धनवान बनने के लिए क्या करें-जोखिम लेना जरूरी 

धनवान बनने के लिए क्या करें-

धनवान बनने के लिए क्या करें-जोखिम लेना जरूरी 

“दूसरे आविष्कारकों के साथ समस्या यह है कि वे कई प्रयोगों में असफल होने के बाद हार मान लेते हैं। मैं तब तक जुटा रहता हूं जब तक कि मैं वह न पा लूं जो मैं चाहता हूं।” -थॉमस एडिसन

यदि आप किसी भी अमीर व्यक्ति से यह पूछे कि आज आप जिस मुकाम पर हैं, इसके लिए आपने क्या किया? अधिकतर लोग कहेंगे कि मैंने मेहनत की और सफलता हासिल की। लेकिन बिजनेसमैन किरण बेलून का जबाव इन सबसे कुछ अलग है। उनका कहना है कि आज मैंने जो कुछ भी पाया है, वह मेरे जोखिम लेने का प्रमाण है। मैं रिस्क नहीं लेती तो इस मुकाम पर नहीं पहुंच सकती थी। 

किसी भी सफलता के लिए जोखिम लेना जरूरी है। जब असफलता हाथ लगती है, तब हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। सफलता पाने के लिए एक और रिस्क लेने के लिए अपने आपको तैयार होना होगा।

जोखिम का लाइफ के साथ चोली-दामन का साथ है। बिना जोखिम लिए आप कुछ भी नहीं कर सकते। ड्राइविंग सीखना है तो आपको वाहन भीड़-भाड़ वाली सड़क पर उतारना होगा। दुर्घटना का जोखिम लेना पड़ेगा। स्वीमिंग सीखना है तो गहरे पानी में जाने का जोखिम लेना होगा। जोखिम लेने की क्षमता उत्पन्न करके ही आप उन्नति के रास्ते पर चल सकते हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू का कहना था कि सफलता अक्सर उन लोगों के पास आती है जो जोखिम लेते हैं और काम करते हैं। 

विनोद एक सॉफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर है। वह अच्छे पद पर कार्यरत था। उसे काफी अच्छा वेतन मिल रहा था। कंपनी की तरफ से उसे काफी सुविधाएं भी मिली हुई थीं। इसके बावजूद विनोद अपने पद, कार्य और पैसों से वह खुश नहीं था। वह इससे भी अधिक कमाना चाहता था। वह भी औरों की तरह अमीर बनना चाहता था। इसके लिए वह अपना काम करना चाह रहा था, लेकिन इसके लिए वह किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता था। 

विनोद नौकरी छोड़कर बिजनेस शुरू करने का जोखिम नहीं ले पा रहा था। उसे डर था कि यदि बिजनेस में सफल नहीं हुआ तो वह न इधर का रहेगा न ही उधर का। उसी कंपनी में विनोद के साथ राहुल भी कार्य करता था। राहुल विनोद से जूनियर था। 

राहुल भी अपने वेतन से खुश नहीं था। उसे लगता था कि वह इससे अधिक तो अपना व्यवसाय शुरू करके कमा सकता है। उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह नौकरी छोड़कर अपना बिजनेस शुरू करेगा। उसे अपने आप पर विश्वास हो गया कि वह बिजनेस से काफी रुपये कमा सकता है। राहुल अमीर बनने के लिए हर तरह के जोखिम उठाने के लिए तैयार था। उसने अपनी नौकरी छोड़कर स्वयं का बिजनेस करने का निश्चय कर लिया। 

जब विनोद ने राहुल द्वारा नौकरी छोड़ने की बात सुनी तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने राहुल से कहा, “काफी अच्छा कमा रहे हो, फिर नौकरी क्यों छोड़ते हो?” 

राहुल ने कहा, “मैं अमीर बनना चाहता हूं। इसके लिए नौकरी छोड़कर मैं अपना खुद का व्यवसाय शुरू करना चाहता हूं।” 

राहुल की बातों को सुनकर विनोद को यकीन नहीं हो रहा था कि राहुल अच्छी नौकरी छोड़ कर खुद का व्यवसाय शुरू कर रहा है। उसने राहुल से कहा कि नौकरी छोड़कर तुम बहुत बड़ी गलती कर रहे हो। यदि तुम अपने व्यवसाय में सफल नहीं हुए तो न इधर के रहोगे, न उधर के। 

इस पर राहुल ने कहा, “अमीर बनना है तो जोखिम तो लेना ही पड़ेगा। बिना जोखिम लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है।” 

राहुल ने नौकरी छोड़ कर अपना बिजनेस शुरू कर दिया। उसका छोटा-सा बिजनेस कुछ ही दिनों में जम गया। आज की तारीख में उस कंपनी में पंद्रह कर्मचारी काम कर रहे हैं। 

जो जोखिम राहुल ने लिया वह जोखिम विनोद नहीं ले पाया। जिसकी वजह से वह आज भी उसी कंपनी में कार्य कर रहा है। यदि उसमें भी राहुल की तरह जोखिम लेने की क्षमता होती तो वह सफलता पा सकता था। डेविड मार्क का कहना है, “जोखिम वहीं ले सकते हैं, जो अपने ऊपर यकीन करते हैं।” 

बिजनेस एक्सपर्ट ब्लू बेल कहती हैं, “जोखिम का रोमांच ही कुछ और होता है। इसे मैं बार-बार पाना चाहूंगी।” 

आप भी अमीर बनना चाहते हैं तो हर तरह के जोखिम उठाने के लिए तैयार होना होगा। तभी आप अमीर बन सकते हैं। 

अति नहीं, संतुलन 

“आपके पास विश्वास के साथ इंतजार करने का साहस है तो सफलता जरूर मिलेगी।” -एम. एल. क्लीमैंस

मैंने उस व्यक्ति से अधिक कमा कर न दिखा दिया तो मेरा नाम बदल देना।’ यदि आप इस तरह के अति आत्मविश्वास से पीड़ित हैं तो आपको संभलने की जरूरत है। क्योंकि यह आपको बर्बादी की ओर ले जाने वाला किसी भी सफलता को पाने के लिए आत्मविश्वास जरूरी है पर अति आत्मविश्वास नुकसानदायक होता है। अति आत्मविश्वास विनाश और शोषण करवाता है। अति आत्मविश्वास अहंकार का रूप है। कहा जाता है कि हिटलर, नेपोलियन, सुभाष चंद्र, सिकंदर में आत्मविश्वास तो था पर उनका आत्मविश्वास अहंकार पर आधारित था। 

सकारात्मक और ज्ञान पर आधारित आत्मविश्वास अच्छा होता है, लेकिन जब वह अहंकार में बदल जाए तो विनाश व शोषण करता है। हर बात की अपनी जगह एक अहमियत होती है। उसकी अति बुरी होती है। अधिक बुद्धिमानी दिखाना, अधिक खेलना, अधिक मौज-मस्ती करना, अधिक पढ़ना, अधिक सोना, अधिक जागना, अधिक रोना, अधिक हंसना, अधिक खाना, अधिक सेक्स करना, अधिक फिगर कांशियस होना, अधिक ब्यूटी कांशियस या अधिक मेकअप जैसी बातें अच्छे की बजाय नुकसान पहुंचाते हैं। अधिक मीठा, कड़वा, खट्टा, नमकीन, तेल, मसाला आदि का इस्तेमाल भी शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं। 

यदि आप किसी बात पर आवश्यकता से अधिक ध्यान देते हैं तो उससे बचें। किसी भी बात पर संतुलित रहना चाहिए। जहां आप चुप रह कर अपना काम निकाल सकते हैं, वहां बकबक करने से आपको नुकसान हो सकता है। 

इसका मतलब यह नहीं कि आप हर जगह चुप रहें। जहां बोलने की जरूरत हो बोलें। बोलने की जगह पर चुप रहने पर आपको नुकसान हो सकता है। जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं तो किसी बात की अति से बचना होगा। अति आत्मविश्वास जीवन के संतुलन को बिगाड़ देता है। अति आत्मविश्वास अहंकार का प्रतीक है यह विनाश की ओर ले जाता है। 

रमेश एक अच्छा तैराक था। उसने राष्ट्रीय स्तर पर अनेक खिताब जीते थे। उसमें एक बुरी आदत थी। वह थी अति आत्मविश्वास। इसकी वजह से उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। बरसात के दिनों में गंगा नदी अपने उफान पर थी। उस वक्त उसने अपने दोस्तों से शर्त लगाई कि वह गंगा नदी को पार कर सकता है। कुछ दोस्तों ने उसे ऐसा करने से रोका, पर वह माना नहीं और गंगा नदी को पार करने के लिए तेज बहाव में कूद गया। आधा रास्ता पार करते-करते वह काफी थक गया।

अब स्थिति यह हो गई कि वह न तो इस पार आ सकता था, न उस पार जा सकता था। थकान की वजह से उससे तैरना मुश्किल हो गया। वह पानी में डूबने लगा और एक समय ऐसा आया कि उसके हाथ-पांव ने भी उसका साथ छोड़ दिया। रमेश को तैराकी में कई गोल्ड मिल चुके थे। इस कारण उसमें अति आत्मविश्वास समाया हुआ था। गंगा नदी के तेज बहाव के आगे उसका सारा अहंकार टूट कर रह गया। अति आत्मविश्वास की वजह से वह गंगा नदी में डूब गया। 

मनोवैज्ञानिक किसी भी बात की अति को एडिक्ट मानते हैं यानी यह एक तरह का नशा होता है। किसी भी तरह की एडिक्ट का होना शारीरिक व मानसिक नुकसान पहुंचाता है। यह जीवन को नष्ट कर देता है। एडिक्ट किसी भी रूप में आपके जीवन में हो तो उससे छुटकारा पाने की कोशिश करें। कोशिश ही नहीं उसे जीवन से निकाल कर बाहर फेंक दें। 

अति आत्मविश्वासी होकर किसी भी काम को करने का जोखिम भरा कदम न उठाएं। अमीर बनना चाहते हैं तो अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा करें, लेकिन अति आत्मविश्वासी न बनें। अमीर बनने के पथ पर संतुलित कदमों से चलें। आपका हर कदम कामयाबी भरा होगा। 

असंभव कुछ नहीं 

“जब तक हम किसी काम को असंभव मानते हैं तब तक उसे करना संभव नहीं होता। वह तभी संभव होता है जब हम उसे संभव मान लें।” -सर रॉजर बेनिस्टर*

किसी भी कार्य को करने के लिए, किसी भी चीज को पाने के लिए यदि आपके अंदर उसे हासिल करने का हौसला है तो कुछ भी असंभव नहीं है। डेनियल वेब्स्टर कहते हैं कि ‘इंपॉसिबल’ का प्रधान कारण प्रायः धनाभाव नहीं, अपितु शक्ति और सामर्थ्य का अभाव है। जीवन में कामयाब होना चाहते हैं, अमीर बनना चाहते हैं तो अपनी डिक्शनरी से ‘इंपॉसिबल’ शब्द को हटा दें। नेपोलियन बोनापार्ट की तरह मान कर चलें कि आपके शब्दकोश में भी ‘इंपॉसिबल’ शब्द है ही नहीं। यदि यह शब्द आपके जीवन में नहीं है तो आप कामयाबी के शिखर पर होंगे। 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर के रहने वाले राकेश मिश्रा कुछ न होते हुए भी उन्होंने राधू टायर कंपनी खड़ी करके सभी को जतला दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। राकेश के पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। छोटी-सी उम्र में जीवनयापन के लिए मां के साथ हाथ बंटाना पड़ा। 

वह सीमेंट की दुकान पर सीमेंट की बोरियां ढोने का काम करने लगे। शाम को ट्यूशन पढ़ाते और अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करते। कुछ सालों बाद दिल्ली आ गए। यहां एक जिंक ऑक्साइड कंपनी में सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई। मेहनत से यहीं प्रॉडक्शन मैनेजर बन गए। मालिक का विश्वास जीत कर प्रॉडक्शन के साथ मार्केटिंग का काम भी देखने लगे। कुछ सालों बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पैराडाइड नाम से केमिकल्स कंपनी शुरू कर दी। उनकी कंपनी चल निकली। 

इस बीच जानी-मानी कंपनी राधू प्रा. लि. के मालिक राधू के सम्पर्क में आए। बुजुर्ग राधू ने शारीरिक अक्षमताओं की वजह से अपनी फैक्ट्री बेचने का मन बना लिया था। उन्होंने इस बात की चर्चा राकेश से की। 

राकेश ने यह मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने राधू फैक्ट्री के साथ-साथ ब्रांड नाम भी खरीद लिया। राधू टायर फैक्ट्री एक जाना माना नाम है, जो साइकिल, रिक्शा, ट्रक, बस, टैम्पो आदि किसी भी वाहन के टायर बनाती है। राकेश कहते हैं कि असंभव कुछ भी नहीं, बस काम करने वाला होना चाहिए, अवसरों की कोई कमी नहीं है।

‘पता नहीं मैं कामयाब रहूंगा या नहीं’ जैसी सोच वाले व्यक्ति में असंभव शब्द बुरी तरह से हावी होता है, जो उसे किसी भी काम को करने से रोकता है। उसकी सफलता में बाधा डालता है। उसे सफलता से पीछे ले जाता है और आगे बढ़ने से रोकता है। “हम होंगे कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन……” यह पंक्तियां शत-प्रतिशत कामयाबी दिलाती हैं, क्योंकि इनमें असंभव शब्द का कोई संबंध नहीं है। 

यदि आप असंभव जैसे शब्द को अपने जीवन में शामिल करते हैं तो यह आपको दब्बू और डरपोक बनाएगा। यह आपको आगे बढ़ने से रोकेगा 

और आपको भीड़ का हिस्सा बनाकर रखेगा। इससे बचना है तो इस शब्द को भूलना होगा। खुद में ‘आई कैन विन’ की टेंडेंसी विकसित करनी होगी। ‘ट्राई एण्ड ट्राई’ यानी कोशिश और कोशिश की नीति पर चलना होगा। 

जानी-मानी बिजनेस पत्रिका फॉरच्यून के टेक्नोलॉजी फील्ड के स्मार्ट पीपुल में सबसे पहले नंबर पर शामिल ऐपल के सीईओ स्टीव जॉब्स की सफलता की कहानी रोमांचित ही नहीं प्रेरित भी करती है। 

स्टीव का बचपन काफी परेशानी में गुजरा। कुंवारी मां की संतान होने की वजह से मां ने उन्हें खुद नहीं पाला। एक परिवार को गोद दे दिया। मुश्किल भरे दिनों में उनके पास रहने के लिए कमरा भी नहीं था। जमीन पर सोते थे। कोक की बोतलों को जमा कर बेचा करते थे ताकि खाने का इंतजाम हो सके। पैसों की कमी होने से स्टीव कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। वे इससे घबराए नहीं। उल्टा उन्हें ऐसा लगा कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें कोई फायदा नहीं होगा। 

स्टीव ने 20 साल की उम्र में एक गैरेज में ‘ऐपल’ कंपनी की नींव डाली। मात्र 10 सालों में कंपनी 2 लोगों से बढ़ कर 4000 कर्मचारियों की संख्या वाली कंपनी हो गई। इसकी कमाई दो बिलियन डॉलर तक पहुंच गई, लेकिन स्टीव को उन्हीं की कंपनी से निकाल दिया गया। 

हर बात में पॉजिटिव ढूंढने वाले स्टीव को पांच साल तक संघर्ष करना पड़ा। वे इससे पीछे नहीं हटे। उन्होंने दिखा दिया कि दोबारा खड़ा होना कोई असंभव नहीं है। पांच साल बाद एक नई कंपनी ‘नेक्स्ट’ शुरू की और देखते ही देखते उसे भी ‘ऐपल’ की तरह एक बड़ी कंपनी के रूप में खड़ा कर दिया। इसी के साथ उन्होंने एक और बड़ी कंपनी ‘पिक्सार’ तैयार की। 

आज उनकी दोनों कंपनियां अच्छा बिजनेस कर रही हैं। स्टीव की लाइफ से शिक्षा ले सकते हैं कि यदि दिल में चाह हो तो असंभव कुछ भी नहीं है। 

जितने भी अनुसंधान हुए हैं, वह असंभव को दूर रख कर ही हुए हैं। वैज्ञानिक असंभव शब्द से नाता तोड़ कर ही आसमान की ऊंचाई और समुद्र की गहराई को नाप सके हैं। सफल व्यक्तियों के जीवन में असंभव जैसे मामूली से शब्द का कोई अस्तित्व नहीं होता है। वे असंभव जैसे शब्द को जानते या पहचानते तक नहीं हैं। वे अपने जीवन में ऐसे शब्द को महत्त्व नहीं देते हैं। जिस काम को करते हैं सिर्फ पॉसिबल यानी संभव समझ कर ही करते हैं। उसे संभव करके ही दिखाते हैं। 

इंपॉसिबल शब्द पर ध्यान दें तो आपको पता चलेगा कि इंपॉसिबल अपने आप में ही पॉसिबल है। इंपॉसिबल को अलग करेंगे तो आपको मिलेगा आई एम और पॉसिबल। इसका अर्थ होता हैं मैं सफल हूं। जब इंपॉसिबल अपने आप में पॉसिबल है तो फिर यह असफल कैसे हो सकता है? आप भी इस शब्द को बदल कर रख दें। इंपॉसिबल को आई एम पॉसिबल में बदल दें। यदि आप ऐसा कर सकते हैं तो आपको अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता।

मैरी एंजल ब्राइट का कहना है कि अगर आपको कुछ पसंद नहीं है तो उसे बदल डालिए, अगर आप उसे बदल नहीं सकते तो उसके बारे में सोचने का तरीका बदल दीजिए। सफलता अपने आप आपके पास आ जाएगी। 

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