पंचतंत्र का इतिहास | पंचतंत्र की रचना किसने की थी |पंचतंत्र कहानी की शुरुआत कैसे हुई | History of Panchatantra

पंचतंत्र की रचना किसने की थी

पंचतंत्र का इतिहास | पंचतंत्र की रचना किसने की थी |पंचतंत्र कहानी की शुरुआत कैसे हुई | History of Panchatantra

बहुत समय पहले दक्षिण भारत में मयलारोपयम नामक एक नगरी थी। वहां के महाराज बहुत ही बुद्धिमान और ज्ञानी थे। उनका नाम अमरशक्ति था। उनके राज्य में सब कुछ था परंतु फिर भी वे बहुत उदास रहते थे। 

कारण था कि उनके तीनों ही बेटे महामूर्ख थे। उन्हें ज्ञानी व बुद्धिमान बनाने के प्रत्येक प्रयास को व्यर्थ जानकर महाराज बहुत परेशान हो गए। अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि वे इस समस्या का हल निकालने के लिए अपने मंत्रियों से सलाह करेंगे। उनका एक मंत्री सुमति बहुत ही ज्ञानी था। उसने कहा, “मैं विष्णु शर्मा नामक विद्वान को जानता हूं। वे हमारे राजकुमारों को पढ़ाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त रहेंगे।”

महाराज को सुमति का यह प्रस्ताव अच्छा लगा और उन्होंने विष्णु शर्मा को महल में बुलवाया। महाराज ने कहा, “आदरणीय, क्या आप मेरे पुत्रों को शिक्षा देंगे ताकि वे नैतिक मूल्यों को सीख सकें। जब मैं इस संसार में न रहूं तो वे अपनी बुद्धि के बल पर अपनी तथा राज्य की देखरेख कर सकें।” । 

अस्सी वर्ष के वृद्ध विद्वान ने एक क्षण के लिए कुछ सोचा और हामी भर दी। उन्होंने महाराज को वचन दिया कि वे छह माह के भीतर उनके राजकुमारों को उचित आचरण करना सिखा देंगे। वे नीतिशास्त्र में भी निपुण हो जाएंगे। उन्होंने महाराज को यह विश्वास भी दिलाया कि उसके बाद कोई भी राजकुमारों को मूर्ख नहीं कह सकेगा। 

महाराज ने आभार जताया और अपने बेटों को विष्णु शर्मा के आश्रम में भेज दिया। 

पंचतंत्र की रचना किसने की थी

विष्णु शर्मा उन्हें पांच तंत्रों से कथाएं सुनाते, जिन्हें बाद में पंचतंत्र के नाम से जाना गया। इन पांच तंत्रों में निम्नलिखित विषय शमिल थे। 

1.मित्रों के बीच मनमुटाव

2. मित्रों का दिल जीतना

3. कौए और उल्लू

4. लाभ न होना

5. बिना सोच-विचार के कार्य करना 

ये सभी पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण थे क्योंकि इनके माध्यम से ही राजकुमारों ने बुद्धिमान और नीतिकुशल बनने का प्रशिक्षण पाया था। छह माह में ही तीनों मूर्ख पुत्र ज्ञानी राजकुमार बन गए और एक विचारवान् के रूप में अपने पिता के पास वापस आए। 

महाराज ने विष्णु शर्मा को बहुत प्रकार से सम्मानित कर विदा किया और उनका आभार माना। राजकुमारों ने जिन कथा-कहानियों द्वारा शिक्षा प्राप्त की थी, उन्हें ही आपके लिए इस पुस्तक में दिया जा रहा है। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

14 + 10 =