गुरु नानक प्रकाश दिवस क्यों मनाया जाता है | Why is Guru Nanak Prakash Day celebrated?

गुरु नानक प्रकाश दिवस क्यों मनाया जाता है

गुरु नानक प्रकाश दिवस क्यों मनाया जाता है

गुरु नानक देव एक ऐसी शख्सियत का नाम है जिसमें अध्याता और व्यवहार का अलौकिक समन्वय था। सबमें परमात्मा का दर्शन करने वाले इस महापुरुष ने अन्याय विरुद्ध निर्भय होकर आवाज उठाई। ऐमनाबाद पर आक्रमण के समय बाबर ने जो जुर्म किए उसके बारे में गुरु नानकदेव के ये शब्द उस आक्रोश को प्रस्तुत करते हैं, जिसका आधार स्वार्थ नहीं करुणा हुआ करती है 

‘राजे सिंह मुकद्दम कुत्ते, जाइ जगाइन बैठे सुत्ते।

चाकर नहदां पाइनह घाउ, रतु पितु कुति हो चरि जाहूं।

…कलिकाती राजे कसाइ।’ 

15 अप्रैल सन् 1469 को गुरु नानक देव का आविर्भाव तलवंडी (अब ननकाना साहब) के प्रधान पटवारी मेहता कालूराय बेदी के यहां हुआ था। इनकी माता का नाम तृप्ता था। बड़ी बहन का नाम ननिहाल में रहने के कारण ‘नानकी’ पड़ा। उसी वजह से इनका नाम भी ‘नानक’ प्रसिद्ध हो गया। बालक के मुखमंडल की आभा को देखकर उस समय के प्रसिद्ध विद्वान पंडित गोपालदास ने भविष्यवाणी करते हुए कह दिया था कि-बालक ईश्वर का अंशावतार है, जो जन कल्याण हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुआ है।

गुरु नानक का जीवन अनेक चमत्कारों से भरा है। लेकिन उनकी समाज को सबसे बड़ी देन है सहज जीवन’ की सीख। आपकी पवित्र वाणी ‘जपुजी साहिब में उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों और परम स्थिति की झलक स्पष्ट रूप से मिलती है। गुरु ग्रंथ साहिब मानो उनके आदर्शों, सिद्धांतों का साकार विग्रह है। 

गुरु ग्रंथ साहिब में ईश्वर और मोक्ष के अलावा जीवन के प्रत्येक पहलू क बार में मार्गदर्शन मिलता है। इस आदि ग्रंथ की रचना के पीछे गुरु अर्जन देव जी का उद्देश्य संसार की आध्यात्मिक भूख को शांत करना और उसका उद्धार करना था। राग मुदावणी में रचित अपने शबद थाल विचि तिति वरत पईओ, सतु संतोखु विचारो’ में वे फरमाते हैं-‘मैंने विश्व की आध्यात्मिक भूख की शांति के लिए ग्रंथ साहिब के रूप में एक बहुमूल्य थाली में तीन वस्तुएं परोसकर रख दी हैं-सत्य, संतोष तथा प्रभु के अमृत नाम का विचार । गुरु ग्रंथ साहिब समूची मानव जाति का सांझा गुरु है। गुरु अर्जन देव जी ने इस महान ग्रंथ का संकलन करते समय खत्री ब्राह्मण सूद वैस, उपदेस चंदु वर्णा कऊ सांझा के धार्मिक समता और समन्वयकारी ध्येय को सामने रखा। गुरुदेव ने अपने चार पूर्ववर्ती सिख गुरुओं-गुरु नानक देव, गुरु अंगद, गुरु अमरदास और गुरु रामदास की अलौकिक वाणी और अपनी स्वयं की वाणी के अलावा अपने समकालीन और पूर्ववर्ती तीस अन्य संतों भक्तों की चुनिंदा वाणी को भी ग्रंथ साहिब में दर्ज करके उन्हें सिख गुरुओं के बराबर सम्मान व स्थान प्रदान किया। इस प्रकार यह विश्व का प्रथम तथा एकमात्र धर्मग्रंथ बना जिसमें संबद्ध धर्म के गुरुओं के अलावा तीन अन्य रचनाकारों की ईश्वरीय आराधना और स्तुति के एक साथ दर्शन होते हैं। इन भक्तों में शेख फरीद, कबीर, रविदास, नामदेव, धन्ना त्रिलोचन, परमानंद के नाम प्रमुख हैं।

गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु नानक या किसी अन्य सिख गुरु की जीवनी या सिख इतिहास का वर्णन नहीं है। बल्कि इसमें मात्र एक परम सत्ता की महिमा और व्यावहारिक जीवन-मुक्ति का बखान है। इसमें वर्णन है ईश्वर के नाम सिमरन का, प्रेम और भक्ति का, जनसेवा का। जीवन में आडंबर व छल-कपट छोडने व नैतिक मूल्यों की पवित्रता को अपनाने का। इसमें वर्णन है मानवीय एकता और भाईचारे का संदेश देने वाली वाणी का गम अर्जन लजीने ग्रंथ साहिब को ईश्वरीय वाणी का वह विशाल सागर बनाया जिसमें उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं से देव स्तति की सरिताएं आकर समाहित हुईं। उदाहरण के तौर पर ग्रंथ साहिल रूप में मौजूद नामदेव और परमानंद महाराष्ट्र के थे, तो त्रिलोचन गुजरात के रामानंद दक्षिण में पैदा हुए तो जयदेव का जन्म पश्चिम बंगाल एक  छोटे  गाँव में हुआ  था |

 इसी प्रकार  धन्ना  का संबंध राजस्थान से था तो शेख से गांव में हआ था। इसी प्रकार धन्ना का संबंध राजस्थानी फरीद पश्चिमी सीमांत तथा सदना सिंध से ताल्लुक रखते थे।  इनकी तथा बाकी संतों की वाणी को एक माला में पिरोकर गुरु अर्जन देव जी ने भारत के भौगोलिक समन्वय की एक बेहतरीन और अभूतपूर्व मिसाल कायम की। घोर विषम, सामाजिक स्थिति और धार्मिक असहिष्णुता के उस दौर में गरु देव ने कबीर जैसे मुसलमान जुलाहे, रविदास जैसे व्यवसाय के चर्मकार लेकिन विचार से रूहानी संत, त्रिलोचन जैसे वैश्य, पीपा जैसे राजपूत, धन्ना जैसे जाट और सूरदास, जयदेव, परमानंद जैसे ब्राह्मणों की वाणी को एक जिल्द में बांधकर विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण सह अस्तित्व का भाव पैदा करने की सिख गुरुओं की क्रांतिकारी परंपरा को आगे बढ़ाया। 

16 अगस्त, 1604 को सिखों के पंचम गुरु, अर्जन देव जी की पंद्रह वर्ष की तपस्या पूरी हुई और इस आदि ग्रंथ का संपादन पूरा हुआ। पूरे चौदह सौ तीन पृष्ठ वाले इस विशाल आध्यात्मिक ग्रंथ को धूमधाम और धार्मिक मर्यादा के साथ हरमंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर, अमृतसर) में स्थापित करने के लिए एक जुलूस की शक्ल में ले जाया गया। हरमंदर साहिब के भीतर पहुंचकर पवित्र ग्रंथ को मंजी साहिब (छोटा खटोला) पर सम्मान के साथ रखा गया और उस पर सुंदर वस्त्र सजाए गए। तत्पश्चात गुरु अर्जन देव तथा अन्य श्रद्धालुओं ने आदि ग्रंथ को नमन किया। इस प्रकार आदि ग्रंथ का हरमंदर साहिब में प्रथम प्रकाश हुआ। बाबा बुड्ढा जी को गुरु अर्जन देव जी ने ग्रंथ साहिब का प्रथम ग्रंथी नियुक्त किया था।

प्रभु से जोड़ने वाली वाणी-गुरुवाणी 

गुरु नानक प्रकाश दिवस

अब से लगभग चार शताब्दी पहले हरमंदर साहिब में श्री गुरु ग्रंथ का पूर्ण धार्मिक मर्यादा के साथ प्रथम प्रकाश हुआ था। गुरु ग्रंथ साहिब उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के छत्तीस संतों की आध्यात्मिक वाणियों का संगम है। छह सिख गुरुओं के अलावा इस ग्रंथ के अन्य धर्मों के तीन संतों की ईश्वरीय वाणी के एक साथ दर्शन होते हैं। 

आज से 416 वर्ष पहले आदि ग्रंथ के लिए वाणी का चयन करते समय गुरु अर्जन देव जी ने इन संतों के वर्ण (यानी उनकी जाति धर्म) को नहीं, उनकी वाणी की उच्चता को कसौटी पर रखा। इसमें कबीर, रविदास, सदना जैसे वाणीकारों का वर्ण और व्यवसाय उस वक्त के सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से बहुत सम्मानजनक नहीं था, लेकिन इनके विचार रूहानियत के शिखर को छूते थे। इनकी भाषा, बोली, संस्कृति भौगोलिक पृष्ठभूमि, धर्म और जाति अलग-अलग थी, पर लक्ष्य सभी का एक था। यह लक्ष्य था’, पिता एकस के हम बारक’ का उपदेश देकर सामाजिक एकता और मान गरिमा की रक्षा करना और इस मार्ग पर चलते हुए परम पद प्राप्त करना जाहिर है, इसी पृष्ठभूमि में गुरु ग्रंथ साहिब को माथा टेकते समय हम टर अपनी वाणी के रूप में अमर सिख गुरुओं के अलावा शेख फरीद, धना जाट, परमानंद, जयदेव, सूरदास, नामदेव, पीपा आदि 30 संत भक्तों को भी एक साथ नमन करते हैं। 

गुरु के पवित्र मुख से उच्चारण की गई वाणी ही ‘गुरुवाणी’ है। गुरुवाणी वह अलौकिक ज्ञान है, जो गुरुओं और संतों ने अकाल पुरुष के साथ अपनी आत्मा को जोड़कर तथा उसके साथ एक रूप होकर प्राप्त किया। गुरु ग्रंथ साहिब में इस विचार को ‘ब्रह्मविचार’ कहा गया है। ब्रह्मविचार इसलिए, क्योंकि यह कोई साधारण गीत या काव्य नहीं, जो किसी व्यक्ति या व्यवस्था (राजा-महाराजा आदि) को रिझाने या खुश करने के लिए लिखा गया हो। गुरुवाणी ऐसा काव्य भी नहीं है, जिसकी रचना आम सांसारिक काव्यों की तरह कल्पना के आधार पर की गई हो। बल्कि यह तो वह शब्द है, जो सीधे परमात्मा के लोक से आया। ये शब्द परमात्मा के अपने विचार हैं। प्रभु ने ये विचार गुरुओं के श्रीमुख से कहलवाए। गुरु नानक देव जी फरमाते हैं कि ये वचन या शब्द हमारे अपने नहीं, बल्कि ये तो खसम’ यानी ईश्वर की वाणी है। हम तो केवल उसके आदेश का पालन करते हुए उनका उच्चारण मात्र कर रहे हैं-“जैसी मैं आवै खसम की बाणी। तैसड़ा करि गिआनु वे लालो।” 

सिख गुरुओं ने केवल वाणी का उच्चारण या उनकी रचना ही नहीं की, बल्कि वाणी को अपने जीवन में ढाला भी। गुरुवाणी में अनेक जगहों पर, ‘सेवा’ का महत्व बताते हुए सेवा की प्रेरणा दी गई है। गुरुओं ने सामान्य प्राणी के रूप में स्वयं अथक सेवा की कमाई करते हुए गुरु की उच्चतम आध्यात्मिक पदवी प्राप्त की। अपनी वाणी में जहां गुरुओं ने त्याग, सहिष्णुता और शांतिप्रियता का संदेश दिया, वहीं खुद भी सहिष्णु और शांत रहकर धर्म व सत्य की रक्षा के लिए शासकों के हाथों शहीद हो गए (पंचम गरु श्री अर्जन देव और नवें गुरु श्री तेग बहादुर)। 

गरुवाणी की यह अद्भुत विशेषता है कि वह जीवन से भी जडी है और से भी जोडती है। यह पावत्र वाणा आध्यात्मिक प्यास बयाते दा भी करती है। गुरुवाणी के आध्यात्मिक पक्ष में ईश्वर भक्ति. हमारा मार्गदर्शन भी करती है। गरुवाणी के 

उसके सत्यरूप की स्तुति, माया-मोह के त्याग की प्रेरणा, नाम सुमिरण और उसके माध्यम से मोक्ष की बात की गई है। जबकि जीवन-सिद्धांत पक्ष में व्यक्ति के चरित्र निर्माण से लेकर रामराज्य की कल्पना को साकार करने वाली आचार संहिता तक का वर्णन है।

गुरुवाणी और उदात्त संगीत 

गुरुद्वारों में शबद और कीर्तन गाने की बहुत ही समृद्ध परंपरा है। वहां रागी जन शबद गायन के लिए खुद धुनें बनाते हैं। उनके लिए रागों का शास्त्र निर्धारित है। वे दूसरों द्वारा रचित या लोकप्रिय धुनों की नकल नहीं करते। कभी सोचा है कि गुरुद्वारों में शबद और पाठ के लिए गायन को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है? असल में अध्यात्म में संगीत का वही स्थान है जैसा जीवन में आत्मा का। आत्मा के बिना शरीर व्यर्थ है, तो संगीत से रहित अध्यात्म स्वादहीन और अधूरा। संगीत अध्यात्म का वह सोपान है जिस पर आरोहित होकर साधक परमानंद को प्राप्त करता है। पुराणों में लिखा है कि कृष्ण ने नारद को कहा था कि न तो मैं बैकुंठ में वास करता हूं और न योगियों के हृदय में। मेरा वास वहां होता है जहां मेरे भक्त संगीत करते हैं। 

गुरु ग्रंथ साहिब विश्व के अन्य धर्म ग्रंथों से इस अर्थ में विशिष्ट है कि उसकी संपूर्ण वाणी ही शास्त्रीय संगीत के 31 रागों में रची गई है। जब इस अलौकिक वाणी का गायन-कीर्तन किया जाता है तो गायक और श्रोता को एक स्वर्गीय आनंद की अनुभूति होती है और उसका ‘स्व’ भाव तिरोहित हो जाता है। रह जाता है सिर्फ समर्पण और उसे’ पाने की चाह। इसीलिए गुरुवाणी में कीर्तन को अमूल्य हीरा और आनंद प्रदान करने वाला गुणों का खजाना कहा गया है। 

गुरुग्रंथ साहिब की वाणी में कुल 31 और कई मिश्रित रागों का प्रयोग हुआ है। इसमें श्रीराग, गुजरी, देवगांधारी, सोरठ, धनासरी, टोडी, बिलावल, नट, केदार, भैरों, वसंत, सारंग, मल्हार, कल्याण, प्रभाती और जै जैवंती जैसे रागों का समावेश किया गया है। सिख गुरुओं ने रागों के चयन और वाणी में उनके प्रयोग के समय भाव सैद्धांतिकता का पूर्ण खयाल रखा और उन्होंने वाणी के प्रत्येक पद में अभिव्यक्त विचारों की दशा के अनुकूल ही शास्त्रीय रागों का चयन किया। अर्थात भाव और राग के बीच उन्होंने पूर्ण तालमेल रखा और कहीं भी उन्हें परस्पर विरोधी नहीं होने दिया। मसलन हर्ष और उल्लास भावों की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने सही विहागढा बिलावल. मल्हार, बसंत आदि रागों का इस्तेमाल किया तो करुण, शांत और भावों वाली वाणी की रचना उन्होंने प्रायः गउडी, श्री रामकली. भग रागों में की। इसी प्रकार विशद्ध धार्मिक भावों की अभिव्यक्ति के लिए धनासरी, सोरठ आदि तथा उत्साह भाव के लिए आसा, माझ, प्रभाती आम रागों का प्रयोग किया। सिख गुरुओं ने वाणी रचना के लिए एक सरल और सहज मार्ग की अपेक्षा शास्त्रीय संगीतमयता का मार्ग क्यों चुना? वर्णाकार कोई साधारण पुरुष नहीं थे और न ही उनकी अनुमति साधारण थी। रय असाधारण-अलौकिक अनुभूति को जो सीधी परम सत्ता से जोड़ती है, प्रकट करने के लिए एक ऐसा साधन आवश्यक था, जो परमात्मा की तरह सर्वव्यापक हो। ऐसा एक साधन, ‘नाद’ था। गुरुवाणी में उसी नाद के लिए ‘शबद नामक शब्द का प्रयोग हुआ है। राग और गुरुवाणी में यह तथ्य गौरतलब है। कि वाणीकार गुरुओं ने घोर श्रृंगारिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग होने वाले रागों को भी अलौकिक वाणी के साथ प्रयुक्त किया। मसलन, संगीत दर्पण में श्रीराग का वर्णन कामोन्मादी धीरा नायिका के रूप में हुआ है। यह राग सांसारिक लोगों के मन में वासना और उन्माद पैदा करता है। लेकिन गुरुवाणी में उसी राग को शिरोमणि राग का उदात्त दर्जा देकर उसे भक्ति और अध्यात्म के पवित्र लोक से जोड़ा गया है, जहां सिर्फ सात्विक भाव है। गुरुवाणी में कहा गया है-‘रागा विच श्रीराम है जो सच धरे प्यार।’ 

इसी प्रकार संगीत दर्पण में राग सोरठ की उपमा पुष्ट वक्षस्थल वाली एक ऐसी नवयौवना से दी गई है जिसके चारों ओर भंवरे मंडराते रहते हैं। इसके विपरीत गुरुवाणी में अध्यात्म मार्ग के पथिक को इस राग को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है। इस प्रकार गुरुवाणी में इस घोर श्रृंगारिक राग का भी पूर्ण आध्यात्मीकरण कर दिया गया है। सोरठ’ सो इस पीजिए कबहु न फीका होई। नानक राम नाम गुण गाइए दरगाह निर्मल सोई॥ 

शबद और कीर्तन के गायन की यह अवधारणा अत्यंत सुविचारित है। इसमें बिलकुल सांसारिक जनों की ही तरह उत्तम रागों और संगीत को उदात्त भावनाओं तक पहुंचने का निमित्त माना गया है। इसमें हर्ष, विषाद, प्रसन्नता या भंगार जैसे सांसारिक भावों की अनुभूति को भी खारिज नहीं किया गया है। शबद या कीर्तन के माध्यम से उसको भक्ति से जोड़ दिया गया है। मधुर राग में कीर्तन का गायन और श्रवण करने वाला व्यक्ति आनंद की उस परमावस्था को प्राप्त कर लेता है, जो हमें दरगाही अनुभूति प्रदान करती है। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

2 + one =