प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है ? Pregnancy Me Kaun Kaun Se Test Hote Hai

प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है

प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है

एक जमाना था जब गर्भवती स्त्री यों ही घूमती-फिरती थी, घर का सारा काम करती थी और जब प्रसव का समय आता था, तो घर की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियां दाई को बुलाकर घर में ही उसका प्रसव करा देती थीं। उस समय न तो कोई जांच कराई जाती थी और न ही कोई परेशानी सामने आती थी। लेकिन आज जमाना बदल चुका है, नए-नए रोग सामने आने लगे हैं, इसलिए नई-नई जांच होने लगी है। हर तकलीफ का कारण पहले से ही जान लेना आवश्यक हो गया है, ताकि गभधारण से लेकर प्रसवकाल तक स्त्री को किसी समस्या का सामना न करना पड़। यहां कुछ प्रमुख परीक्षणों और उनके निदानों के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिसकी जानकारी गर्भवती स्त्री को अवश्य होनी चाहिए। 

प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है

वी.डी.आर.एल. 

यह जांच यौन संचरित रोगों या रतिज रोगों को जानने के लिए की जाती है। मान लीजिए, किसी स्त्री में सिफलिस रोग पाया जाता है, तो वह एक विकत या विरूपित शिशु को जन्म दे सकती है। ऐसे में पति-पत्नी दोनों को वी.डी.आर.एल जांच करानी चाहिए। यदि किसी एक में या दोनों में यह रोग हो, तो उन्हें अपनी सुरक्षा के निमित्त एंटीबॉयोटिक के टीकों का कोर्स कर लेना चाहिए। 

सिफलिस के कारण कई जन्मजात विकृतियां पैदा हो सकती हैं, इसलिए सर्वप्रथम इसकी जांच आवश्यक है। यदि संक्रमित गर्भवती स्त्री को चौथे मास से पूर्व ही एंटीबॉयोटिक चिकित्सा दी जाए, तो भ्रूण को हानि से बचाया जा सकता है, क्योंकि उसी समय भ्रूण तक संक्रमण पहुंचता है। समय रहते उपचार करने से मां द्वारा शिशु को होने वाले इस संक्रमण से बचाया जा सकता है।

ए.एफ.पी. 

शिशु में हुए किसी भी मुख्य दोष को प्रकट करने वाली यह एक विशिष्ट रक्त जांच है, जिसे अल्फा फीटो प्रोटीन (ए.एफ.पी.) परीक्षण कहते हैं। इसमें स्त्री के रक्त की जांच की जाती है, जो एक प्रोटीन है। यह शिशु के यकृत में उत्पन्न होता है और प्लेसेंटा (ओवल) के द्वारा स्त्री के रक्त परिभ्रमण में आ जाता है। 

गर्भावस्था के 16 से 18 सप्ताह के बीच इसकी जांच एकदम सही होती है। यदि पहली बार में पता चले कि शिशु सही नहीं है, तो यह जांच पुनः कराएं। यदि दूसरी जांच में भी पहले के समान परिणाम आए, तो भ्रूण का अल्ट्रासाउंड स्केन तथा एम्निओसिंटेसिस द्वारा जांच कराना आवश्यक हो जाता है। एम्निओसिंटेसिस 

एम्निओसिटेंसिस जांच

अल्ट्रासाउंड के साथ की जाती है। इस जांच के लिए गर्भवती स्त्री के उदर से सुई द्वारा एम्निओटिक तरल निकाला जाता है। यह जांच खतरनाक होती है और इससे गर्भपात तक हो सकता है। 14 सप्ताह की गर्भावस्था से पहले यह जांच नहीं की जा सकती। कोई भी अच्छी डॉक्टर अत्यंत विवशता की दशा में इस जांच के लिए कह सकती है तथा इससे होने वाले खतरे के बारे में पहले से पति-पत्नी को बता देती है, ताकि हानि होने की स्थिति में उस पर कोई आरोप न लगे। यों इस जांच से केंद्रीय तंत्र की असमानताओं, मानसिक विक्षिप्तता एवं आनुवंशिक दोष से संबंधित जानकारी प्राप्त की जाती है। 

ए.एफ.पी. और एम्निओसिंटेसिस जांच से मुख्यतः शिशु के मस्तिष्क तथा मेरुदंड में गंभीर असमानता का पता चल जाता है। यदि स्त्री गर्भावस्था के पहल तीन मासों में जरमन मीजल्स या रूबेला से संक्रमित हो जाती है, तो उसका शिशु शारीरिक या मानसिक रूप से विक्षिप्त हो सकता है। ऐसी स्थिति में सबसे अच्छा 

निदान गर्भपात ही है, क्योंकि असामान्य बच्चे को पैदा करके निश्चय ही उसके साथ अन्याय किया जाता है। यहां हम यह बता दें कि ऐसे गर्भपात को सामान्य गर्भनिरोधक विधि की तरह नहीं लेना चाहिए। 

विशेष-रूबेला के बारे में गर्भवती स्त्री को अधिक चिंतित नहीं होना चाहिए। इससे गर्भ के बच्चे को कोई खतरा नहीं होता। यद्यपि गर्भावस्था में इसका टीका नहीं लगाया जा सकता, लेकिन प्रसव के बाद इसका टीका लगा दिया जाता है, चाहे वह शिशु को अपना दूध ही क्यों न पिलाती हो।

एंडोमैट्रिओसिस 

एंडोमैट्रिओसिस होने से गर्भधारण में परेशानी और दर्द संभव है। गर्भधारण का अर्थ है कि स्त्री ने इस पर पहली विजय प्राप्त कर ली है और दूसरी विजय गर्भवती होने के बाद करनी है। गर्भावस्था में एंडोमैट्रिओसिस के लक्षणों एवं दर्द आदि में सुधार होता है। दरअसल ऐसा हारमोनल बदलावों के कारण होता है। ओव्यूलेशन के बाद एंडोमैट्री छोटा व नरम पड़ जाता है। इससे कुछ स्त्रियों में अच्छे परिणाम सामने आते हैं, तो कुछ स्त्रियों की पूरी गर्भावस्था में इसके लक्षण ही नहीं प्रकट होते। कुछ ऐसी स्त्रियां भी होती हैं, जिन्हें दर्द व झटकों से परेशानी होती है। इसके बावजूद शिशु के जन्म में कोई परेशानी नहीं होती। गर्भावस्था में एंडोमैट्रिओसिस के लक्षणों से मुक्ति मिलती है, परंतु उसका उपचार नहीं होता। किंतु कई बार देखने में आता है कि गर्भावस्था व उसकी देखभाल के बाद पहले के लक्षण पुनः उभर आते हैं। उस समय डॉक्टर से परामर्श अवश्य करना चाहिए।

अल्ट्रासाउंड 

प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है

अल्ट्रासाउंड जांच में गर्भाशय के अंदर भ्रूण को देखा जाता है। जब स्त्री का यूरिनरी ब्लेडर भरा होता है, तब अल्ट्रासाउंड किया जाता है। इस जांच से जुड़वां गर्भावस्था, छोटे परिमाण के शिशु, गर्भावस्था में भ्रूण तथा प्लेसेंटा की सही स्थिति एवं प्रसव के अनुमानित समय का पता आसानी से चल जाता है। गर्भावस्था में केवल डॉक्टर के परामर्श से ही यह जांच करानी चाहिए।

कोलोपोस्कोपी

यदि पैप स्मीयर में कुछ अनियमित सर्वाइकल कोशिकाएं दिखाई पड़ें, तो कोलोपोस्कोपी की जाती है। साधारण प्रक्रिया में योनि व सर्विक्स को माइक्रोस्कोप की सहायता से देखा जाता है। यदि पैप स्मीयर में असामान्य कोशिका दिखाई दे. तो डॉक्टर सर्वाइकल या बायोप्सी करती है। इसमें संदिग्ध स्थान से नमूना लेकर लैब में उसकी जांच की जाती है। इसके लिए क्रायोसर्जरी या लीप चिकित्सा की जाती है, जिसमें प्रभावित सर्वाइकल ऊतकों को निकाल दिया जाता है। 

ऐसा करने से गर्भवती स्त्री स्वस्थ शिशु को जन्म देती है। यद्यपि निकाले गए ऊतकों की मात्रा के हिसाब से कुछ स्त्रियों को गर्भावस्था में परेशानी आ सकती है। अपनी डॉक्टर को इस बात से अवगत अवश्य कराएं, ताकि गर्भावस्था में वह अच्छी तरह देखभाल और जांच कर सके। यदि प्रसव से पहले जांच में असामान्य कोशिकाओं का पता चले तो डॉक्टर कोलोपोस्कोपी का परामर्श दे सकती है। लेकिन बायोप्सी शिशु के जन्म के बाद ही की जाती है।

जेनिटल एच.पी.वी. 

जेनिटल एच.पी.वी. एक सेक्सुअली ट्रांसमीटिड वायरस है। मुख्यतः इसके लक्षण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते। कभी-कभी तो यह डेढ़ से ढाई मास में अपने आप ठीक हो जाता है। किंतु जब इसके लक्षण सामने आते हैं, तो पैप स्मीयर से कुछ कोशिकाओं की अनियमितता का पता चल जाता है।

कई बार पीले या गुलाबी रंग के हल्के मस्से से उभर आते हैं जो योनि, गुदा और वल्वा पर दिखाई देते हैं। इनमें अधिक पीड़ा नहीं होती, लेकिन जलन बहुत होती है और इनसे रक्त भी निकल आता है। कई बार दो-एक मास में ये खुद ही ठीक हो जाते हैं। गर्भवती स्त्री में ये मस्से अधिक सक्रिय होते हैं। यदि मस्से अपने आप ठीक न हो रहे हों, तो डॉक्टर से परामर्श करने में देर नहीं करनी चाहिए। 

इन मस्सों को फ्रीजिंग, इलैक्ट्रिक या लेजर थेरैपी से हटा दिया जाता है । कई स्थितियों में यह कार्य प्रसव तक टाल दिया जाता है। डॉक्टर को एच.पी.वा.स ग्रस्त स्त्री की सर्वाइकल जांच भी करनी चाहिए। यदि बायोप्सी की जाना हा, ” उसे भी प्रसव तक टाल दिया जाता है। चूंकि यह संक्रामक रोग है, अतः इस दारा सुरक्षित सेक्स करना चाहिए। वैसे कम आयु की स्त्री के लिए इसका वक्ता उपलब्ध है, लेकिन गर्भावस्था में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

गोनोरिया 

यह रोग भ्रूण की कंजक्टिवाइटिस अंधता एवं गंभीर संक्रमण का कारण माना जाता है। यह संक्रमित गर्भनाल के कारण हो सकता है। इसीलिए गर्भवती स्त्री की जांच की जाती है। यदि किसी स्त्री को गोनोरिया रोग से काफी खतरा हो, तो गर्भावस्था में अथवा बाद में इसकी जांच की जा सकती है। 

गर्भवती स्त्री में गोनोरिया का संक्रमण पाए जाने पर एंटीबॉयोटिक्स की जाता है, ताकि स्त्री पूर्णतया सुरक्षित हो जाए। अतिरिक्त सावधानी के तौर पर प्रत्येक नवजात शिशु की आंखों में एक एंटीबॉयोटिक द्रव डाला जाता है।

 हर्पीज

गर्भावस्था में हीज हो जाने पर स्त्री को बहुत सावधानी रखनी पड़ती है, तो गर्भावस्था एवं प्रसव के समय कोई परेशानी नहीं होती तथा प्रसूत शिशु भी स्वस्थ रहता है। यहां यह नहीं समझ लेना चाहिए कि मां के संक्रमण के कारण शिशु भी इसका शिकार हो जाएगा। यद्यपि पहली तिमाही में होने वाले संक्रमण से मिसकैरिज और प्रीमेच्योर डिलीवरी का खतरा अवश्य बढ़ जाता है। 

किंतु अच्छी जांच और उत्तम चिकित्सा से यह संक्रमण संभाल लिया जाता है। हीज ग्रस्त स्त्री के बचाव के लिए उसे एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं। यदि शिशु भी इसकी चपेट में आ जाए, तो उसे भी एंटीवायरल दवा दें। यदि प्रसव के बाद संक्रमण बना रहे, तो स्त्री डॉक्टर की अनुमति से शिशु को स्तनपान कराए।

क्लामाइडिया

कम आयु की स्त्रियों में सिफलिस एवं गोनोरिया से अधिक क्लामाइडिया के मामले पाए जाते हैं। यह एक प्रकार का इंफेक्शन है। यदि यह संक्रमण भ्रूण तक पहुंच जाए तो मां-बच्चे दोनों के लिए खतरा बन सकता है। यदि स्त्री पहले कई पुरुषों से संबंध बना चुकी हो, तो उसे स्क्रीनिंग करानी चाहिए। इस संक्रमण का पता स्त्री को नहीं चलता, केवल डॉक्टर ही इसकी पहचान कर सकता है। 

जांच के बाद पहचान होने पर इसका उपचार संभव है। यदि गर्भावस्था से पहले या इसके दौरान रोग का सही ढंग से उपचार हो जाए, तो काफी हद तक इसके संक्रमण से बचा जा सकता है। अच्छा तो यह है कि उपचार गर्भधारण से पहले ही हो जाए, ताकि शिशु तक इसका संक्रमण न पहुंचे। प्रसव के बाद शिशु को एंटीबॉयोटिक दिए जाते हैं, ताकि वह संक्रमण से बचा रहे। 

ट्राइकोमोनाइसिस

ट्राइकोमोनाइसिस रोग के संक्रमण से योनि से हरे रंग का दुर्गंध युक्त स्राव होता है। बहुत सी स्त्रियों को इसका पता ही नहीं चलता। वैसे इस रोग से कोई गंभीर परेशानी नहीं होती, किंतु इससे स्त्री को भारी बेचैनी अवश्य होती है। गर्भावस्था में जैसे ही इस रोग का पता चले, तत्काल डॉक्टर से इसकी जांच करानी चाहिए। सही उपचार से यह रोग नष्ट हो जाता है।

एच.आई.वी. 

गर्भावस्था के आरंभ में ही स्त्री को एच.आई.वी. की जांच अवश्य करानी चाहिए। इसके कारण एड्स हो सकता है, जो मां और बच्चे दोनों के लिए अत्यंत हानिकारक है। उपचार के बिना पैदा होने वाले शिशु में काफी हद तक यह संक्रमण विकसित हो सकता है। यदि गर्भवती स्त्री की जांच पॉजिटिव हो, तो भी उसे दोबारा एच.आई.वी. की जांच करानी चाहिए।

कई बार वायरस न होने के बावजूद पॉजिटिव नतीजे आते हैं। यदि दूसरी जांच भी पॉजिटिव आए तो संक्रमित स्त्री को एंटायरट्रोवायरल दवाएं दी जाती हैं, जिससे शिशु को संक्रमण होने का खतरा कम हो जाता है। यदि प्रसवकाल समीप हो, तो सी-सेक्शन द्वारा प्रसव कराने से संक्रमण का खतरा घट जाता है।

सर्विक्स में दोष 

यदि गर्भवती स्त्री की सर्विक्स (गर्भनाल) में कोई दोष-विकार हो, तो यह गर्भाशय पर बढ़ते दबाव के कारण समय से पहले खुल जाती है। आमतौर पर दूसरी तिमाही में 10-20 प्रतिशत मिसकैरिज का कारण भी यही होता है। ऐसा आनुवंशिक दुर्बलता, प्रसव काल में सर्विक्स पर पड़ने वाला खिंचाव, बायोप्सी, सर्वाइकल सर्जरी या लेजर थेरैपी के कारण हो सकता है। 

इसके अतिरिक्त गर्भाशय में एक से अधिक शिशु होने के कारण भी यह परेशानी उत्पन्न हो सकती है। लेकिन यदि गर्भ में केवल एक ही शिशु हो, तो यह समस्या दोबारा नहीं होती। जब किसी गर्भवती स्त्री को दूसरी तिमाही में गर्भाशय संकुचन या योनि से रक्तस्राव के बिना दर्द रहित मिसकैरिज हो जाता है, तो उस समय सर्विक्स की इस समस्या का पता चलता है। 

इस समस्या के निवारण के लिए डॉक्टर 12 से 22 सप्ताह के बीच सर्विक्स को स्टिज कर देते हैं। इस प्रक्रिया को तभी अपनाया जाता है, जब सर्विक्स खुल रही हो। यह कार्य लोकल एनस्थीसिया द्वारा योनि के माध्यम से किया जाता है। सर्जरी के बारह घंटे बाद स्त्री अपनी सामान्य गतिविधियां आरंभ कर सकती है। यह अवश्य है कि गर्भावस्था के शेष समय में वह सहवास नहीं कर सकती। 

ऐसी स्त्री को समय-समय पर जांच कराते रहना चाहिए। टांके आदि निकालने के समय का निर्धारण भी डॉक्टर को करना होता है। वैसे उन्हें अनुमानित तिथि से कुछ पहले निकाला जाता है। कई बार इन्हें प्रसव पीड़ा आरंभ होने तक नहीं निकाला जाता, बशर्ते कोई संक्रमण, रक्तस्राव या मेंब्रेन में खराबी न हो। ऐसे में स्त्री को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होता है। यदि पेट के निचले भाग में दबाव, रक्त के साथ स्राव, मूत्राशय में संक्रमण या योनि में किसी वस्तु के होने का एहसास हो, तो इस अवस्था में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

रक्त की प्रतिकूलता 

किसी स्त्री की रक्त कोशिकाओं में आर.एच. फैक्टर होता है और किसी स्त्री | में नहीं होता। यदि आर.एच. फैक्टर हो, तो उसे ‘आर.एच. पॉजिटिव’ कहते हैं और आर.एच. फैक्टर न हो, तो उसे ‘आर.एच. निगेटिव’ कहते हैं। यदि गर्भावस्था में मां आर.एच. निगेटिव हो और शिशु अपने पिता से आर.एच. पॉजिटिव हो, तो वे मां की इम्यून प्रणाली के लिए अपरिचित हो जाते हैं। इम्यून प्रतिक्रिया में मां का सिस्टम इस एंटीबॉडी से मकाबला करने के निमित्त मस्तैदी से खडा हो जाता है और यही सिस्टम रक्त की आर.एच. प्रतिकूलता है। 

गर्भवती स्त्री के रक्त की जांच से आर.एच. फैक्टर का पता लगाया जाता है। यदि स्त्री का आर.एच. पॉजिटिव हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शिशु आर.एच. पॉजिटिव है या आर.एच. निगेटिव। किंतु यदि पति-पत्नी दोनों आर.एच. निगेटिव हों, तो उनका शिशु भी इसी ग्रप का होगा, क्योंकि दो निगेटिव एक पॉजिटिव बच्चे का निर्माण कदापि नहीं कर सकते। यदि पति आर.एच. निगेटिव है तो बच्चा आर.एच. पॉजिटिव हो सकता है। यही बात मां और उसके बच्चे के बीच प्रतिकूलता पैदा कर सकती है। यदि प्रसव, एबॉर्शन या मिसकैरिज के दौरान शिशु का रक्त मां के रक्त में किसी भी कारणवश मिल जाए, तो गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है। इससे मां के शरीर में आर.एच. फैक्टर के लिए एंटीबॉडीज उत्पन्न हो जाती है। 

जब तक मां दूसरे आर.एच. पॉजिटिव शिशु के साथ गर्भवती नहीं होती, तब तक वे एंटीबॉडीज कोई हानि नहीं करतीं। लेकिन बाद में वे प्लेसेंटा को पार करके शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं पर आक्रमण कर देती हैं, जिससे गर्भस्थ शिशु को एनीमिया तक हो सकता है। ऐसा कम ही देखने में आया है कि ये एंटीबॉडीज पहली गर्भावस्था में हानि पहुंचाएं। इस समस्या के निवारण हेतु सबसे अच्छा उपाय यह है कि एंटीबॉडीज बनने ही न दिया जाए। 

ऐसी स्थिति में डॉक्टर अट्ठाइसवें सप्ताह में आर.एच. निगेटिव स्त्री को आर.एच. इम्यून ग्लोव्यूलिन का इंजेक्शन देते हैं। इसे ‘आर.एच. ओगैम’ कहते हैं। यदि रक्त की जांच से पता चले कि शिशु आर.एच. पॉजिटिव है, तो प्रसव के बहत्तर घंटे बाद इस इंजेक्शन का एक डोज और दिया जाता है। यदि शिशु आर. एच. निगेटिव है तो किसी भी उपचार की आवश्यकता ही नहीं है। 

उपर्युक्त इंजेक्शन किसी मिसकैरिज, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी, एबॉर्शन, कॉरिओनिक विल्स सैंपलिंग, एम्निओसिंटेसिस, योनि से रक्तस्राव या सदमे के दौरान भी दिया जाता है। इससे गर्भावस्था काफी सुरक्षित हो जाती है। यदि किसी आर.एच. निगेटिव गर्भवती स्त्री को पिछली गर्भावस्था में आर.एच. ओगैम नहीं दिया गया था और जांच से ज्ञात होता है कि उसके शरीर में आर.एच. एंटीबॉडीज पैदा हो गई हैं तो एम्निओसिंटेसिस की सहायता से भ्रूण के रक्त की जांच हो सकती है। 

यदि गर्भवती स्त्री आर.एच. निगेटिव है तो उसका एवं शिशु का रक्त अनुकूल होगा और किसी भी उपचार की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यदि वह आर. एच. पॉजिटिव है और शिशु का रक्त मां के रक्त से मेल नहीं खाता तो मां के शरार में एंटीबॉडी के स्तर का नियमित रूप से ध्यान रखना होगा। यदि यह स्तर घातक रूप से बढ़ जाए तो अल्ट्रासाउंड की सहायता से भ्रूण की स्थिति का पता लगाया जाता है। यदि उसके लिए किसी प्रकार का खतरा पैदा हो जाए तो भ्रूण काल आर.एच. निगेटिव रक्त आधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) आवश्यक हो जाता है। 

आर.एच. ओगैम के प्रयोग से ब्लड ट्रांसफ्यूजन की स्थिति नहीं आत मावा गभावस्थाएं भी काफी हद तक सुरक्षित हो जाती हैं। लेकिन रक्त में अन्य आनयामतताओं के कारण भी प्रतिकुलता पैदा हो सकती है, जैसे-एटा यद्यपि ये आर.एच. फैक्टर के मुकाबले कम ही होते हैं। यदि मां को ये एटा नहीं है और पिता को है तो इससे समस्या पैदा हो सकती है। अत: सर्वप्रथम रुटीन टेस्ट में मां के शरीर में एंटीबॉडीज की जांच की जाती है। यदि ये एंटीबॉडीज पास आते हैं, तो शिशु के पिता की जांच होती है कि कहीं वह पॉजिटिव तो नहीं है। ऐसी स्थिति में आर.एच. प्रतिकूलता जैसा उपचार ही किया जाता है। इस बात को मत भूलिए कि अच्छे डॉक्टर सदा अच्छे निर्णय लेते हैं।

योनि की आंतरिक जांच 

प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है

स्त्री रोग विशेषज्ञ के द्वारा गर्भावस्था के आरंभ व अंत में तथा कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर बीच में भी योनि की आंतरिक जांच की जाती है। गर्भावस्था के आरंभ में स्त्री के गर्भवती होने की पुष्टि के लिए तथा गर्भाशय का आकार, प्रकार और दिनों के अनुसार गर्भावस्था जानने के लिए यह जांच की जाती है। 

 

योनि की आंतरिक जांच से कई बातों का पता चल जाता है

उपर्युक्त जांच योनि और सर्विक्स की असमानताओं की कोई भी संभावना जानने के लिए भी की जाती है जबकि गर्भावस्था के अंत में सर्विक्स की तैयारी या उसकी परिपक्वता को जानने के लिए यह जांच की जाती है। इस जांच से गर्भस्थ शिशु को कोई हानि नहीं पहुंचती। आंतरिक परीक्षण से बच्चे का आकार और गर्भ में स्थान का पता लगाया जाता है। आंतरिक जांच से कूल्हे की हड्डियों का आकार एवं बनावट का भी पता चल जाता है। यदि गर्भाशय या योनि में कोई रोग अथवा विकार हो, तो उसकी जानकारी भी इस जांच से हो जाती है। 

हाथों द्वारा पेट की जांच 

डॉक्टर द्वारा गर्भवती स्त्री के पेट की जांच बार-बार की जाती है। डॉक्टर आपके पेट की जांच, परिमाण तथा आकार के लिए पेट के चिह्नों एवं भ्रूण की गतिविधियों को जानने के लिए करती है। डॉक्टर पेट की जांच यह देखने के लिए भी करती है कि गर्भस्थ शिश किस अवस्था में है। इसमें एक या दोनों हाथों से यह जानने का प्रयास किया जाता है कि शिश के सिर आदि की स्थिति क्या है। 

प्रेगनेंसी में कौन कौन से टेस्ट होते है

गर्भाशय की लंबाई से भी गर्भस्थ शिशु की वृद्धि का अनुमान लगाया जाता | है। तीसरे मास में उभरा हुआ गर्भाशय उदर के निचले भाग में अनुभव किया जा सकता है और पांचवां मास समाप्त होते-होते गर्भाशय नाभि की लंबाई तक आ| जाता है। सातवें मास के अंत में गर्भाशय नाभि तथा स्तन अस्थि या स्तन के नीचे | के आधे भाग तक आ जाता है और नौवें मास में गर्भाशय स्तन के निचले भाग तक पहुंच जाता है। लेडी डॉक्टर पेट की जांच से ही यह सब आसानी से पता लगा लेती है। वह जब भी आवश्यकता समझती है, इस जांच को करती है। प्रत्येक गर्भवती स्त्री को यह जांच अवश्य करानी चाहिए। इसके अलावा स्टेथेस्कोप या फीटल डोपलर से बच्चे के हृदय के धडकन की जांच भी की जाती है। 

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