कामयाब होने के लिए क्या करना पड़ता है-अवसर बार-बार नहीं आते (Opportunity Comes, But Once) 

कामयाब होने के लिए क्या करना पड़ता है

अवसर बार-बार नहीं आते (Opportunity Comes, But Once) 

1.कहा जाता है कि सौभाग्य दरवाजा कभी-कभार ही खटखटाता है और दुर्भाग्य अक्सर खटखटाता ही रहता है. याद रखें, जब दुर्भाग्य दरवाजा खटखटाता है तो तब तक खटखटाता रहता है, जब तक कि दरवाजा टूट नहीं जाता. अगर आप अवसर को पकड़ने में चूक गये तो फिर आपको ही अवसर का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा और तब हो सकता है, अवसर का दरवाजा हमेशा के लिए बन्द हो चुका हो.

2. यदि हम धन खो देते हैं, तो कुछ नहीं खोते. यदि हम स्वास्थ्य खो देते हैं, तो कुछ न कुछ अवश्य खो देते हैं. किन्तु यदि हम अवसर खो देते हैं तो सब कुछ खो देते हैं. याद रखें, ईश्वर हमें एक बार में एक क्षण ही देता है और अगला क्षण देने से पहले, पहला क्षण वापस ले लेता है. इसलिए यदि हम उपलब्ध समय का सही-सही विभाजन करते हुए एक-एक क्षण का सदुपयोग करते चलेंगे तो हमें ईश्वर से कोई शिकायत नहीं रहेगी.

3. अध्ययन, व्यवसाय चयन, चल-अचल सम्पत्ति में निवेश आदि के लिए अवसर बार-बार उपलब्ध नहीं हो सकते. यदि आप सही अवसर को सही वक्त पर पकड़ लेते है तो फिर आप कभी असफल नहीं हो सकते. यदि सही वक्त पर सही निर्णय नहीं ले पाते है तो फिर पछताने के अलावा कुछ भी नहीं बचता. अगर आप सोचते ही रहेंगे तो एक दिन ऐसा आयेगा, जब सोच भी नहीं बचेगा.

4. विद्यार्थी यदि अपने अध्ययन में पूरा ध्यान नहीं देगा, प्रतियोगी पूर्ण गंभीरता के साथ परीक्षाओं के लिए तैयारी नहीं करेगा, व्यवसायी यदि नियमित रूप से कठोर परिश्रम नहीं करेगा, सेवा-कर्मी यदि पूर्ण सत्यनिष्ठा और कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ कार्य नहीं करेगा तो लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं होगी. याद रखें, वे ही सफल हो पाते हैं, जो अवसर को व्यर्थ नहीं गंवाते. सच ही है अवसर बार-बार नहीं आते.

5. जो वक्त को वक्त पर पकड़ लेता है, वह जिन्दगी आराम से जी लेता है. जो वक्त को पकड़ नहीं पाता, वो जिन्दगी भर पछताता है. याद रखें, बुरे क्षण तो दिन भर में सौ बार आते हैं, किन्तु अच्छे अवसर कभी-कभार ही आ पाते हैं. अच्छे अवसरों को पकड़ने के लिए सदा तैयार रहिए. ध्यान रहे, न अच्छा अवसर कह कर आता है, न बुरा अवसर कह कर आता है. इसलिए हर अच्छे क्षण का पूर्णतः सदुपयोग करते चलें, तब बुरे से बुरा वक्त भी आपके लिए कुछ न कुछ अच्छा ही लेकर आयेगा.

6. जरा सोचिए कि क्या आप हर पल, हर क्षण अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं ? क्या आप आज का काम और आज का आराम आज ही कर रहे हैं ? यदि हाँ तो मान कर चलें कि आप अपने अवसरों का सदुपयोग कर रहे हैं. हर व्यक्ति के जीवन में अपने को कीर्तिवान, उपयोगी और सुखी बनाने के अवसर अवश्य आते हैं, जो अवसर को पहचानने की क्षमता रखता है, वही सफलता के शिखर पर पहुँचने में सफल हो सकता है. 

7.हम अक्सर छोटे और आसान कार्यों को आगे करते रहते हैं और महत्वपूर्ण एवम् अधूरे कार्यों को पीछे धकेलते रहते हैं. इस तरह महत्वपूर्ण कार्य कभी हो ही नहीं पाते और अधूरे कार्य अधूरे ही रह जाते हैं. इसलिए महत्वपूर्ण कार्य को सबसे पहले आरम्भ करें, फिर अधूरे कार्यों को पूरा करें और समय निकाल कर आसान एवम् कम महत्वपूर्ण कार्यों को भी करते चलें. देखा जाय तो हर क्षण चुनौतीपूर्ण होता है, हर क्षण संभावनाओं से युक्त होता है, बशर्ते कि हमें क्षण की पहचान हो.

8. सर्वोत्तम विचार और सर्वोत्तम योजना की प्रतीक्षा न करें. जो भी विचार अथवा योजना अभी आपके पास है, उसे ही तत्काल क्रियान्वित करें और उसे ही सर्वोत्तम समझें. यदि आप अपनी योजना पर पूर्ण सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, योजना बद्धता और समयबद्धता के साथ अमल करेंगे तो यही योजना एक दिन सर्वोत्तम हो जायेगी.

9. जरा सोचिए, यदि हम मनुष्य न होकर कुत्ता-बिल्ली होते तो क्या कर लेते ? कुछ न कुछ सार्थक करने के लिए ही हमें यह अवसर प्राप्त हुआ है. हमारे लिए तो यही प्रथम एवम् अन्तिम अवसर है. इसलिए हमें फालतू सोचने, गप्पें हांकने, हवाई किले बनाने और अपने भाग्य को कोसते रहने में ही अपना कीमती समय नष्ट नहीं कर देना चाहिए. भाग्योदय के अवसर तो हर व्यक्ति के जीवन में आते हैं, बशर्ते कि हम अवसरों को पहचानने एवम् उनका स्वागत करने के लिए तैयार रहें.

दृष्टान्त –किसी गाँव में दो दोस्त थे-मि. ‘क’ और मि. ‘ख’. दोनों ने साथ-साथ एम.ए. किया, साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षायें दी. ‘क’ का प्रशासनिक सेवाओं में चयन हो गया. ‘ख’ को सफलता नहीं मिली. कारण कि ‘क’ ने पूरी गंभीरता व लगन के साथ तैयारी की थी, ‘ख’ ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. अगले साल ‘ख’ ने फिर परीक्षा दी, रिक्त पद भी इस बार अधिक थे, किन्तु अच्छी तैयारी न होने के कारण इस बार भी चयन नहीं हो सका. हार कर ‘ख’ ने अपने कस्बे में ही एक छोटी सी दुकान कर ली, लेकिन गुजारा भी मुश्किल से हो पा रहा था. उधर ‘क’ ने नौकरी करते हुए कुछ पैसा बचाया और पास के नगर में नगरीय सीमा से थोड़ी दूरी पर दस एकड़ कृषि भूमि खरीद ली और चारों ओर बाउण्ड्री करके छोड़ दी. देखा देखी मि. ‘ख’ ने भी अपने कस्बे में 10 एकड़ भूमि खरीदी, और उसमें खेती करने लगा. किन्तु पानी की कमी के कारण खेती से कोई आमदनी नहीं हो सकी. उधर नगर का तेजी से विकास हो रहा था. मि. ‘क’ द्वारा पच्चीस हजार रूपये में पच्चीस साल पहले खरीदी गई भूमि का बाजार मूल्य पाँच करोड़ रूपये हो गया. समान योग्यता और समान प्रयास करने के बावजूद मि. ‘ख’ कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर सके, किन्तु मि. ‘क’ ने बहुत कुछ कर लिया. यह सब अवसर के सही उपयोग का ही परिणाम था. 

Life Success Tips in Hindi- अपने आपको इतना व्यस्त रखो कि दूसरों की बुराई करने का वक्त ही न मिले (Keep Yourself So Busy That You Might Have No Time To Criticise Others) 

Life Success Tips in Hindi-

1.अच्छे और बुरे व्यक्ति तो आरम्भ से ही रहे हैं, किन्तु पहले बुरा व्यक्ति भी हीनता से ग्रसित नहीं रहता था, जबकि आज तो अच्छा व्यक्ति भी हीन भावनाओं का शिकार रहता है. हीनता की ग्रन्थि के कारण ही व्यक्ति एक-दूसरे की बुराई करता है. याद रखें, दूसरों की बुराई करने से दूसरों का तो कभी कोई बुरा नहीं हो सकता, किन्तु आपकी सफलता का रास्ता अवश्य अवरूद्ध हो जाता है. इसलिए हीनता से बचने के लिए अपने विचारों को पर्याप्त ऊँचाई दो, ताकि बुराई का कोई कीटाणु ही न बचे.

2. आदमी जब भी खाली होता है या कुछ न कर पाने की स्थिति में होता है, तब वह आदतन दूसरों की बुराई करता है और बुराई के अलावा कुछ भी नहीं करता. दूसरों की बुराई करने से आदमी को क्षणिक सन्तुष्टि मिलती है, उसके अहम् की पुष्टि होती है. सोचता है, वह वैसा तो नहीं बन सकता, किन्तु बुराई के माध्यम से उसकी ऐसी-तेसी तो कर ही सकता है. लेकिन बुराई की आग और जलन के जहर में वह खुद ही खोखला होता चला जाता है. इसलिए अपने आपको सार्थक कार्यों में व्यस्त रखिए. बुराई से बचिए.

3. कितनी अजीब स्थिति है कि जब भी दो व्यक्ति मिलते हैं, उनकी बातचीत की सूई किसी तीसरे व्यक्ति पर ही टिकी होती है. यह भी तय है कि उस तीसरे व्यक्ति की अच्छाई नहीं, बल्कि बुराई ही की जाती हैं. बुराई करके हम अपने आपको अपेक्षाकृत अधिक समझदार सिद्ध करने के प्रयास करते है. परन्तु आज तक दूसरों की बुराई करके कोई भी महान् नहीं बन सका है. आदमी कुछ देकर ही महान बन सकता है, लेकर नहीं.

4. आदमी नब्बे फीसदी लोगों की तो बुराई ही करता है, केवल दस फीसदी लोगों की ही तारीफ करता है और तारीफ भी तब तक ही करता है, जब तक कि उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहता है. स्वार्थ से ऊपर उठने पर ही व्यक्ति नफरत से ऊपर उठ सकता है. हम इतने चालाक हैं कि हर जीवित व्यक्ति में बुराई ढूँढ़ ही लेते हैं. और मरने पर उसे देवता बना देते हैं. इसी कारण हमारे यहाँ जितने भी महान् व्यक्ति हुये हैं, वे सब मृत्यु के बाद ही महानता को उपलब्ध हुए हैं.

5. सफलता का मापदण्ड व्यक्ति दर व्यक्ति अलग-अलग होता है, किन्तु जो अपने आपको अपने कार्य के प्रति समर्पित कर देता है, उसके लिए मापदण्ड कोई विशेष महत्व नहीं रखता. याद रखें, आप किसी की बुराई करके अच्छे नहीं हो सकते. क्या दूसरों की बुराई करने का अधिकार केवल आपको ही प्राप्त है ? क्या दूसरे आपकी बुराई नहीं कर सकते ? यदि आप किसी की एक बुराई करेंगे, तो वह आपकी दस बुराई करेगा. इसलिए न किसी की बुराई करें, न किसी की बुराई सुनें और न किसी को बुराई करने का अवसर दें, 

6.काम उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना काम करना महत्वपूर्ण होता है. काम करना भी उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना सद्भावनापूर्वक काम करना महत्वपूर्ण होता है. यदि आप सम्मान के साथ जीना चाहते हैं तो दूसरों का सम्मान करना भी सीखें. किसी का सम्मान न कर सकें, कोई बात नहीं, पर किसी का अपमान तो न करें, किसी का अपमान न करना ही उसका सम्मान करना है.

7. आदमी प्रायः अपने बराबर या ऊपर वालों की ही बुराई करता है, नीचे वालों की नहीं करता. किन्तु यह भूल जाता है कि जब भी ऊपर वाले पर कीचड़ उछाला जाता है, कीचड़ वापस खुद पर ही गिरता है. ऊपर वाले तक तो कीचड़ पहुँच ही कहाँ पाता है. अक्सर हम तृतीय पुरूष की अनुपस्थिति में ही कीचड़ उछालते हैं, इसलिए कीचड़ हमारे आस-पास ही गिरता है. कीचड़ के ढ़ेर को देखकर हम बहुत खुश होते हैं. यह कीचड़ हम अपने अवसाद एवम् नैराश्य के कारण ही उछालते हैं. जब तक हम अपने आपको व्यस्त नहीं रखेंगे, जब तक अपनी कमियों को नहीं देखेंगे, जब तक सकारात्मक सोच नहीं रखेंगे, तब तक एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते ही रहेंगे.

8. यह भी याद रखिए कि जब आप दूसरों की बुराई करते हैं, तब दूसरे तो अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं, आप द्वारा की गई बुराई का उनके स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता. किन्तु समय, श्रम और दिमाग तो आपका ही खर्च होता है. आपके मुँह से दूसरों की बुराई सुनने वाला भी आपसे सावधान रहता है. आपकी बातों का उस पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता. वह तो विवशतावश ही आपकी बात सुनता है. वह यह भी समझ लेता है कि उसकी अनुपस्थिति में आप उसकी भी बुराई ही करेंगे, इसलिए यदि बुराई ही करनी हो तो खुद की करो, पूरी ईमानदारी से करो और सबके सामने करो. तब लोगों की सहानुभूति आपके साथ जुड़ेगी, लोग आपकी मदद के लिए तैयार रहेंगे.

9. जब भी आप राग-द्वेष से ऊपर उठेंगे, महानता की श्रेणी में आ जायेंगे. महानता के लिए आपको अपने व्यक्तित्व का निर्माण करना पड़ेगा. व्यक्तित्व निर्माण के लिए दूसरों की बुराई की बजाय अपनी कमजोरियों को पकड़ना पड़ेगा. अपनी कमजोरियाँ पकड़ने के लिए दूसरों की बुराई नहीं, अच्छाइयाँ ग्रहण करनी पड़ेगी. जब आप व्यस्त रहेंगे, अपनी कमजोरियों को दूर करने में लगे रहेंगे, तब आपको दूसरों में कोई बुराई ही नजर नहीं आयेगी. आदमी अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उसे दूसरों पर आरोपित कर लेता है. वह अपनी ही चालाकियों और अपनी ही कमजोरियों को दूसरों की बुराई के रूप में प्रायः उद्घाटित करता रहता है, वस्तुतः व्यक्ति अन्दर से जैसा होता है, वैसा ही सबको समझता है, इसलिए सबसे पहले अपने आपको सुधारिए, अपने काम से काम रखिए, तब आपको किसी में कोई बुराई नजर ही नहीं आयेगी.

निष्कर्ष- जब भी किसी की अच्छाई या बुराई करनी हो तो उसके सामने ही करें. किसी को माध्यम न बनायें. ध्यान रहे, मध्यस्थ द्वारा कभी भी सही-सही सम्प्रेषण संभव नहीं हो सकता. मध्यरथ तो अपना मिर्च-मसाला भी मिलायेगा ही. सच्चाई तो यही है कि व्यक्ति कभी भी किसी की न तो ठीक से बुराई कर पाता है और न अच्छाई ही. बुराई बढ़ा-चढ़ा कर की जाती है और अच्छाई बहुत ही संकुचित मन से की जाती है. इसलिए, जहाँ तक संभव हो, अच्छाई और बुराई सामने ही करें, संक्षिप्त, तर्क युक्त एवम् संयमित तरीके से करें. सम्बन्धों की कीमत पर न करें, मजा तो तब है, जब अच्छाई या बुराई सुनकर कोई भी आपसे नाराज न हो. याद रखें, कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता, जो केवल अच्छा ही हो या केवल बुरा ही हो, 

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