प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया था | छापेखाने का आविष्कार कब किया |Printing Press avishkar kisne kiya

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया था

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया था | छापेखाने का आविष्कार कब किया |Printing Press avishkar kisne kiya

मुद्रण प्रेस (Printing Press) का आविष्कार चीन में हुआ था। विश्व की प्रथम मुद्रित पुस्तक ‘हरीकसूत’ सन् 868 ई. में छपी थी। इस पुस्तक को ‘वागचिक’ ने लकड़ी के ठप्पे से छापी थी। वे अक्षर बेहद शीघ्र घिसकर खराब हो जाते थे। इस कारणवश लोगों का ध्यान धातु के ठप्पे बनाने की ओर आकर्षित हुआ। इस काम में तकरीबन 400 वर्षों का समय लग गया। 

पी शेंग’ नामक एक चीनी व्यक्ति ने तेरहवीं शताब्दी में मिट्टी और धातु के टाइप बनाए। सन् 1319 ई. में कोरिया के राजा ने धातु के टाइप बनाने का एक कारखाना लगाया। इस प्रकार सन् 1409 ई. को उस कारखाने से बनाए कांस्य टाइप से एक पुस्तक छापी गयी। 

जर्मनी का एक व्यक्ति स्वर्ण का कारीगर था। उसका नाम ‘जोहानेस गटेनबर्ग’ था। वह पन्द्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में जर्मनी के मेंज शहर की टकसाल में ठप्पाकार का कार्य करता था। इन ठप्पों से सिक्के ढाले जाते थे। 

वह सदैव ही कर्ज में डूबा रहता था। उसके पास हमेशा ही धन का अभाव रहा। अधिक धन की व्यवस्था न हो सकी। किन्तु धनवान बनने हेतु नित नए तरह-तरह के फितूर उसके दिमाग में योजनाएं उत्पन्न करते रहते थे। 

सन् 1430 ई. में वह मेंज से ‘स्ट्रैसबर्ग’ चला गया। वहां जाकर उसने पत्थरों पर पॉलिश करने का व्यवसाय प्रारम्भ किया। दुर्भाग्यवश इस व्यवसाय में वह सफलता हासिल न कर सका। फिर वह काम की तलाश में स्ट्रैसबर्ग को छोड़ गया। 

वह वापस सन् 1448 ई. में मेंज आ गया। वहां वह एक नयी योजना को कार्यान्वित करने लगा। उसने पुस्तकें छापने की ओर अपना ध्यान अग्रसर किया। 

इसके लिए उसने एक नई तकरीब सोची। उन दिनों यूरोप में ज्यादातर पुस्तकें हाथों से लिखी जाती थीं। यही कारण था कि वे अधिक मूल्य की होती थीं। कुछ पुस्तकों की छपाई लकड़ी के ब्लॉकों से की जाती थी। उन पर चित्र और अक्षर खुदे होते थे। 

चीन के लोग शताब्दियों से इसी प्रक्रिया से पुस्तकें छापते थे। यह एक लम्बी और धीमी प्रक्रिया थी। 

जोहानेस गटेनबर्ग प्रायः नाम के शुरुआती अक्षर पत्थरों पर खोदता था। कागजों पर मोम डालकर मुहर लगाने हेतु ‘सील’ के रूप में इन पत्थरों का उपयोग किया जाता था। कभी-कभी इन सीलों पर स्याही लगाकर, कागज पर मुहर अंकित की जाती थी। 

यकायक जोहानेस के दिमाग में विद्युत की मानिन्द एक बात कौंधी-अगर उसके पास बड़ी संख्या में पृथक-पृथक अक्षर खुदे हों तो उनसे शब्द, वाक्य और पृष्ठ तैयार किए जा सकते हैं। फिर उसने सोचा-उनको धातु से बनाने में काफी समय लगेगा। इसी कारण उसने पहले लकड़ी के अक्षर तैयार किए। लकड़ी के इन अक्षरों को रेत पर दबाने से जो स्थान बनता था, उन पर तरल धातु उड़ेलकर जितने भी अक्षरों की उसे जरूरत थी, ढाल लिए। 

वे अक्षर अलग-अलग थे, इस कारण उनसे कोई भी शब्द तैयार किया जा सकता था। उसके पश्चात् उन्हें पृथक-पृथक कर, मुद्रण के किसी नये कार्य में उनका प्रयोग किया जा सकता था। 

जोहानेस को सामान्यतः यूरोप में चल-टाइप का प्रयोग करने वाला प्रथम व्यक्ति’ समझा जाता है। 

जोहानेस ने सर्वप्रथम पीतल’ धातु का प्रयोग किया था। अक्षरों को ढालने के पश्चात् उन्हें ध्यानपूर्वक पॉलिश और फिनिश किया जाता था। हां, यह सब अक्षर बराबर नहीं होते थे। इससे भी बुरी बात यह थी कि जब जोहानेस उस पर स्याही लगाकर उन्हें छापता था, तब उसे उन अक्षरों को बहुत जोर लगाकर दबाना पड़ता था। जाहिर है, इससे अक्षरों की आकृति बिगड़ जाती थी। 

इस प्रकार के अक्षरों से बहुत ज्यादा पुस्तकें नहीं छापी जा सकती थीं। सिर्फ काम चलाने लायक छपाई की जा सकती थी। 

जोहानेस ने इस पर पुनः विचार किया। उसने रेत पर अक्षरों को ढालना बंद कर दिया। उसने सीसे पर अक्षरों को ढालने का काम शुरू किया। यह तरीका पहले से बेहतर था, क्योंकि इससे सीसे में ढाले अक्षरों को पॉलिश करने की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती थी। टाइप इतना मुलायम होता था कि वह प्रेस में टूट जाता था। छपाई तो बेहद सरल थी। कठिन था तो सिर्फ और सिर्फ टाइप ढालने का कार्य।

टाइप की गुणवत्ता पर जोहानेस ने विचार किया। उसने सीसे और टिन के भिन्न मिश्रणों का प्रयोग किया। इनसे कुछ छपाई भी की। इस कार्य में पैसे की बड़ी जरूरत पड़ती थी। जबकि वह एक फक्कड़ किस्म का इंसान था। 

सन् 1450 ई. की बात है। इस कार्य में उसकी मदद करने हेतु एक सेठ तैयार हो गया। उस सेठ का नाम ‘होहान फस्ट’ था। वह जोहानेस की आर्थिक मदद करने लगा। उसने जोहानेस के कार्य हेतु उसे पर्याप्त धन दिया। उसे इतना धन प्राप्त हो गया कि एक साल तक वह आराम से अपना प्रयोग करता रहा। 

जोहानेस ने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक छापी। पुस्तक का नाम था-‘भाषण देने की कला’। वह पुस्तक मात्र 28 पृष्ठों की थी। इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ अलग-अलग छापे गए थे। इस कारण पुस्तक खरीदने वाले उन पृष्ठों को एक क्रम में लगाकर ले जाते थे। 

उस समय पुस्तक खरीदकर पढ़ने वालों की संख्या न के बराबर थी। वैसे भी साक्षरता बहुत ही कम थी। जोहानेस ने पुस्तक तो छाप ली थी, परन्तु उसकी खरीददारी न हो सकी। 

इस कारणवश जोहानेस की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने लगी। इसी तरह पांच साल व्यतीत हो गए। अपनी छपाई की असफलता के चलते, उसने इसी बीच ‘बाइबिल’ भी छाप दी। वह बाइबिल 1282 पृष्ठों की थी। उनकी तीन सौ प्रतियां छापी गईं थीं। आज की दुनिया में उसकी 21 प्रतियां शेष हैं। 

इसी बीच सेठ होहान फस्ट, जोहानेस के पास आया। उसने जोहानेस से अपने रुपये मांगे। इस पर जोहानेस ने पूर्ण रूप से अपनी असमर्थता व्यक्त की। फिर क्या था, सेठ ने जोहानेस पर दावा ठोक दिया। जोहानेस विवश था। फिर मरता क्या न करता। 

जोहानेस ने अपने टाइप प्रेस, औजार और कागज सेठ को दे दिये। सेठ ने इन समस्त सामग्री को पीटर शोभर नामक एक दूसरे ठप्पाकार को दे दिये। जिसने टाइप की ढलाई के तरीके में काफी सुधार किए। 

जोहानेस सन् 1465 ई. में मेंज के बड़े पादरी के दरबार में पहुंचा। वहां उसने अपनी बात रखी। इस तरह बड़े पादरी के दरबार में उसकी नौकरी लग गई। उसके कार्यों के अन्तर्गत छपाई का कार्य नहीं था। वह इसी प्रकार अस्थायी तौर पर इधर-उधर भटकता रहा। अन्त में, उसकी जीवन की डोर टूट गई और वह ईश्वर को प्यारा हो गया। पर मुद्रण के इतिहास में उसका नाम अमर हो गया। 

प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया था

शुरू-शुरू में, सभी देशों में लैटिन की पुस्तकें छापी गयीं। सर्वप्रथम इंग्लैण्ड के विलियम केक्साटन ने सन् 1476 ई. में अंग्रेजी भाषा में एक पुस्तक प्रकाशित की। उन दिनों अंग्रेजी टाइप जर्मनी में बनते थे।

सन् 1556 ई. में अपने देश भारत में छापेखाने की मशीनें पहुंच गयीं। भारत में छापेखाने के विषय में सन् 1563 ई. में एक पुस्तक छपी। भारत में पहली बार मलयालम-तमिल टाइप सन् 1577 ई. में कोचीन में एक स्पेनिश द्वारा ढाले गए। उस स्पेनिश का नाम था-‘ले ब्रदर’। 

सन् 1578 ई. तक के कुछ अन्य भागों में छापेखाने का इस्तेमाल प्रारम्भ हो गया। सन् 1578 ई. में ही ‘मलवारी’ (तमिल भाषा) में ‘ईसाई-सिद्धान्त’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की गई। 

मलयालम में ‘क्रिश्चियन पुराणम्’ नामक पुस्तक सन् 1616 ई. में प्रकाशित की गई। इसके पश्चात् ‘ईसाई धर्म-प्रचारक संस्था’ ने चेन्नै और कोलकाता में छापाखाना लगाया। इसके पीछे उनका उद्देश्य ‘सत्य का संदेश’ प्रसारित करना तथा ‘जीवन-ज्योति’ प्रज्ज्वलित करना था। 

चार्ल्स विल्किंस द्वारा ‘श्रीमद्भगवद् गीता’, ‘हितोपदेश’ और ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। विल्किंस द्वारा तैयार किए गए ‘हितोपदेश’ का प्रकाशन सन् 1787 ई. को लंदन में हुआ।

सन् 1792 ई. में महाकवि कालिदास की रचना ‘ऋतुसंहार’ कोलकाता में प्रकाशित हुई। भारत में देवनागरी लिपि में प्रकाशित यह प्रथम पुस्तक है। इस पुस्तक के देवनागरी टाइप ‘हुगली’ में ढाले गए थे। इससे पहले भारतीय भाषाओं के टाइप इंग्लैण्ड से आते थे। 

सन् 1802 ई. में कोलकाता से ‘मर्सिया’, ‘माधवानल’ और ‘सिंहासन बत्तीसी’ का प्रकाशन हुआ। हिन्दी में मुद्रित शुरूआती ग्रंथों में इनका उल्लेखनीय स्थान है। सन् 1803 ई. में ‘प्रेमसागर’ और ‘रामचरितमानस’ का प्रकाशन हुआ। सन् 1860 ई. तक ‘सिरामपुर’ पूर्वी देशों में टाइप-निर्माण का सबसे बड़ा केन्द्र माना जाने लगा। 

मुम्बई के निजी क्षेत्र में प्रथम छापाखाना लगाने का प्रयास भीम जी पारिख नामक व्यक्ति ने किया। सन् 1874-75 ई. में इंग्लैण्ड से उन्होंने एक छापाखाना मंगवाया। कारीगरों की कमी तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों के असहयोगपूर्ण रवैये की वजह से उनका प्रयोग असफल रहा।

पश्चिमी क्षेत्र में भारतीय भाषा का प्रथम छापाखाना सन् 1812 ई. में लगाया गया। उसे मुम्बई के मरदून जी मर्जबान नामक व्यक्ति ने लगाया था। सन् 1812 ई. में छापेखाने से ‘मराठी-पंचांग’ प्रकाशित हुआ। सन् 1816 ई. में ‘अमेरिकन मिशन प्रेस’ की स्थापना की गयी। उस प्रेस के व्यवस्थापकों ने शुरू से ही देश में देवनागरी और मराठी टाइप बनाने के प्रयास किए। 

सन् 1864 ई. में ‘निर्णय सागर प्रेस’ के मालिक स्वामी साव जी दादा जी नामक व्यक्ति ने अपनी भारत प्रसिद्ध फाउण्ड्री ‘निर्णय सागर फाउण्ड्री’ की स्थापना की। इससे ‘अमेरिकन मिशन प्रेस’ और ‘निर्णय सागर फाउण्ड्री’ में देवनागरी और मराठी टाइपों का स्वतंत्र रूप से विकास हुआ। 

हालांकि आज की दुनिया का महानतम प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार गुटेनबर्ग ने किया था, किन्तु वे कभी इस आविष्कार से फल-फूल नहीं पाए। गुटेनबर्ग के आविष्कार ने छापेखाने के रूप में विश्व की बहुत सेवा की। कम्प्यूटर प्रणाली द्वारा छपाई होने से पूर्व विश्वभर के छोटे से लेकर बड़े लाखों छापेखाने में उनका आविष्कार हर प्रकार की छपाई करता रहा। वर्तमान में प्रतिदिन न जाने कितनी पुस्तकें छपती और न जाने कितने समाचार-पत्र और पत्रिकाएं छपकर प्रकाशित होते हैं। ।

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