जहाँ चाह वहाँ राह पर निबंध

जहाँ चाह वहाँ राह पर निबंध

जहाँ चाह वहाँ राह पर निबंध |where there’s a will there’s a way essay in hindi

कोई अपने दुर्भाग्य को कोस रहा है, कोई अपनी पारिवारिक दीनता को दोषी बता रहा है, कोई सहारे के अभाव को अपनी असफलता का आधार मान रहा है-बहुतेरे असफल व्यक्ति इसी तरह अनेकानेक कारणों को अपनी असफलता का आधार मान रहा है-बहुतेरे असफल व्यक्ति इसी तरह अनेकानेक कारणों की कल्पना कर हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहते हैं। वे अपने जीवन में कुछ कर नहीं पाते। वे समाज के लिए संसार के लिए कुछ अवदान दे नहीं पाते। 

ऐसे मनुष्यों को जीवन में कोई राह नहीं मिलती, कोई चारा नहीं दीखता। वे दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि कोई उन्हें किसी प्राप्ति का मार्ग दिखाए, सफलता की सीढ़ी बताए, जिससे वे उसपर आसानी से चढ़ सकें। किंतु, ऐसे लोगों को यह भलीभाँति जानना चाहिए कि जहाँ चाह है, वहीं राह है। हमारी इच्छाशक्ति स्वयं हमारे लिए मार्ग बना देती है। अच्छे कार्य में धन की जितनी आवश्यकता नहीं होती, उतनी इच्छाशक्ति की होती है। एमर्सन ने ठीक ही कहा है कि इतिहास, पुराण सभी साक्षी हैं कि मनष्य के दढ़ संकल्प के आगे देव-दानव सभी पराजित होते रहे हैं। दढ इच्छाशक्ति ने भगवान तक को घंटों कच्चे धागे में बाँधकर नचाया है। 

हाँ, इतना ध्यान रखना होगा कि हमारी चाह बरसाती बादल का एक टुकड़ा न हो, जिसे हवा का एक झोंका जिधर चाहे उड़ाकर ले जाए। अतः, यदि हमारी इच्छा शक्ति क्षुद्र और दुर्बल होगी, तो हमारी मानसिक शक्तियों का कार्य भी वैसा ही होगा। स्वामी विवेकानंद का दिव्य वचन है कि पवित्र और दृढ़ इच्छा सर्वशक्तिमान हैं| 

अतः, यह नीति ठीक ही है कि हमारी चाह ही रास्ता बना जाती है। अंधकार से आच्छन्न मानव ने कभी इच्छा व्यक्त की थी कि प्रकाश हो और प्रकाश हो गया था (Let there be light and there was light.)। मनुष्य की इस चाह, इस लगन, इस उत्कट इच्छा-चमत्कार की अनगिनत कहानियाँ हैं। जब आततायी रावण श्रीरामवल्लभा सीता को हरकर लंका ले गया, तब राम को पता चला कि मार्ग में समुद्र व्यवधान बनकर खड़ा है। राम के अंतर्मन में सीता-प्राप्ति की चाह ने सागर पर सेतु-निर्माण किया था। चाणक्य के पास आखिर था क्या? किंतु, नंद-साम्राज्य के विनाश के उत्कट संकल्प ने उनके लिए मार्गनिर्माण कर दिया था। हमारे विप्लवी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पास क्या साधन था? किंतु, अँगरेजों को भगा देने की दृढ़ चाह ने उनसे इतनी बड़ी ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना करा दी थी। पं० मदनमोहन मालवीय के पास कौन-सा कुबेरकोष था? किंतु, हिंदू-विश्वविद्यालय की स्थापना की लगन ने सारे विघ्नों को काटकर मार्ग बना दिया। इसलिए कहा गया है- 

है जय पाना, जो यह ध्याता,

मैं कर लूँगा या तन दूंगा,

सच्चा खजाना विश्वास लाना,

इच्छा बली तो संसार जीतो।            -सत्यदेव परिव्राजक

यह हो सकता है कि कठिनाइयों के दुर्ग हमारे मार्ग में अवरोध बनें, हमारे सहयोगी हमारा साथ छोड़ दें, किंतु फिर भी हतोत्साह होने की आवश्यकता नहीं 

अकेला चला था, अकेला चलूंगा,

सफर के सहारो, न दो साथ मेरा।

सहज मिल सके वह नहीं लक्ष्य मेरा,

बहुत दूर मेरी निशा का सबेरा।

अगर थक गए हो, तो तुम लौट जाओ,

गगन के सितारो, न दो साथ मेरा।   -विश्वनाथ मिश्र 

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