हैं और पूर्वीय दृष्टिकोण पाश्चात्य मूल्यों से अनेक संदर्भो में भिन्न होता है। एशियाई समाज मूलतः समूह प्रधान है। यानी समाज का सामूहिक हित व्यक्तिगत प्रसन्नताओं एवं उपलब्धियों के ऊपर माना जाता है। यहां के लोग यह नहीं पूछते हैं कि वे अपने देश के लिए क्या कर सकते हैं, बल्कि उनकी दिलचस्पी इसमें ज्यादा रहती है कि देश उनके लिए क्या कर सकता है। लोग मार्गदर्शन, निर्देशन तथा नेतृत्व के लिए राज्य एवं सरकार की ओर टकटकी लगाए रहते हैं। हमारे देश के लोगों में आगे बढ़ने तथा कुछ नई उपलब्धि प्राप्त करने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा वाली तीव्र अग्नि का अभाव है। यह बात भी विज्ञान के क्षेत्र में ठहराव का कारण बन रही है। कहने का आशय यह कि विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति के लिए जिस ‘साइंटिफिक टेंपर’ की आवश्यकता होती है, उसका हमारे यहां नितांत अभाव है। हम इस क्षेत्र में आज भी रुढिवादी विचारों से ग्रस्त हैं। हमें विज्ञान को धर्म, जाति व मजहब आदि से परे रखना चाहिए, किन्तु हम ऐसा नहीं कर पाते और इसे संस्कृति का नाम दे देते हैं। 

हमारे देश में विज्ञान की उच्च स्तरीय पढ़ाई, शोध व अनुसंधानों को जिस तरह से प्रोत्साहन मिलना चाहिए, वैसा प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। यह भी हमारे पिछड़ने का एक प्रमुख कारण है। दुनिया के छोटे-छोटे देश शोध व अनुसंधान के मामले में हमसे आगे है। विश्वविद्यालयों में शोध की परंपरा क्षीण पड़ रही है। धन की कमी भी आड़े आती है। दुनिया के अधिकांश विकसित देश जहां वैज्ञानिक शोधों को बढ़ाने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 प्रतिशत तक विश्वविद्यालयों को देते हैं, वहीं भारत में यह अत्यधिक न्यून मात्र 6 प्रतिशत ही है। शोध में घटती रुचि का एक कारण यह भी है कि तुरंत नौकरी और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ में छात्र वैज्ञानिक शोध कार्यों से कन्नी काट रहे हैं। शोध व अनुसंधान के बजाय एमबीए व इंजीनियरिंग के लिए मारामारी मची है। ऐसे में बेहतरीन शोधों, अनुसंधानों और खोजों की उम्मीद कैसे की जा सकती है। 

वैज्ञानिक पिछड़ेपन की एक वजह ‘ब्रेन ड्रेन’ भी है। भारतीय प्रतिभाएं विदेशों के लिए पलायन कर रही हैं। इसके लिए भी व्यवस्थागत खामियां जिम्मेदार हैं। हमारे देश में वैज्ञानिकों के लिए अच्छा माहौल नहीं है। रोजगार के अच्छे अवसर भी नहीं हैं। विश्वविद्यालय डिग्रियां बांट कर बेरोजगारों की फौज बढ़ा रहे हैं। रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। उपयुक्त माहौल और रोजगार के अवसरों के न होने से भारतीय प्रतिभाएं विदेशों का रुख कर रही हैं। वैज्ञानिक कोई नया अनुसंधान करना चाहे, तो उन्हें देश में पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलती हैं। वैज्ञानिक संसाधनों पर ऐसे लोगों का कब्जा है, जिनका विज्ञान और तकनीक से कोई वास्ता नहीं है। नौकरशाहों का वर्चस्व इस क्षेत्र में भी है। हमारे पड़ोसी देश चीन ने यदि कुछ वर्षों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है, तो इसकी एक खास वजह यह है कि वहां भारत की तरह ‘ब्रेन ड्रेन’ की समस्या नहीं है। वहां काम करने का एक प्रेरक माहौल है तथा वैज्ञानिकों और डिग्रीधारियों के लिए रोजगार की समस्या नहीं है। वहां वैज्ञानिक ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए शोध पत्र धड़ल्ले से प्रकाशित किए जाते हैं। इनका अंग्रेजी में अनुवाद होता है। चीन ही नहीं, अनेक अन्य देशों में भी भारत की तुलना में कहीं अधिक उपयुक्त माहौल है। 

विज्ञान के क्षेत्र में भारत के पिछड़ने का एक कारण लैंगिक असमानता भी है। लैंगिक गैरबराबरी के कारण विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या कमतर है। अगर हम अपने देश की महिलाओं का विज्ञान, अकादमिक और अनुसंधान क्षेत्र में वास्तविक कायापलट देखना चाहते हैं, तो आवश्यकता इस बात की है कि हम सामाजिक परिवर्तन लाकर आधी दुनिया को विज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। 

विज्ञान में भारत के पिछड़ने का एक बड़ा कारण निवेश में कमी भी है। निजी क्षेत्र की भूमिका भी इस संबंध में अत्यंत सिमटी सिकुड़ी है। यह दुख का विषय है कि भारत में निजी क्षेत्र वैज्ञानिक शोधों व अनुसंधानों को बढ़ावा देने में अत्यंत ठंडेपन का परिचय दे रहे है |  उन्हें इस क्षेत्र में उत्साह से काम करना चाहिये, किन्तु वे ऐसा करने के बजाय सरकार का मुंह ताकते हैं। सरकार जो पहले से ही तमाम खर्चो के बोझ तले दबी है, एक निश्चित तक ही खर्च उठा दी है। यह सूरत बदलनी चाहिए। आवश्यकता इस बात की है सार्वजनिक व निजी दोनों क्षेत्र अपने-अपने दायित्वों को समझें और अनसंधान के क्षेत्र में अपनी वित्तीय भागीदारी बढ़ाएं। इस दिशा यह भी जरूरी है कि शैक्षणिक और शोध संस्थाएं आस-पास के योगों से संवाद बढ़ाएं। औद्योगिक स्वावलंबन और बेहतर प्रदर्शन में विज्ञान के सहयोग के सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। दुख इस बात का है कि हमारे देश में विज्ञान और उद्योगों के बीच नियमित संवाद का अभ्यास नहीं बन पाया है। 

किसी दार्शनिक वैज्ञानिक का कथन है-“ज्ञान के लिए किये गये निवेश का फल हमेशा अच्छा ही होता है।” हमें इस कथन को ध्यान में रखकर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश करना होगा। अमेरिका, यदि आज विकास की ऊंचाइयों पर है, तो इसकी एक वजह यह है कि वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सबसे ज्यादा वैश्विक निवेश करता है।

विज्ञान क्षेत्र में हम यदि यथेष्ट प्रगति नहीं कर पाए हैं तो इसकी एक वजह यह भी है कि हमारे यहां आज भी स्तरीय वैज्ञानिक संस्थाओं का अभाव है। जो हैं भी, उनमें राजनीति और भ्रष्टाचार चरम पर है। नतीजतन उनकी धार खराब हो गई है। अब वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) को लें। देश में अनुसंधान और विकास कार्यों में समन्वय और निगरानी के उद्देश्य से वर्ष 1942 में इसकी स्थापना की गई थी। यह अनुसंधान और विकास संगठन का केंद्रीय सरकारी संगठन है और प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। इस संगठन को मुख्य रूप से तीन दायित्व सौंपे गये हैं। ये त्रिस्तरी दायित्व हैं—पहला औद्योगिक अनुसंधान को बढ़ावा देना, उनका निर्देशन करना व समन्वय करना, दूसरा अनुसंधान विकास के मानव संसाधन का मजबूत आधार तैयार करना और उसका निर्वहन करना, तीसरा, औद्योगिक विकास के लिए मुख्य उत्प्रेरक के रूप में काम करना। इन तीनों ही मोर्चों पर सीएसआईआर कामयाब साबित नहीं हुआ है। जहां उद्योगों से उसका संवाद घटा है, वहीं इसकी अधिकांश प्रयोगशालाओं में कनिष्ठ शोधार्थी तक नहीं हैं। वैज्ञानिक प्रगति के लिए ऐसी संस्थाओं को ढंग से व्यवस्थित करने की जरूरत है। 

भारत आर्यभट्ट, ब्रह्मभट्ट, कबाद, रामानुजम, भास्कराचार्य व सी.वी. रमन जैसे विद्वानों का देश है। अगर हमने अपनी समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा को पूरी ईमानदारी व निष्ठा से आगे बढ़ाया होता, तो आज हम शीर्ष पर होते। हमने उपलब्धियां तो हासिल कीं, किन्तु हमारी योग्यता व क्षमता की दृष्टि से ये कमतर हैं। अभी भारतीय विज्ञान की छवि बदलने के लिए काफी कुछ करने की दरकार है। प्रयास जारी भी हैं। 

सरकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई संस्थाओं के निर्माण के जरिये बुनियादी संरचना को मजबूत करने की दिशा में तत्पर है। सरकार ने कई छात्रवृत्तियां भी शुरू की हैं, जिनमें ‘इंस्पायर’ अग्रणी है। जैसा नाम से ही विदित होता है यह विज्ञान छात्रों को प्रोत्साहन देने वाली योजना है। यह योजना सही ढंग से चल रही है और इसके जरिये दस लाख विज्ञान छात्रों को प्रोत्साहित किया जाना है। इस योजना से समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त करने में भी सहायता मिल रही है। कमजोर तबका लाभान्वित हो रहा है। लैंगिक असमानता की दृष्टि से भी ‘इंस्पायर’ कारगर साबित हो रही है। योजना से लाभ उठाने वालों में 49.6 प्रतिशत महिलाएं हैं। विश्वविद्यालय अनुसंधान के क्षेत्र में भी स्थितियां सुधरी 

आधी दुनिया का योगदान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़ाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा कुछ समय पहले ‘महिला वैज्ञानिक योजना’ का सूत्रपात किया। इसके जरिये महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को ध्यान में रखकर पांच लक्ष्य भी तय किए गए हैं। ये पांच लक्ष्य हैं- पहला, उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में निवेश के जरिये अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में प्रगति, दूसरा, उन्नत पारिस्थितिक तंत्र (ईको सिस्टम) का निर्माण सुनिश्चित करना है, तीसरा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की तरक्की को समावेशी विकास की जरूरत के हिसाब से ढालना, चौथा, बुनियादी वैज्ञानिक सुविधाओं को बढ़ाना, पांचवां, विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के बीच सहयोग मजबूत करना। ‘ब्रेन ड्रेन’ की समस्या से उबरने के लिए भारत सरकार द्वारा ‘रामानुज फेलोशिप’ कार्यक्रम की शुरुआत की जा चुकी है, जिसके तहत भारत लौटने के इच्छुक वैज्ञानिकों को भारत में समायोजित करने की व्यवस्था की गई है। अभी और पहलों की आवश्यकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र के विकास के लिए, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सर्वोपचार हैं तथा भारत जैसे देश को इस सर्वोपचार की नितांत आवश्यकता है। 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक साख कायम करने के लिए हमें सिर्फ सरकार पर ही निर्भर नहीं करना चाहिए। राष्ट्रहित में हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम अपने भीतर ‘साइंटिफिक टेंपर’ पैदा करें, प्रयोगधर्मी बनें, व्यक्तिगत हित की सोच से हटकर राष्ट्रहित की सोच अपनाएं और यह सोचें कि हम अपने देश और समाज को क्या दे सकते हैं। ज्ञान क्षेत्र में भारत ने मानव सभ्यता को अनेक अनमोल उपहार दिए हैं, फिर चाहे वह शून्य की खोज हो अथवा लोहा बनाने का हुनर। हमें इस समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए। ऐसा करके ही हम जहां विज्ञान के जरिये विकास का परचम लहरा सकेंगे, वहीं भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति का रुतबा भी दिलवा सकेंगे। 

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