चातुर्मास व्रत क्यों मनाई जाती है | Why is Chaturmas Vrat celebrated?

चातुर्मास व्रत क्यों मनाई जाती है

चातुर्मास व्रत क्यों मनाई जाती है |Why is Chaturmas Vrat celebrated?

हमारे देश में छ: ऋतुएं आती हैं, इनमें से एक वर्षा ऋतु भी है। वर्षा ऋतु को वर्षाकाल, वर्षावास चौमास अथवा चातुर्मास के नाम से भी जाना जाता है। छह ऋतुओं में यदि वर्षा ऋतु न हो, तो बाकी की ऋतुएं महत्वहीन हो जाती हैं। इसके बिना उनका सारा सौंदर्य जाता रहता है। वर्षाकाल ही अपने शीतल जल से धरती मां की प्यास बुझाकर उसे उर्वर बनाता है। बदले में धरती मां हमें धन-धान्य से परिपूर्ण कर वैभवशाली बनाती है और इस प्रकार हमारी ही नहीं, इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों की आवश्यकताओं की पर्ति करती है। वर्षाकाल से ही हमारा ऋतु चक्र संभव हो पाता है, वर्षा न हो तो सूखा और अकाल पड़ना अवश्यंभावी है। 

पहले जब यातायात के साधन सीमित थे और मार्गों का निर्माण भी व्यवस्थित रूप से नहीं हुआ था, वर्षा ऋतु में यात्रा करने का शास्त्रीय निर्देश था। ऐसा करना तब व्यावहारिक विवशता भी थी। घर में कितना कोई काम करता। इसलिए नियमित और संयमित खान-पान के साथ ही सामूहिक रूप से ऐसे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन किए जाते थे, जिनसे तन-मन की प्राप्ति हो, रोग पास न फटकें। 

लगभग सभी धर्मों में इसीलिए वर्षाकाल में संतों के एक ही स्थान पर रहने की पद्धति प्रचलित रही है। यह कोई विवेकहीन व्यवस्था नहीं है। इसके धार्मिक, वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक कारण हैं। वर्षाकाल आते ही कुछ स्वाभाविक बदलाव प्रकृति में होने लगते हैं, जिनमें पर्यावरण का परिवर्तन सबसे प्रमुख है। 

जहां वर्षा का शीतल जल वातावरण को ठंडक प्रदान कर सुहावना और प्रिय बना देता है, वहां यह नाना प्रकार के जीवों की उत्पत्ति में भी सहायक बनता है। ऐसे में आवागमन का प्रयास जीव रक्षा की भावना अर्थात अहिंसा के भाव के प्रतिकूल साबित होता है। संतों का जीवन ही परोपकार के लिए होता है। वे दसरों को इसकी शिक्षा देते हैं और समाज को जीव रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी यात्राओं या गतिविधियों में वे इस तथ्य को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं। इसीलिए संतों-महंतों का वर्षाकाल में एक ही स्थान पर रहना आवश्यक माना जाने लगा। 

वर्षा का कोई निश्चित समय भी नहीं होता। पता नहीं कब इंद्र देवता जल से हमें भिगो दें। इस मौसम में सड़कों और गली-कूचों में इतना पानी भर जाता है कि वहां से निकलना दूभर हो जाता है। तेज बारिश से वे टूट या बह जाती हैं या उनमें गड्ढे बन जाते हैं। नदियों में जल का प्रवाह इतना तेज होता है कि नाव भी नहीं चल पाती। इस कारण भी यात्रा असुरक्षित हो जाती है। इसलिए जीवन रक्षा हेतु भी मुनियों को स्थिरवास करना होता है। ऐसे में वर्षा ऋतु में आत्म आराधना धर्म प्रभावना का लक्ष्य रखा जाता है। वर्षाकाल जप-तप और त्याग को निमंत्रण देता है। इन सबका संबंध मन की स्वस्थता व आत्मशुद्धता से है। विचारों की एकाग्रता से मन स्वस्थ रहता है। आहार की स्वल्पता से तन को स्वस्थ रहने में सहायता मिलती है। 

इसके अतिरिक्त वर्षा ऋतु में बहुत से पदार्थ बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं। उनका सेवन शरीर के लिए हानिकारक है। इसलिए वर्षा ऋतु में उपवास का महत्व बढ़ जाता है। तप इस ऋतु में तन को नीरोग रखता है। मुनिजन भी एक स्थान पर रहकर ध्यान-चित्त हो अपनी ज्ञानाराधना करते हैं, जो उनके लिए और जनता के लिए वरदान सिद्ध होती है। इसी भावना को आधुनिक रूप देकर हम वर्षा काल को आज के शहरी जीवन के लिए भी अत्यंत उपयोगी बना सकते हैं। जैसे स्वास्थ्य या संस्कार शिविरों का आयोजन कर। वर्षाकाल में अध्यात्म की महती प्रगति होती है। अध्यात्म ही वास्तव में जीवन को गति और सही दिशा प्रदान करता है। इसके अभाव में मानव, दानव बन जाता है। इन्हीं कारणों से वर्षाकाल का प्रत्येक धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है।

अपनी-अपनी मान्यताओं और आस्थाओं के साथ इस काल में सभी धर्ममय हो जाते हैं। ऋतु चक्र और पर्यावरणीय विशेषताओं को ध्यान में रखकर निर्धारित किए गए हमारे धर्माचार हमारे जीवन को प्रकाशित कर हमें सन्मार्ग की ओर ले जाते हैं। जिससे हमारा जीवन सुगंधित बनता है। 

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