सार्वजनिक व्यवस्था क्या है? भारतीय विधि व्यवस्था में इसको बनाए रखने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं?

सार्वजनिक व्यवस्था क्या है?

प्रश्न-सार्वजनिक व्यवस्था क्या है? भारतीय विधि व्यवस्था में इसको बनाए रखने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं? 

उत्तर-सार्वजनिक व्यवस्था को आम तौर पर सार्वजनिक शांति और सुरक्षा के समान माना जाता है. सार्वजनिक व्यवस्था उन तीन आधारों में से एक है, जिस पर राज्य धर्म की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकता है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का समान अधिकार देता है, बशर्ते ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्थाओं, नैतिकता, स्वास्थ्य एवं मूल अधिकारों से सम्बन्धित अन्य प्रावधानों के अनुरूप हों.सार्वजनिक व्यवस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अन्य मौलिक अधिकारों को प्रतिबन्धित करने वाले आधारों में से भी एक है. संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (सूची-2) के अनुसार, सार्वजनिक व्यवस्था के पहलुओं पर कानून बनाने की शक्ति राज्यों में निहित है. सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारक प्रासंगिक हैं और इनका निर्धारण राज्य द्वारा किया जाता है. 

न्यायालयों ने मोटे तौर पर इसकी व्याख्या कुछ ऐसे साधनों के रूप में की है, जो व्यापक स्तर पर किसी समुदाय को प्रभावित करते हैं, न कि कुछ व्यक्तियों को, राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य (1965) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि ‘सार्वजनिक व्यवस्था के मामले में की गई एक विशेष कार्रवाई से किसी समुदाय या जनता को व्यापक रूप से प्रभावित होना पड़ता है. कानून का उल्लंघन (ऐसा कुछ करना, जो कानुन या नियम द्वारा निषिद्ध है) हमेशा आदेश को प्रभावित करता है, लेकिन इससे पहले कि इसे सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला कहा जाए, बड़े पैमाने पर समुदाय या जनता प्रभावित होनी चाहिए. इसके लिए तीन संकेन्द्रित वृत्तों की कल्पना करनी होगी, जिसमें सबसे बड़ा वृत्त ‘कानून और व्यवस्था’ का प्रति निधित्व करता है, दूसरा’सार्वजनिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है और सबसे छोटा वत्त ‘राज्य की सुरक्षा’ का प्रतिनिधित्व करता है.

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