शिक्षा क्या है? अथवा वास्तविक शिक्षा क्या है?

वास्तविक शिक्षा क्या है?

शिक्षा क्या है? अथवा वास्तविक शिक्षा क्या है? (आईएएस, मुख्य परीक्षा, 2005) 

बात जब शिक्षा की होती है तो यह प्रश्न सहज ही उठता है कि शिक्षा है क्या? साथ ही दूसरा प्रश्न यह भी उठता है कि वास्तविक शिक्षा क्या है। वस्तुतः वर्तमान संदर्भ में शिक्षा को मात्र रोजी कमाने का जरिया मान लिया गया है और प्रायः संकीर्ण अर्थों में इसे इसी रूप में अभिहित भी किया जाता है, किंतु क्या यही वास्तविक शिक्षा है? नहीं, यह वास्तविक शिक्षा नहीं है। 

वास्तविक शिक्षा का फलक बहुत विस्तृत है। यह सिर्फ रोटी कमाने का जरिया नहीं है। शिक्षा तो वह है जो जीवन को सफल बनाती है, यह हमारा आत्मिक विकास करती है, व्यक्तित्व को निखारती है, हमें आत्मनिर्भर बनाती है। सच तो यह है कि शिक्षा जीवन के लिए है, न कि जीविका के लिए है। यही कारण है कि संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियां हैं, उनमें शिक्षा सबसे बढ़कर है। 

“विडम्बना यह है कि सभ्यता के हजारों-वर्णी के इतिहास में धीरे-धीरे शिक्षा  देने पर जोर बढता गया है। उसी के लिए नए-नए तरीके, नए-नए संस्थान और नए-नए व्यवसाय ढूढ़े जाते रहे हैं और अंततः क्षिा व्यवसाय के लिए लोगों को तैयार करने का व्यवसाय बनती गई है, और शिक्षा अपने मूल लक्ष्य से भटकते-भटकते खो सी गई है।” 

मानव जाति प्राणि जगत में सर्वोच्च शिखर पर है, क्योंकि उसी ने आनुवंशिकता के बंधन को तोड़ने में सफलता पाई है, क्योंकि वही तरह-तरह के बौद्धिक और भौतिक उपकरण विकसित कर पाई है। मनुष्य प्रकृति जैसी है उसमें हस्तक्षेप कर उसे अपने अनुकूल बना लेता है। वही बुद्वि और हाथ से ऐसे काम करने में सफल हो जाता है जिन्हें उससे पहले नहीं किया गया। इसके लिए थोड़े प्रशिक्षण यानी ‘ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है। एक ही काम को बार-बार करने से उसमें दक्षता पैदा हो जाती है। यहां तक तो कुछ चिड़ियां और जानवर भी पहुंच जाते हैं, जैसे सर्कस के जानवर । पर उनके कौशल को एक सीमा के बाद बढ़ाया नहीं जा सकता। लेकिन मनुष्य के कौशल, क्षमताएं और संभावनाएं अनंत हैं। मनुष्य में मौलिकता की क्षमता है। शिक्षा इसी क्षमता को बढ़ाने की प्रक्रिया है। इसीलिए मनुष्य ही शिक्षा ले या दे सकता है। 

विभिन्न भाषाओं में शिक्षा का मतलब मनुष्य के पोषण और विकास के लिए ज्ञान और समझ बढ़ाने की प्रक्रिया समझा जाता है। ग्रीक भाषा में ‘एजूकेसिओ शब्द का मतलब होता है अंदर से निकालना यानी ‘एजूकेशन’ का अर्थ हुआ मनुष्य की संभावनाओं को उजागर करना। संभावनाओं को उजागर करने के लिए जरूरी होता है उन्हें समझना, फिर उनके लिए उपयुक्त पर्यावरण बनाना, जरूरी उपकरण विकसित करना, समर्थ शिक्षक ढूंढना और पूरी प्रक्रिया को संगठित करना। इस पूरे उपक्रम में सबसे महत्वपूर्ण और एकमात्र जीवन्त घटक होता है शिक्षक। वही शिक्षार्थी से संवाद कर सकता है जिसके माध्यम से संप्रेषण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। 

यहां इस मर्म को समझना जरूरी है कि शिक्षक और दूसरे सभी उपकरण बाहर से होते हैं। असली जगह जहां शिक्षा घटित होती है वह तो शिक्षार्थी के अन्दर होती है। एक आसान उदाहरण से समझें तो खेती के सारे औजार, धूप-पानी, खाद-बीज आदि बाहर की चीजें होती हैं। असली चीज तो है जमीन। वह न हो तो खेती हो ही नहीं सकती। यहां तक कि बीज भी बाहर सन डाले जायं तो पानी बरसने के बाद धरती पर कुछ न कुछ महारत होने लगता है। इसलिए शिक्षा के लिए सबसे अधिक जरूरा होता है एक शिक्षार्थी और उसकी ग्रहणशीलता। इसी पर मार दने के लिए यहां तक कहा जाता है कि शिक्षा दी नहीं ता, ली जाती है यानी शिक्षा मुख्यतः ग्रहण करने की सीखने चीज है। शिक्षक और दूसरे सारे उपकरण बस उपयुक्त और सहायक पर्यावरण बनाते हैं जिसमें शिक्षा ग्रहण की जा सके। 

विडम्बना यह है कि सभ्यता के हजारों वर्षों के इतिहास में धीरे-धीरे शिक्षा देने पर जोर बढ़ता गया है। उसी के लिए । नए-नए तरीके, नए-नए संस्थान और नए-नए व्यवसाय ढूढ़े जाते रहे हैं और अंततः शिक्षा व्यवसाय के लिए लोगों को तैयार करने का व्यवसाय बनती गई है, और शिक्षा अपने मूल लक्ष्य से भटकते-भटकते खो सी गई है। 

“समाज में देखा जाता है कि निरक्षर व्यक्ति भी विवेकील हो सकता है, यानी सही-गलत में अंतर कर सकता है, और बहुत शिक्षित व्यक्ति भी निर्विवेक हो सकता है।” 

शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य को व्यष्टि और समष्टि के रूप में निरंतर बेहतर बनाते जाना है, यानी ऐसे समाज की रचना करनी है ताकि मनुष्य और समाज दोनों लगातार पहले से अधिक रचनाशील और विकासशील होते जायं। कुल मिलाकर शिक्षा स्वयं ‘जीवन’ के उच्चतर धरातल पर लेते जाने की प्रक्रिया है। 

भारतीय समाज में सुख एक निम्नतर कोटि है। आनन्द, परमानन्द, ब्रह्मानंद जैसी उच्चतर कोटियां हैं। शिक्षा मनुष्य को उसी ओर ले जा सकती है। पर आज शिक्षा अधिक से अधिक सांसारिक और शारीरिक सुख प्राप्त करने का साधन मात्र बन गई है। इसीलिए सफलता के लिए एक चूहा-दौड़ शुरू हो गई है। मनुष्य का बौद्धिक, सौंदर्यबोधात्मक और नैतिक विकास शिक्षा का लक्ष्य है पर ऐसे विकास की प्रक्रिया थमती जा रही है। तभी तो कुछ लोग कहने लगे हैं कि लोग आज प्रशिक्षित तो होते जा रहे हैं पर शिक्षित नहीं हो पा रहे हैं, यानी लोग जीवन के किसी एक क्षेत्र में कुशलता प्राप्त कर नौकरी पाना तो सीख जा रहे हैं पर जीवन को समग्रता में लेते हुए जीने की तमीज नहीं सीख पा रहे हैं। 

इसे समझने के लिए जरा देखें कि समाज में कैसी शिक्षा उपलब्ध है। आज शिक्षा मुख्यतः औपचारिक या संगठित है जिसके अलग-अलग स्तर हैं-प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च, अलग-अलग प्रकार हैं-तकनीकी, पेशेवर, कामर्स आदि और फिर उनमें अलग-अलग विषय हैं-गणित, भौतिकी, रसायनशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, साहित्य, कलाएं आदि। फिर संयुक्त विषय विकसित होते जा रहे हैं। जैसे भौतिक रसायन शास्त्र, बायोकेमिस्ट्री आदि । इस तरह ज्ञान का विखंडन होता जा रहा है, विशेषता बढ़ाने के नाम पर। यहां तक कि इतिहास को भी प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक में बांट दिया गया है। विशेषज्ञता के बढ़ते महत्व के कारण लोग सामान्य ज्ञान पर ध्यान नहीं देते। दिखा यह दिया जाता है कि हृदय रोग का विशेषज्ञ सामान्य रोग का इलाज नहीं कर सकता। इसी तरह विशेषज्ञ संपूर्ण ज्ञान का महत्व नहीं जानता। 

शिक्षा के लिए कहा जाता रहा है : One should know something about everything and everything about some thing (व्यक्ति को थोड़ा-थोड़ा सब कुछ के बारे में और किसी एक विषय में सब कुछ जानना चाहिए)। इस तरह नीचे से ऊपर तक शिक्षा की एक ऐसी पिरामिड जैसी संरचना बनाई गई है जिसमें सब कुछ के बारे में प्रारंभिक सूचनाएं देते हुए ‘मास्टर्स डिग्री’ पाने तक व्यक्ति को ‘मास्टर’ मान लिया जाता है और फिर वह किसी एक विषय में शोध करता हुआ विशेषज्ञ बन सकता है। पर ऐसी, शिक्षा प्रणाली में ‘न खुदा ही मिलता है न विसाले सनम’ यानी सामान्य विद्यार्थी का न सामान्य ज्ञान विस्तार पाता है न वह वास्तव में विशेषज्ञ बन पाता है। 

औपचारिक शिक्षा का मानक माना गया है परीक्षा को, जो ‘पास और फेल’ करती है और पास भी कई श्रेणियों में। यह अपने आप में शिक्षा का अपमान है क्योंकि शिक्षा अगर वास्तव में दी और ली गई है तो अगर कोई फेल होगा तो वह शिक्षक और शिक्षा की पद्धति और प्रणाली का दोष है। क्योंकि यदि ठीक से परीक्षा दी गई तो विद्यार्थी फेल क्यों होता है। 

इसीलिए आज ‘फार्मल’ की जगह ‘इनफार्मल’ और ‘नॉन-फार्मल’ एजुकेशन की महत्ता को चिन्हित किया जा रहा है। शिक्षा की सबसे परीक्षित और प्रतिष्ठित पद्धति आदि काल से ‘स्वाध्याय’ रही है। आज उसे स्वशिक्षा या autodidactism कहा जाने लगा है। यानी बिना बाहरी मदद के शिक्षा। 

जब शिक्षा की पद्धतियां और प्रणालियां नहीं विकसित हुई थीं तब तो लोग स्वाध्याय द्वारा ही शिक्षित होते थे। आधुनिक 

काल में भी प्रतिभाशाली विभूतियां स्वाध्याय द्वारा ही ऐतिहासिक योगदान कर सकी हैं जैसे लेओनार्दो द विंची, लिंकन, डार्विन आदि। हमारे देश में भी रामानुजन और राहुल सांकृत्यायन जैसे प्रकांड विद्वान इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इसीलिए कहा जाता रहा है कि शिक्षा की सबसे बड़ी और संवादी पुस्तक जीवन और जगत है। 

शिक्षा के तीन स्पष्ट अवयव हो सकते हैं- सूचना, ज्ञान और विवेक । आज सूचना में क्रांति हो जाने की बात की जाती है। आज ‘ज्ञान ही शक्ति है (Knowledge is power) को स्थापित किया जा रहा है और शिक्षा को व्यवसाय की दासी बना दिया जा रहा है। परन्तु वास्तव में तो सूचना जब तक ज्ञान में और ज्ञान जब तक विवेक में रूपान्तरित न हो तब तक शिक्षा का कोई मतलब नहीं हो सकता। समाज में देखा जाता है कि निरक्षर व्यक्ति भी विवेकशील हो सकता है, यानी सही-गलत में अंतर कर सकता है, और बहुत शिक्षित व्यक्ति भी निर्विवेक हो सकता है। 

अंततः, शिक्षा को व्यवसायिकता तक सीमित करना शिक्षा की अवमानना और मानव जीवन का अपमान है क्योंकि मनुष्य ने शिक्षा का आविष्कार जीवन को उच्चतर और सुंदरतम बनाने के लिए किया है न कि जीवन को व्यवसाय का पर्याय बनाने के लिए जीवन को उच्चतर और सुंदरतम बनाने वाली शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है। 

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