होली का त्योहार क्यों मनाते हैं? रंगों का त्यौहार Holi कब और क्यों मनाते हैं?

होली का त्योहार क्यों मनाते हैं?

होली का त्योहार क्यों मनाते हैं? रंगों का त्यौहार Holi कब और क्यों मनाते हैं? रंगों का त्योहार होली

हमारा देश त्योहारों का देश है। हर माह यहां कोई न कोई रंग-बिरंगा और सजीला त्योहार होता है। लेकिन माघ एवं फाल्गुन-ये दो माह मदनोत्सव से जुड़े हैं। मदन का दूसरा नाम है-प्रणय, प्रेम और शृंगार। इसलिए यह मौसम ही प्रण और प्रेम का मौसम बन गया, जिसमें नृत्य, गायन, मस्ती एवं श्रृंगार की छटा प्रकृति से लेकर इंसान के चेहरों तक पर बिखरी होती है। ये सभी प्रेम का संदेश बांटते हैं। यह वह मौसम है जिसमें वसंत से प्रकृति की नई साज-सज्जा व शृंगार से संवरती होली में मस्ती व खुशी से झूमती नजर आती है। भविष्य पुराण के अनुसार नारदजी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा, ‘राजन! फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिए, जिससे सारी प्रजा उल्लासपूर्वक हंस सके।’ 

रंगों का त्यौहार Holi कब और क्यों मनाते हैं?

जिंदगी जब सारी खुशियां स्वयं में समेटकर प्रस्तुति का बहाना मांगती है, तब प्रकृति मनुष्य को होली जैसा त्योहार देती है। असल में होली बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयत्न है, इससे जिंदगी जीने का नया अंदाज मिलता है, औरों के दुख-दर्द को बांटा जाता है, बिखरती मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा जाता है। आनंद और उल्लास के इस सबसे मुखर त्योहार को हमने कहां से कहां लाकर खड़ा कर दिया है। कभी होली के चंग की झंकार से जहां मन की गांठें खुलती थीं, दूरियां सिमटती थीं, वहां आज होली के हुड़दंग और गंदे तथा हानिकारक पदार्थों के प्रयोग से डरे-सहमे लोगों के मनों में होली का वास्तविक अर्थ गुम हो रहा है। अधिकांश लोगों का मन तो होली के इस रंगीले त्योहार में डूबने और खो जाने को ही करता है। आचार्य महाप्रज्ञ ने रंगों स होली खेलने का अभिनव तरीका प्रस्तुत किया है। प्रेक्षा ध्यान पद्धति में वे व्यक्ति को ध्यान की गहराइयों में ले जाकर विभिन्न रंगों का ध्यान करवाते है। रंगों की अनुभति के साथ ध्यान में गहरे उतरते हुए व्यक्ति सचमुच विभिन्न रंगों से स्वयं रंगता चला जाता है। 

विभाक्तयों में बंटता-बंटता आदमी का मन बहत अकेला हो गया है। होली जैसे पर्यों से आपसी सद्भाव एवं सौहार्द को कायम किया जा सकता है। अपनी सभी कुंठाओं और पीड़ाओं को भुला देने का यह अच्छा अवसर है। इस दिन तो अमीर और गरीब के बीच भी कहीं कोई अंतर नहीं आता। सभी मस्ती और प्रेम में पगलाए हुए झूमते हैं। यह समाजवाद का एक अनुकरणीय उदाहरण है। वर्ष में कम से कम एक दिन तो ऐसा अपने लिए निश्चित हुआ है, जिस दिन सभी गमों को भुलाकर हंसी-खुशी और मस्ती में खो जाते हैं। हानिकारक रंगों और गुलाल का खेल अवश्य पागलपन है। यह पागलपन भी अनुकरणीय लगता है। 

रंगों का त्यौहार Holi कब और क्यों मनाते हैं?

होली प्रेम एवं प्रणय से सराबोर है। होली पर एक-दूसरे के रंग लगाने, पानी से खेलने और एक-दूसरे का स्पर्श-एक सुखद अनुभव और एहसास है। फिर होली आ रही है, एक बार फिर मस्ती छनेगी। धूम-धड़ाका, गाना, बजाना, चीखना-चिल्लाना, उछलना, कूदना सब चलता है। पूरे साल भर की घुटन खुल जाती है। इसके बाद मन फिर नए सिरे से काम करने के लिए ताजा हो जाता है। 

होली यानी मस्ती, आजादी, हंसी-खुशी! सभी गम, सभी चिंताएं भूलकर राग-द्वेष मिटाकर दूसरे के रंग में, उसके स्वभाव में रंग जाने का नाम है होली! गिले-शिकवे और नाराजगी को भूलने का नाम है होली। जो बीत गई सो बात गई, जो हुआ सो हुआ, बात हो ली, तो हो ली। मर्यादा में सिमटे श्रीराम के साथ होली लोकप्रिय नहीं हुई। वह जुड़ी तो नटखट कान्हा के साथ। तभी तो ब्रज की हर गली, हर कूचे से सुनाई देती है, ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे…!’ 

होली मैले कपड़ों में नहीं खेली जाती। स्वच्छ होकर खेली जाती है। स्वच्छ निर्मल तन पर ही रंग दिखेंगे, सफेद कपड़ों पर ही तो रंगों की छटा निखरेगी। तन भी साफ हो और मन भी। मन पर दूसरों का रंग नहीं चढ़ेगा, जब मन में मैल न हो। होली तभी खेली जा सकती है जब सामने कोई हो और खेलना भी चाहे । स्वयं पर तो रंग डाल नहीं सकते। रंग तो कोई और ही डालेगा, अपने प्रेम का रंग, अपने व्यवहार का रंग, अपनी प्रसन्नता का रंग। जो प्रेम न बिखेरना चाहे उससे जबरदस्ती प्रेम नहीं किया जाता, उससे यू नहा कह सकते कि हम पर रंग डालो, हमें रंग दो, या फिर आओ हम ही तुम्ह रग दें। यह तो अनकही भाषा है, जिसे आंखों ही आंखों में पढ़ लिया जाता है। किसके पास रंग है, किसके हृदय में प्रेम है, यह खुद-ब-खुद समझ आ जाता है। 

होली का संदेश है-हंसो हंसाओ, मुक्त हो जाओ, जो रंग दे उसे रंग को क्षमा करो, सहनशील बनो। इस दिन जो बिना रंग के रह गया, वह फीका गया। जीवन में रसों की प्रधानता है, बिना रस के, बिना रंग के कोई नहीं जीना चाहता। इस दिन लोग बाहर निकलते हैं। एक हाथ में गुलाल लिए तो दसरे में पिचकारी थामे । मन में तुम्हारे प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। हम तुम्हारे रंग में रंगने को तैयार हैं, तुम भी चाहो तो हमारे रंग में रंग सकते हो, दूसरे के रंग में रंगना यानी उसकी भावनाओं को समझना, उसके विचारों को सुनना, उसकी बात का मान रखना। किसी को अपने रंग में रंगना या अपनी कहना, अपनी सुनना अपने और दूसरे के बीच से सभी द्वेषों को मिटा देना, अपनी मस्कराहट से दूसरे के दिल को भेद देना। होली प्रेम का त्योहार है, संयम से मुक्त हो जाने का त्योहार है। वर्ष भर व्यक्ति को संयम में रहने का प्रशिक्षण ही तो दिया जाता है। तुम पुरुष हो संयम में रहो, तुम स्त्री हो मर्यादा में रहो। मगर होली आते ही मानो समाज भी ढील देता है कि भई खेल लो, संयम की बेडियां ढीली किए देते हैं। न उम्र का भेद आड़े आता है, न पुरुष या स्त्री होने का। 

रंगों का त्यौहार Holi कब और क्यों मनाते हैं?

होली में न जात रहती है न पात, न मत, न संप्रदाय, न धर्म न कर्म। सभी दीवारों को फांदती होली, सभी बेड़ियों पर से उड़ता गुलाल, मानो व्यक्ति के अहं पर ही धूल डाल देता है। तर-बतर हुआ हर व्यक्ति, गुलाल में सना हर प्राणी एक-सा ही दिखता है। इस दिन किसी का कोई अपना अस्तित्व नहीं, किसी की अपनी पहचान नहीं, मानो होली के लाल-पीले रंग कह रहे हों, जी धूल डालो अपने मान, पद, प्रतिष्ठा, गोत्र आदि पर। तुम तो साक्षात आनंद स्वरूप हो, आनंद में रहो। प्रेम की यह धूलि हटे तब याद कर लेना अपने मैं को। हिंदू संस्कृति में ज्यादातर त्योहार पूजा-पाठ और ईश्वर की आराधना पर आधारित हैं, किंतु होली लोकपर्व है। इसमें पूजा और धर्म कर्म गौण है। फाल्गुन में मानो समूची प्रकृति ही होली के रस में सराबोर हो जाती है। कहीं लाल फूल, कहीं पीले फूल तो कहीं नीले, हरी-भरी मखमली घास पर लहलहाते गेंदे, गुलाब, मानो कह रहे हों कि सर्दी हो ली सो हो ली, अब वक्त है खिलखिलाने का, हंसने का, आनंद का। 

सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी ने होली के विषय में कहा था, आज हमारे बने फाग, प्रभू संगि मिल खेलन लाग, होली किन्हीं संत सेब, रंग लागा अन लाल देव। अपने शिष्यों को होली खेलने की रीति समझाते हुए 

अर्जन देव ने कहा कि प्रभु, आज मैं फागुन मना रहा हूं, फागुन में तुम्हारे संग खेलने को जी चाहता है। फागुन में यह जो होली आई है, इससे मैं तुम्हारे प्रेम रूपी रंग में रंग जाऊंगा। 

लेकिन आज का सारा माहौल प्रदूषित हो चुका है, जीवन के सारे रंग फीके पड़ गए हैं। न कहीं आपसी विश्वास रहा, न किसी का परस्पर प्यार, न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में एकता का स्वर उठा। बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी। यूं लगता है सबकुछ खोकर विभक्त मन अकेला खड़ा है, फिर से सबकुछ पाने की आशा में। कितनी झूठी है यह प्रतीक्षा, कितनी अर्थ शून्य है यह अगवानी हम भी भविष्य की अनगिनत संभावनाओं को साथ लिए आओ फिर से एक सचेतन माहौल बनाएं। उसमें सच्चाई का रंग भरने का प्राणवान संकल्प करें। होली के लिए माहौल भी चाहिए और मन भी चाहिए, ऐसा मन जहां हम सब एक हों और मन में जमी गंदी परतों को उखाड़ फेंकें, ताकि अविभक्त मन के आईने में प्रतिबिंबित सभी चेहरे हमें अपने लगें। होली हमारा सांस्कृतिक पर्व है। आइए, सब मिलकर होली के वास्तविक अर्थ को समझें। 

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