गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है |Why is Govardhan Puja celebrated?

गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है

अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है |Why is Govardhan Puja celebrated?

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होने वाला ‘प्रकृति पूजन’ यानी गोवा पूजा समूचे ब्रज में मनाए जाने वाले दीपावली के पांच पर्वो-धन तेरस धन्वंतरि त्रयोदशी, नरक चौदस या यम चतुर्दशी, दीपावली महोत्सव या ज्योति पर्व, गोवर्धनपूजा और यम द्वितीया या भाईदोज सर्वाधिक महत्वपर्ण हैं। 

 अगर यों कहा जाए कि समूचे ब्रज क्षेत्र में दीपावली से भी ज्यादा यदि किसी पर्व की महत्ता है तो वह गोवर्धन पूजा की है। इस अवसर पर ब्रज क्षेत्र में ही नहीं बल्कि समूचे देश में दीपावली के दूसरे दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ महिलाएं गाय के गोबर से गोवर्धन बनाकर उसकी पूजा करते हैं और भगवान से परिवार की रक्षा की प्रार्थना करती हैं। कहते हैं कि इसी दिन देवाधिदेव इंद्र के दर्प को चूर-चूर कर योगीराज भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों के साथ गिरिराज गोवर्धन महाराज की पूजा-अर्चना की थी। 

गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है

इसी के साथ जुड़ा है अन्नकूट, जिसका आयोजन बल्लभ कुल संप्रदायों के मंदिरों में बड़े पैमाने पर और सुंदरता के साथ किया जाता है। इसकी शुरुआत तो दशहरे से ही हो जाती है और आने वाले 21 दिनों तक भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। इनका भगवान को भोग लगाकर वह प्रसाद भक्तों में बांट दिया जाता है।

प्राचीन ग्रंथों और कथाओं के अनुसार ब्रज क्षेत्र में पहले देवाधिदेव इंद्र की पूजा की जाती थी। क्षेत्र के लोगों की मान्यता थी कि देवराज इंद्र समस्त मानव जाति, प्राणियों, जीव-जंतुओं को जीवनदान देने और उन्हें तप्त करने हेतु वर्षा करते हैं। इसी कारण साल में एक बार इंद्र की पूजा की जाती थी। चूंकि यह पूजा उनके पूर्वज भी करते थे। इसलिए ब्रजवासी इसे करना अपना कर्तव्य समझते थे। उनका मानना था कि इंद्र देवता की पूजा जो नहीं करेगा, उसका कभी कल्याण नहीं होगा। यह भय उन्हें पूजा के प्रति श्रद्धा और भक्ति से बांधे रहता था। 

 श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि वन और पर्वत हमारे घर हैं। गिरिराज गोवर्धन की छत्रछाया यानी उनके नीचे हमारा पशुधन चरता है। उससे हमें वनस्पति और छाया मिलती है। अतः हमें इसकी पूजा करनी चाहिए न कि इंद्र की। 

गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है

जैसे ही इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने हमारी पूजा बंद कर दी है, कुपित होकर ‘सावर्त’ मेघ को अपने साथ अन्य मेघों को लेकर गोकुल पर भयानक वर्षा कर तबाह करने का आदेश दे दिया। आंधी-तूफान के साथ भयानक वर्षा होने लगी। चारों ओर हा-हाकार मच गया। हे कृष्ण, हे कन्हैया की पुकार होने लगी। गोवर्धन पर्वत के चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देने लगा। इसी दौरान स्वयं देवेंद्र अपने ऐरावत पर सवार हो गोकुलवासियों को पूजा न करने का दंड देने आए। कृष्ण तुरंत इंद्र की चाल समझ गए और उन्होंने पल में ही अपनी तर्जनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रज की रक्षा की। अपने चक्र से उन्होंने चारों ओर का पानी तुरंत सुखा दिया। इंद्र ने जब वास्तविकता समझी, तब कृष्ण से क्षमा याचना की। बाद में कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पुनः दूध, दही से पूजा की और छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजनों से भोग लगाया। ग्वाल-बालों, ब्रजवासियों के भोग से गोवर्धन पर्वत छुप गया यानी इतना भोग चढ़ाया गया कि एक दूसरा पहाड़ दिखाई देने लगा। 

‘अन्नकूट जैसो गोवर्धन, अरू पकवान धरे कोदन। 

और लाग्यो भात को कोट, ओट गिरिराज छिपान्यो।’

तभी तो गोवर्धन पूजा के साथ-साथ ‘अन्नकूट’ भी मनाया जाने लगा। गोवर्धन पूजा के अवसर पर ब्रज के घर-घर में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। 

इस दिन मंदिरों में तो गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का त्योहार बड़ी धूमधाम, हर्षोल्लास से मनाया ही जाता है, घरों में भी मनाया जाता है। घर के आंगन में गोबर से आकृति बनाकर सींकों के ऊपर रुई लगाकर पेड़ आदि बनाए जाते हैं। दीए में दीपक जलाते हैं। खील-बतासे, दूध-दही, शहद आदि चढ़ाया जाता है। इसके बीच में मटकी, गजरिया और ग्वालिन आदि बनाई जाती है।

गोबर से बने गोवर्धन पर पूड़ी, खीर, मिठाई आदि का भोग लगाते हैं। अन्नकूट मंदिरों में तो मनाते हैं, घरों में भी सभी सब्जियों, बाजरा, मूंग, चावल आदि को मिलाकर अन्नकूट बनाया जाता है और भगवान के भोग में खोए-मेवे की बनी सभी मिठाइयां, चावल, मखाने, मेवे की खीर, खोये तिल से बनी मिठाई, गजक, शीतल भोग, मैसूर पाक, सूखे मेवे और मौसम के हिसाब से फल आदि मिलाकर छप्पन भोग समर्पित किए जाते हैं। इस प्रकार अन्नकूट और गोवर्धन पूजा हमारी प्राचीन संस्कृति, परंपरा, इष्टदेव के प्रति आस्था और अगाध प्रेम का जीवंत प्रतीक है। 

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