जीन कलोनिंग की खोज किसने किया- Who discovered gene cloning

जीन कलोनिंग की खोज किसने किया

जीन कलोनिंग की खोज किसने किया- Who discovered gene cloning

क्लोन अथवा जीन कलोनिंग (Clone)– मानव का यह आरम्भ से ही स्वभाव रहा है कि वह ज्ञान अर्जित करे और शक्तियां बटोरे। इसमें वह विजयी भी होता रहा है। मगर विश्व कल्याण के लिए अपनी शक्तियों व ज्ञान-विज्ञान का दुरुपयोग न करना उसकी महानता है। 

विश्व के महान् वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने कहा था-“धर्म के अभाव में विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना धर्म लंगड़ा है। इसलिए अच्छा यही होगा कि विज्ञान का उपयोग मानव-मात्र की रक्षा के लिए उसकी अक्षुण्यता बनाए रखने के लिए किया जाए। विज्ञान तभी अपना उद्देश्य प्राप्त कर सकेगा, जब उसका स्वरूप मानव कल्याणकारी हो।” । 

विज्ञान के क्षेत्र में नित नए आविष्कारों की श्रृंखला में एक आविष्कार है जीन क्लोनिंग। जिसने सम्पूर्ण विश्व में तहलका-सा मचा दिया है। ‘क्लोन’ वास्तव में ग्रीक भाषा का शब्द Twig है जिसका अर्थ है, टहनी। 

जीन कलोनिंग की खोज किसने किया

अलैंगिक प्रजनन द्वारा एक जीवन से पूर्णतः समान आनुवांशिक नक्शे वाले दूसरे जीव की उत्पत्ति क्लोनिंग कहलाती है और इस प्रतिक्रिया से उपजी संतान क्लोन कहलाती है, जिसके जन्म में नर युग्मकों की कोई भूमिका नहीं है। आधुनिक क्लोनिंग का सीधा-सा अर्थ है-शुक्राणुओं की भूमिका का निषेध। क्लोनिंग को ऐसे भी समझा जा सकता है, जैसे किसी पौधे की कलम लगाना।

वैज्ञानिक स्तर पर क्लोनिंग का कार्य सन् 1950 ई. में आरम्भ हुआ। सर्वप्रथम सांड के वीर्य को 79°C तापक्रम पर सुरक्षित रखकर, उसे कहीं भी ले जाने एवं उससे गायों में गर्भाधन हेतु प्रयोग करने में सफलता मिली। इसके बाद, सन् 1952 ई. में रॉबर्ट ब्रिग्गस और थॉमस किंग ने भ्रूण कोशिका से अण्ड में केन्द्रक प्रत्यारोपण द्वारा पहला क्लोन मेंढक का बनाया। किन्तु इस प्रक्रिया से निर्मित टेडपोल की वयस्कावस्था से पूर्व ही मृत्यु हो गई। 

इसके दस वर्ष बाद सन् 1962 ई. में जॉन गर्डन ने भी मेंढक का क्लोन बनाया, पर इसमें भी टैडपोल की वयस्कावस्था से पूर्व ही मृत्यु हो गई। 

तत्पश्चात्, सन् 1978 ई. में विश्व की प्रथम परखनली ‘बालिका लुइसी’ का पौट्रिक स्टेपटू और आर.जी. इडवर्ड के प्रयासों से जन्म हुआ। 

सन् 1985 ई. में राल्फ ब्रिस्टर द्वारा जैविक संरचना को बदलकर प्रयोगशाला में ऐसे सुअरों को जन्म दिया गया, जो ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन पैदा करने में सक्षम थे। 

इसी प्रकार सन् 1986 ई. में कृत्रिम विधि से वीर्य प्राप्त कर किराए की कोख में गर्भधारण कर मैरी बेथ व्हाइट हेड विश्व की पहली सरोगेट मदर बनी। 

इसके सात वर्ष पश्चात् सन् 1993 ई. में हॉल व स्प्लिमैन ने मानव भ्रूणों का क्लोन बनाने में सफलता प्राप्त की। कृत्रिम रूप से प्रथम समरूप जुड़वां उत्पन्न हुए, जिनकी प्रकृति असामान्य थी।

तत्पश्चात्, सन् 1994 ई. से मानव क्लोनिंग की दिशा में प्रयास आरम्भ हुए। इधर, 25 फरवरी, सन् 1997 ।। ई. में एडिनबर्ग स्थित रोजलिन इंस्टीट्यूट के भ्रूण वैज्ञानिक इयान विल्मुट व उनके सहयोगियों ने एक भेड़ का क्लोन (प्रतिरूप, हमशक्ल) बनाने में सफलता प्राप्त की। इस क्लोन भेड़ का नाम ‘डॉली’ रखा गया। भेड़ के क्लोन ने प्रजनन विज्ञान के इतिहास में संगम साथियों (माता-पिता) की सहभागिता को नकार दिया।

इयान विल्मुट ने नर जनन कोशिकाओं की भूमिका को नकार कर सपना लगने वाले शिशु उत्पादन को वास्तविकता में बदल दिया। मगर विश्व के वैज्ञानिकों के एक भाग ने इयान के इस आविष्कार को प्रकृति के नैसर्गिक चक्र के विरुद्ध एक दुष्चक्र बताया। 

जब 27 फरवरी, सन् 1994 ई. को ब्रिटिश शोध-पत्रिका नेचर में यह खबर छपी, तो सम्पूर्ण विश्व में हैरत की भीषण लहर दौड़ गई। 

सन् 1998 ई. में थामस जफरसन ने जैफरसन नामक बछड़े का क्लोन विकसित किया। डॉली भेड़ ने प्रजनन द्वारा स्वस्थ्य मेमने बोनी को जन्म दिया। इसी वर्ष क्लोनिंग विधि से चूहों एवं बछिया का जन्म हुआ। 

भेड़ क्लोन

भेड़ क्लोन की सन् 2002 ई. में रोग से ग्रस्त होने के कारण मृत्यु हो गई थी। डॉली विश्व की प्रथम स्तनधारी क्लोन थी। 

जिस वर्ष डॉली नामक भेड़ का क्लोन तैयार हुआ, उसी वर्ष अमेरिका के शिकागो शहर के एक भौतिक शास्त्री डॉक्टर रिचर्ड सीड ने अपना ही क्लोन बनाने की घोषणा करके दुनिया भर के वैज्ञानिकों को चौंका दिया। इसके बाद वेगास स्थित रेलियन सम्प्रदाय द्वारा सन् 1997 ई. में मानव क्लोनिंग को एक नई दिशा देने के लिए ‘क्लोनेड’ संगठन की स्थापना करके बहस को और हवा दे दी गयी। 

सन् 1998 ई. में क्लोनिंग विधि से चूहों एवं बछिया का जन्म हुआ। इसके बाद सन् 2000 ई. में क्लोनिंग विधि द्वारा जीन संशोधित एण्डी नामक वानर का जन्म हुआ। अगले वर्ष, 2001 ई. में क्लोनिंग द्वारा बिटली ‘सीसी’ का जन्म हुआ। ‘सीसी’ का अर्थ है-कॉपीकैट। 

मगर, मानव क्लोनिंग कर पाना सम्भव नहीं था, क्योंकि 13 जनवरी, 1998 ई. को यूरोप के उन्नीस देशों ने  एक आपसी समझौते द्वारा मानव क्लोनिंग पर रोक लगा दी थी, ये उन्नीस देश थे–इटली, लाटविया, लक्सम्बर्ग, फिनलैण्ड, फ्रांस, डेनमार्क, एस्तेनिया, मालदोवा, मेसोडोनिया, आइसलैण्ड, तुर्की, स्पेन, सान मारिनो, स्वीडन, नार्वे, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, रोमानिया, यूनान आदि। ब्रिटेन और जर्मनी ने समझौता नहीं किया था। 

फ्रांस ने 21 जून, सन् 2001 ई. को चिकित्सका अनुसंधान के क्षेत्र में मानव क्लोनिंग पर प्रतिबंध लगाने सम्बन्धी अधिनियम पारित कर दिया। उधर अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा ने 2 अगस्त, सन् 2001 ई. में मानव क्लोनिंग को संज्ञेय अपराध घोषित करने के विधेयक को स्वीकृति दे दी।

 एक ओर मानव क्लोनिंग को रोकने का प्रयास जारी था और दूसरी ओर ब्रिटेन की उच्च सदन हाऊस ऑफ लार्डस् ने वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों के लिए मानव भ्रूण के क्लोन बनाए जाने सम्बन्धी एक विधेयक को 24 जनवरी, 2002 ई. को स्वीकृति दे दी। 

यद्यपि ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी, रोमन कैथोलिक, यहूदी और मुस्लिम जातियों ने इसका विरोध किया, किन्तु ब्रिटेन सरकार का फैसला नहीं बदला।।

17 दिसम्बर, सन् 2002 ई. को ब्रिटेन की क्लोनिकल कम्पनी के अध्यक्ष ‘ब्रिगिट बाइसलियर’ ने एक मानव क्लोन ‘इव’ तैयार किया, जिसका एक सप्ताह के भीतर जनसाधारण के सम्मुख प्रदर्शन करने की घोषणा की गई। इस विस्मयकारी घोषणा ने सबको स्तब्ध कर दिया। किन्तु उस घोषणा के अनुसार आज तक भी ‘इव’ को प्रकट नहीं किया गया। 

ऐसा ही मानव क्लोन बनाने के लिए डॉक्टर सीड ने वेलिएण्ट वेन्चर नामक कम्पनी की स्थापना की, अभी तक वे मानव क्लोन बनाने के प्रयास में जुटे हैं। 

इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के विश्वविद्यालय के हवांग तु सुक व मून सिन भी मानव क्लोन तैयार करने की घोषणा कर चुके हैं, किन्तु अभी तक परिणाम सामने नहीं आए हैं। 

26 नवम्बर, सन् 2001 ई. में मैसाचुसेट्स के वारसेस्टर नामक स्थान से वैज्ञानिकों ने मानव क्लोन भ्रूण तैयार करने में सफलता प्राप्त की, किन्तु वह क्लोन भ्रूण मात्र पन्द्रह घण्टे ही जीवित रह सका। 

हालांकि वैज्ञानिक मानव क्लोन बनाने में सफल नहीं हो सके हैं, किन्तु फिर भी वैज्ञानिकों का प्रयास जारी है। और तो और, वे बायोनिक मानव बनाने की कल्पना कर रहे हैं। बायोनिक मानव यानि एक डिजाइनर मानव क्लोनिंग में सफलता प्राप्त करने हेतु उत्साहित वैज्ञानिक एक ऐसे मानव की कल्पना को साकार करने में प्रयासरत हैं, जिसकी आंखें घोर अंधकार में देख सकें, जो अपने आस-पास वायुमण्डल में व्याप्त अतिसूक्ष्म आणविक कणों के स्पन्दन को सुन सके और जो मस्तिष्क के निर्देशन पर जितनी गति से दौड़ना चाहे, छलांग लगाना चाहे अथवा शरीर को मनोइच्छा अनुरूप जैसा रूप चाहे, दे सके। ऐसे मानव की कल्पना को वैज्ञानिक जगत् ने बायोनिक मानव नाम दिया है।

इस बायोनिक मानव के निर्माण की दिशा में वैज्ञानिकों द्वारा मानव शरीर की विभिन्न पेशियों को कृत्रिम रूप में तैयार किए जाने का प्रयास किया जा रहा है। इस बायोनिक मानव के प्रत्येक अंग को सर्वप्रथम कृत्रिम रूप से अति विकसित करने के बाद, उसे शरीर की क्रियाओं में व्यवस्थित करते हुए मस्तिष्क से नियंत्रित करने का कार्य किया जा सकेगा। 

इस प्रक्रिया द्वारा तैयार बायोनिक मानव एक तरह से बच्चों के कॉमिक के सुपरमैन की कल्पना के प्रतिरूप होंगे। 

वर्तमान में वैज्ञानिक मानव क्लोन में शतप्रतिशत सफलता चाहते हैं। भेड़ के क्लोन ‘डॉली’ की बीमारी से मात्र साढ़े पांच वर्ष में असमय मृत्यु ने मानव द्वारा प्रयोगशाला में निर्मित क्लोन की उम्र और उसकी परिस्थिति जन्य क्षमताओं पर पुनः प्रश्न चिन्ह लगा दिया। 

भारत में भी ई.एन.आर.आई. पानीपत में भैंस का क्लोन तैयार किया जा चुका है। इसके अलावा भी अन्य जानवरों के क्लोन बनाए जा रहे हैं। यद्यपि मानव से मानव के इस प्रकार के निर्माण के भारत खिलाफ रहा है, किन्तु दक्षिण 

कोरिया व नीदरलैण्ड की तरह भारत ने भी चिकित्सीय क्लोनिंग का जारी रहना मानव के हित में माना है तथा चिकित्सीय प्रयोग हेतु अनुसंधान जारी रखने की मंशा जाहिर की है। 

इस अनुसंधान को जारी रखने के लिए वैज्ञानिकों का तर्क है कि चिकित्सीय क्लोनिंग द्वारा क्लोन भ्रूण से स्टेम कोशिकाएं प्राप्त कर उनके ऊतकों को संवर्धित कर उनसे तरह-तरह के अंगों का प्रत्यारोपण सम्भव हो सकेगा। स्टेम कोशिकाएं भ्रूण की आधार कोशिकाएं होती हैं, जिनसे आगे चलकर मानव शरीर के 210 से अधिक तरह के ऊतक बनते हैं। इन स्टेम कोशिकाओं की सहायता से ऊतकों का विकास कर बीमारियों का उपचार किया जाना सम्भव है। 

विशेषज्ञ वैज्ञानिकों का विचार है कि स्टेम सेल हमेशा वयस्क से लिए जाने पर जीवित मनुष्य भ्रूण से लिए जाने की अपेक्षा अधिक कारगर होते हैं। स्टेम कोशिकाओं की सहायता से किसी व्यक्ति के बीमार हुए अंग को बदलने के लिए स्पेयर पार्टस् मिलना सरल हो जाएगा अर्थात् अंगों की खेती की जा सकेगी।

भारत में स्टेम कोशिकाओं के अनुसंधान के लिए मुम्बई में रिलायंस समूह की रिलायंस लाइफ साइंसेज और बंगलूर के नेशनल सेंटर फॉर बॉयोलाजिकल साइंसेज में कार्य चल रहा है। 

आज जैव प्रौद्योगिकी का सबसे आधुनिक क्षेत्र क्लोनिंग सबसे ज्यादा विवादग्रस्त है, क्योंकि क्लोनिंग एक ओर मनुष्य के लिए लाभप्रद होने के साथ-साथ अत्यन्त भयावह भी प्रतीत हो रहा है। 

अपनी इच्छा के अनुसार मनुष्य तैयार करना और फिर उसके जीवन को अपने नियंत्रण में रखकर, उसका अपनी जरूरत के लिए इस्तेमाल करना तानाशाही नहीं तो और क्या है?

एक ओर मानव क्लोनिंग के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं, दूसरी ओर अन्य वैज्ञानिकों के एक वर्ग ने मानव क्लोनिंग की सुरक्षा व नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाया है।

 मानव प्रजनन प्रक्रिया को मशीनी निर्माण प्रक्रिया में बदल देना क्या वास्तव में नैसर्गिक प्रजनन के विरुद्ध दुष्चक्र नहीं है? सृष्टि की रचना का प्राचीनकाल से मूल आधार रही प्रजनन प्रक्रिया से मनुष्य में अपनत्व के भाव का विस्तार होता है, किन्तु मानव क्लोनिंग क्या इन भावनाओं को अतीत का इतिहास नहीं बना देगी? 

सन् 2005 ई. में क्लोनिंग विधि से जीन संशोधित घोड़े पेरिस टेकसास’ का जन्म हुआ। इसी वर्ष क्लोनिंग का अग्रदूत कहे जाने वाले दक्षिणी कोरियाई वैज्ञानिक ‘वर्ल्ड स्टेम सेल हब’ के चेयरमैन प्रोफेसर हवांग वू-सुक ने पहली बार मानव भ्रूण 

का क्लोन तैयार किया और उससे स्टेम सेल निकालने में कामयाबी हासिल की। तत्पश्चात् नैतिक व नीतिगत कारणों से भविष्य में कभी क्लोनिंग अनुसंधान कार्यों में भाग न लेने की घोषणा की और अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया। 

ब्राजील में सन् 2005 ई. में ही गाय का क्लोन तैयार किया गया और ब्रिटेन ने कुत्तों का क्लोन स्नूपी तैयार किया।

मानव क्लोन तैयार करने की वैज्ञानिकों की निरन्तर बढ़ती चेष्टाओं को उस समय करारा झटका लगा, जिस समय सन् 2005 ई. में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में मानवता के हित को दृष्टि में रखते हुए चिकित्सीय प्रयोग सहित किसी भी तरह की मानव क्लोनिंग को प्रतिबन्धित करने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया।

 मानव की अस्मिता तथा गरिमा को बनाए रखने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यह महत्त्वपूर्ण कदम उठाया, क्योंकि इसका गलत प्रयोग होने पर सम्पूर्ण मानवजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। 

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