दीपावली क्यों मनाई जाती है? Why is Diwali celebrated?

दीपावली क्यों मनाई जाती है?

दीपावली क्यों मनाई जाती है ?

कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि को दीपावली का पालन संपन्न होता है। इसे दीप पर्व भी कहा जाता है। इसकी रात्रि में महान पूजन किया जाता है-शुभ और लाभ की कामना करते हए। घर पर महर्त में तथा दुकान पर पूजन चल मुहूर्त में किया जाता है। लक्ष्मी के साथ गणेश के भी पूजन की इस दिन परंपरा है। कारण स्पष्ट है। श्रीगणेश अधिष्ठाता हैं। बुद्धिहीन के पास यदि प्रारब्धवशात् लक्ष्मी आ भी जाए तो वह उसका दुरुपयोग करके जल्दी ही नष्ट कर देता है। ऐसे व्यक्ति का साथ की छोड़ देती है, फलतः वह जीवित दिखता हुआ भी मृतवत हो जाता है। 

दीपावली क्यों मनाई जाती है

इसे ‘वैश्य’ जाति के पर्व के रूप में इसीलिए प्रतिष्ठा प्राप्त है। परंपरा के अनुसार, आय-व्यय आदि से संबंधित बही-खातों को इसी दिन से बदला जाता था। धनी-व्यापारी अपने आश्रितों को धन एवं भेंट दिया करते थे. ताकि वे भी दीपावली पर अपने परिजनों के साथ हर्षोल्लास का आनंद ले सकें। शक्ति परंपरा को मानने वाले कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि को महाकाली का पूजन करने के बाद शक्ति पूजा का विसर्जन करते हैं। इस प्रकार महालक्ष्मी पूजन जहां वैदिक परंपरा का अनुष्ठान है, वहीं महाकाली की उपासना तंत्र सम्मत महाविद्या आराधना की पावन रात्रि है, जिससे अमावस्या की रात्रि अलौकिक प्रकाश से प्रकाशित हो उठती है। 

मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद श्रीराम के अयोध्या आगमन पर पूरे नगर को दीयों से सजाया गया था, बस उसी दिन से दीपावली को इस रूप में मनाया जा रहा है। विक्रमी संवत् का शुभारंभ इसी दिन से माना जाता है, इसी दिन विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था। भारत के अध्यात्म को विदेश में प्रचारित-प्रसारित करने वाले युवा संन्यासी स्वामी रामतीर्थ के जीवन से दीप पर्व का विशेष संबंध है। उनका जन्म, संन्यास और महानिर्वाण दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए उन्हें अपना आदर्श मानने वाले राम प्रेमी इस पावन पर्व को ‘रामदिवस’ के रूप में मनाते हैं। 

इसी तरह जैन ‘हरिवंश पुराण’ के 66वें सर्ग में महावीर भगवान के परिनिर्वाण महोत्सव का वर्णन किया गया है। सर्वज्ञता की प्राप्ति के पश्चात भगवान महावीर भव्यजन समूह को सर्वतः तत्वोपदेश देते हुए ‘पावा’ नगरी में पधारे। वहां मनोहर नाम के उद्यान में विराजमान हुए और स्वाति नक्षत्र के उदित होने पर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि के अंतिम पहर में उन्होंने घातिया कर्मों का नाश कर निर्वाण प्राप्त किया। उस निर्वाण महोत्सव को व्यक्त करती हुई ‘पावा’ नगरी दीपमालाओं से प्रकाशमय हो उठी, मानो सारा आकाशतल ही उतरकर पृथ्वी पर आ गया हो। उसी समय से प्रतिवर्ष आदरपूर्वक भारत में दीपावली पर्व मनाया जाता है। इसी दीपावली पर्व को आजकल लोग धन-समृद्धि का पर्व मानने लगे हैं। भगवान महावीर के परिनिर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला यह पर्व यदि किसी समृद्धि या उपलब्धि का सूचक है, तो वह है मोक्ष-लक्ष्मी की प्राप्ति अथवा केवल ज्ञान रूपी लक्ष्मी की प्राप्ति। 

समृद्धि और दीप के इस पावनोत्सव पर जुआ खेलने की परंपरा भी समाज में देखने को मिलती है। यह प्रतीक है कि आने वाला वर्ष भाग्य की दृष्टि से कैसा रहेगा। लेकिन जो जुआ खेलने की मानसिकता से परिचित हैं. वे इस व्यसन से दूर ही रहते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि पुरुषार्थ से प्रारब्ध में परिवर्तन किया जा सकता है-प्रारब्ध भी तो पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। इस दिन हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि सभी बाह्य और आंतरिक समृद्धि से संपन्न हों। सभी के जीवन में ज्ञान का प्रकाश आलोकित हो। प्रसन्नता सभी के रोम-रोम से इस प्रकार प्रस्फुटित हो, जैसे फुलझड़ी से निकलने वाली रंग बिरंगी चिंगारियां।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

13 − three =