गीता जयंती क्यों मनाई जाती है |Why Geeta Jayanti is celebrated?

गीता जयंती क्यों मनाई जाती है

गीता जयंती क्यों मनाई जाती है |Why Geeta Jayanti is celebrated

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी गीता जयंती के नाम से जानी जाती है। माना जाता है कि गीता का प्रादुर्भाव कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास में कृष्ण की  प्रिय तिथि शुक्लपक्ष की एकादशी को लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हआ था। यह तिथि ‘मोक्षदा एकादशी’ के नाम से भी विख्यात है। महाभारत यद्ध के समय अर्जुन को जो व्यामोह हुआ था, उसे भंग करने के लिए कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिए थे, वही भगवद् गीता का उपदेश कहलाता है।

गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है। यह किसी देश, काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं, अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसे संपूर्ण मानव जाति के लिए ही कृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है। उपदेश यह है कि कर्म करो, कर्म करना मनुष्य का कर्तव्य है, परंतु यह कर्म निष्काम भाव से होना चाहिए। गीता इष्टपद की सिद्धि के लिए ध्यान, धारणा, पूजा अर्चना अथवा समाधि में लीन होने की शिक्षा नहीं देती, बल्कि सतत कर्म एवं समाज कल्याणार्थ प्रयत्न करने की शिक्षा देती है। गीता की शिक्षा की खूबी यह है कि इसमें समाज का कल्याण एवं व्यक्ति का कल्याण, दोनों अविभाज्य रूप से एक हो जाते हैं। गीता की शिक्षा यह है कि संसार से विरक्त होकर अलग हो जाने का कुछ भी फल न होगा। इसमें फल की आसक्ति से रहित होकर कर्म करने का जो उपदेश है, उसे सभी स्त्री-पुरुष अपना सकते हैं-चाहे वे कहीं रहते हों, किसी धर्म-संप्रदाय के मानने वाले हों। गीता कहती है, काम्य कर्म करने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। वह तो ऐसे निष्काम कर्म से होती है, जिसमें अपने व्यक्तिगत लाभ या कल्याण का कोई स्वार्थ निहित न हो। गीता में यज्ञ के प्रसंग में कहा गया है, हे अर्जन! आसक्ति से रहित होकर तू यज्ञ (निष्काम कर्म) के लिए ही कर्म कर। केवल कर्म ही करना तुम्हारा अधिकार है, फल चाहे जो भी हो। कृष्ण कहते हैं कि मुझे अर्पण करो। यदि भगवद सत्ता पर विश्वास है तो हम अपने सभी सत्कर्म भगवान को अर्पित कर सकते हैं। 

गीता जयंती क्यों मनाई जाती है

गीता कर्म, ज्ञान एवं भक्ति के माध्यम से किंकर्तव्यविमूढ़ मनुष्य को सन्मार्ग दिखाने वाला अद्भुत ग्रंथ है। मनुष्य का कर्तव्य क्या है ? इसका बोध करना गीता का लक्ष्य है। गीता में 18 अध्याय एवं कुल 700 श्लोक हैं। महाभारत के भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 42 तक फैले इन 700 श्लोकों का संकलन गीता है। भगवद् गीता का अर्थ है- भगवान के द्वारा गाया हुआ गीत । गीता हमें जीवन की कला सिखाती है, सभी परिस्थितियों में समभाव से रहने की शिक्षा देती है। भक्ति, ज्ञान एवं कर्म-ब्रह्म के साक्षात्कार के तीन मार्ग हैं। तीनों के बीच घनिष्ट संबंध है। एक के बिना दूसरे की स्थिति नहीं। गीता में तीनों साधनों की उपयोगिता और उनकी अन्योनाश्रिता के बारे में बताया गया है। ज्ञान मार्ग, परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करना है। भक्ति मार्ग, ईश्वर की परम, सच्ची भक्ति द्वारा ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयत्न है एवं निष्काम भाव से फल की परवाह किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करना कर्म मार्ग है। हम अपने वर्तमान जीवन में अपनी दूरदर्शिता एवं सत्कारों के द्वारा अपनी दशाओं एवं परिस्थितियों को बदल सकते हैं। 

गीता जयंती क्यों मनाई जाती है

महाभारत के अंत में वेदव्यास कहते हैं, गीता आचरण करने के लिए है। इसे अच्छी तरह पढ़कर इसके अर्थ और प्रयोजन को हृदय में उतार लेना ही श्रेयस्कर है। इसीलिए गांधीजी कहते थे कि गीता का मुख्य उद्देश्य अनासक्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन करना है। उन्होंने संपूर्ण गीता का सार ‘अनासक्ति योग’ नाम से तैयार किया। इसका संदेश आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, आवश्यकता है उसे समझने एवं अनुसरण करने की। गीता जीवन के रणक्षेत्र में मानव को कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान कराती है एवं उसे ऊहापोह के भ्रमजाल से निकालकर नई दृष्टि देती है। हमें अपने लक्ष्य का बोध रहे, हमारी जीवन शैली में उत्कृष्टता बनी रहे तथा चिंतन में ओजस्विता रहे, इसी की याद दिलाने के लिए गीता जयंती मनाई जाती है।

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