धनतेरस क्यों मनाया जाता है या धन्वंतरि त्रयोदशी क्यों मनाई जाती है

धनतेरस क्यों मनाया जाता है

धनतेरस (धन्वंतरि त्रयोदशी) क्यों मनाया जाता है-Why is Dhanteras celebrated?

धार्मिक पर्व हमारी संस्कृति और परिवेश से जुड़े हुए हैं। धन्वंतरि जयंती या धनतेरस भी इसी परंपरा की एक कड़ी की तरह नजर आता है। यह भारतीय संस्कृति का जन स्वास्थ्य दिवस है। 

आयुर्वेद के विभिन्न ग्रंथों में प्राप्त विवरण के अनुसार आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वंतरि ही हैं, जो सुश्रुत संहिता के प्रथम अध्याय से स्पष्ट है। धन्वंतरि नाम का उल्लेख सर्वप्रथम वैदिक काल में समुद्र मंथन के प्रसंग में ‘अमृत कलश धारण किए हुए देव’ के लिए मिलता है। हरिवंश पुराण तथा ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार दीर्घकाल तक तपस्या और अनुष्ठान करने के बाद उनके यहां समस्त रोगों का नाश करने वाले देव धन्वंतरि उत्पन्न हुए। दैर्धतप के पुत्र धन्वंतरि आयुर्वेद के प्रवर्तक, यज्ञभाग के अधिकारी एवं विष्णु के अवतार थे। इनके स्मरण मात्र से ही रोगों का नाश हो जाता था। उन्हें अणिमा, महिम आदि आठों सिद्धियां प्राप्त थीं। 

धनतेरस (धन्वंतरि त्रयोदशी) क्यों मनाया जाता है

धन्वंतरि जयंती का पावन दिवस न केवल आयुर्वेद से, अपितु समग्र जन स्वास्थ्य से प्रत्यक्षतः जुड़ा हुआ है। इसे केवल धार्मिक या सांस्कृतिक या पौराणिक पर्व के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए। इसका वैज्ञानिक महत्व भी है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जनस्वास्थ्य से इसका सीधा संबंध है। हमारे देश में बहुत पुराने समय से यह परंपरा रही है कि दीपावली का पर्व आने से पर्व ही हम अपने घरों एवं दुकानों की सफाई कराकर साल भर में इकट्ठा हुई गंदगी को निकाल बाहर करते हैं। घरों और दुकानों की सफाई-पुताई करा कर एक प्रकार से स्वच्छता अभियान चलाया जाता है। इसका कारण यह है कि घरों और दुकानों की सफाई का सार्वजनिक जन स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। यह देखा गया है कि इस अवसर पर सफाई का अभियान प्रकृति के द्वारा भी जोर-शोर से चलाया जाता है। वर्षा ऋतु के कारण नदियों, तालाबों और पोखर आदि का पानी मिट्टी युक्त और दूषित हो जाता है। वर्षा के कारण घरों में सीलन और नमी आ जाती है। इससे अनेक जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाते हैं। जो सार्वजनिक और व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु (आश्विन-कार्तिक माह) आने पर उन नदियों और तालाबों का पानी स्वतः ही स्वच्छ और निर्मल हो जाता है और सूर्य की प्रखर किरणें मकानों की सीलन को दूर करती ही हैं, हानिकारक कीड़े-मकोड़ों को भी नष्ट कर देती हैं। आज हम विकास की ओर अग्रसर हैं। हमने सामाजिक दृष्टि से, औद्योगिक दृष्टि से, आर्थिक दृष्टि से एवं वैज्ञानिक दृष्टि से विकास की सीढ़ियों को पार किया है और अपनी सुख-सुविधा के अनेक साधन अर्जित किए हैं। विकास की इस दौड़ में हम उन हानियों को नजरअंदाज कर गए, जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक एवं व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित किया और उसे हानि पहुंचाई। औद्योगिक एवं वैज्ञानिक विकास ने हमें सुख-सुविधा के जितने साधन उपलब्ध कराए हैं, उनमें से अनेक ने हमारे व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया है। आज हमें चारों ओर से विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों का सामना करना पड़ रहा है।

धन्वंतरि त्रयोदशी (धनतेरस) का पर्व आयुर्वेद व उसके अनुयायियों के लिए विशेष महत्व का है। आयुर्वेद केवल चिकित्सा शास्त्र या स्वास्थ्य रक्षा विज्ञान ही नहीं, अपितु वह एक ऐसा संपूर्ण जीवन विज्ञान है, जिसे मानव जीवन के व्यावहारिक पक्षों का वैज्ञानिक आधार प्राप्त है। हमारे देश में सुदीर्घ काल से आयुर्वेद की परंपरा चली आ रही है। जब कभी देश में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का प्रादुर्भाव हुआ, आयुर्वेद के माध्यम से वैद्यों ने उसका समाधान किया। अनेक जीर्ण रोगों की चिकित्सा में आयर्वेद पर्ण सक्षम सिद्ध हुआ है। 

आयर्वेद एक गतिशील, पूर्ण विकसित एवं पूर्ण चिकित्सा विज्ञान है जो जीवन विज्ञान के रूप में भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर के रूप में हमारे पास सुरक्षित है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उसकी आत्मा को समझे और उसे उसकी पद्धति से अपनाएं-किसी अन्य चिकित्सा तरह नहीं। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

2 + five =