जनहित या लोकहितवाद क्या है?,मुद्रा अपस्फीति अथवा विस्फीति (Disinflation) क्या होता है…..

जनहित या लोकहितवाद क्या है?,मुद्रा अपस्फीति अथवा विस्फीति (Disinflation) क्या होता है ? ,राज्य में विधान परिषद् का गठन कसे होता है ?, न्यायालय की अवमानना क्या होता है?,एक देश एक कार्ड' योजना के बारे में आप क्या जानते हैं?,भारत में राष्ट्रीय आपात लगाने के लिए क्या परिस्थितियों होना आवश्यक है ?,संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र क्या है?,साधारण विधेयक व धन विधेयक में क्या अन्तर होता है?

जनहित या लोकहितवाद क्या है?,मुद्रा अपस्फीति अथवा विस्फीति (Disinflation) क्या होता है ? ,राज्य में विधान परिषद् का गठन कसे होता है ?, न्यायालय की अवमानना क्या होता है?,एक देश एक कार्ड’ योजना के बारे में आप क्या जानते हैं?,भारत में राष्ट्रीय आपात लगाने के लिए क्या परिस्थितियों होना आवश्यक है ?,संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र क्या है?,साधारण विधेयक व धन विधेयक में क्या अन्तर होता है?

जनहित या लोकहितवाद क्या है?

– जनहितवाद या लोकहितवाद (Public Interest Litigation-PIL) जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं, शोषण, पर्यावरण, बाल श्रम, स्त्रियों का शोषण आदि विषयों से सम्बन्धित होते हैं. किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा न्यायालय को लोकहितवाद के लिए याचिका उच्चतम या उच्च न्यायालय में दी जा सकती है. न्यायालय इस प्रकार की सूचना या याचिका पर उसकी जाँच करवाता है तथा वस्तुस्थिति को समझकर तथा समाज के हित को ध्यान में रखकर निर्णय देता है.

मुद्रा अपस्फीति अथवा विस्फीति (Disinflation) क्या होता है ? 

– वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में लगातार कमी होते जाना मुद्रा अपस्फीति कहलाता है, इसे ही मंदी कहते हैं. इस अवस्था में मुद्रा का मूल्य बढ़ जाता है, लेकिन सामान्य कीमत स्तर घट जाता है. ऐसा मुद्रा की पूर्ति की तुलना में वस्तुओं एवं सेवाओं के अनुत्पादन के कारण होता है, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण लाने हेतु जो प्रयास किए जाते हैं (जैसे साख-नियंत्रण आदि), उनके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति की दर घटने लगती है, कीमतों में गिरावट आती है तथा रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, यह स्थिति मुद्रा अपस्फीति अथवा विस्फीति की स्थिति कहलाती है, इस स्थिति में यद्यपि मूल्य स्तर गिरता है, तथापि यह सामान्य मूल्य स्तर से ऊपर ही रहता है.

 राज्य में विधान परिषद् का गठन कसे होता है ? 

-राज्य सभा की तरह विधान परिषद एक स्थायी सदन है इसे भंग नहीं किया जा सकता है. विधान परिषद् के एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते रहते हैं. विधान परिषद के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है. विधान परिषद् में अधिकतम संख्या विधान सभा की एक तिहाई और न्यूनतम 40 हो सकती है, संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत् किसी राज्य विधानमंडल के कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों की संख्या के कम-से-कम दो तिहाई बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव पर संसद सम्बन्धित राज्य में विधान परिषद् का सृजन या समाप्ति का उपबंध कर सकती है. 

अनुच्छेद 171 के प्रावधानों के अनुसार, विधान परिषद् के सदस्यों का निर्वाचन निम्न प्रकार से होता है,

(i) एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों द्वारा चुने जाते हैं,

(ii) 1/12 सदस्य स्नातकों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं,

(iii) 1/12 सदस्यों को 3 वर्ष से अध्यापन कर रहे लोग चुनते हैं, जो माध्यमिक स्तर से निम्न स्तर के नहीं होने चाहिए.

(iv) 1/3 सदस्य विधान सभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं,

(v) शेष 1/6 सदस्यों का नामांकन राज्यपाल द्वारा किया जाता है जो कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारी आन्दोलन और समाज सेवा से जुड़े होते हैं.

 न्यायालय की अवमानना क्या होता है?

– अगर कोई शख्स अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देता है, या उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने की कोशिश करता है या उसके मान-सम्मान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है या अदालती कार्रवाई में दखल देता है या खलल डालता है तो यह क्रिमिनल कटेप्ट ऑफ कोर्ट है. इस तरह की हरकत चाहे लिखकर की जाए या बोलकर या फिर अपने हाव-भाव से ऐसा किया जाए ये तमाम हरकतें कंटेष्ट ऑफ कोर्ट के दायरे में होंगी. इस तरह के मामले अगर कोर्ट के संज्ञान में आए तो कोर्ट स्वयं संज्ञान ले सकता है या फिर कोर्ट के संज्ञान में जब यह मामला आता है, तो वह ऐसे मामले में ऐसा करने वालों को नोटिस जारी करता है, 

अदालत कंटेप्ट ऑफ कोर्ट के आरोपी को नोटिस जारी करती है और पूछती है कि उसने जो हरकत की है. वह पहली नजर में कंटेप्ट ऑफ कोर्ट के दायरे में आता है ऐसे में क्यों न उसके खिलाफ कंटेप्ट ऑफ कोर्ट की कार्रवाई की जाए वह शख्स अदालत में अपनी सफाई पेश करता है. कई बार वह बिना शर्त माफी भी माँग लेता है और यह अदालत पर निर्भर करता है कि वह माफी को स्वीकार करे या न करे, कि

एक देश एक कार्ड’ योजना के बारे में आप क्या जानते हैं?

– केन्द्र सरकार ने हाल ही में ‘एक देश का कार्ड’ (One Nation One Card) की शुरूआत की है, इस एक कार्ड से कई सुविधाओं का लाभ जा सकता है. इस एक कार्ड की मदद से कई जगहों पर पेमेंट के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, यह कार्ड एक 

स्मार्ट कार्ड है, जो डेबिट-क्रेडिट कार्ड की तरह काम करता है. अब बैंक जो भी नए डेबिट और क्रेडिट कार्ड जारी करेंगे उनमें नेशनल कॉमन मोबेलिटी कार्ड फीचर होगा, इस कार्ड को अन्य वॉलेट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, ये कार्ड यात्रा करने वालों की सुविधा के लिए लाया गया है. इस वन नेशन वन कार्ड की मदद से अलग अलग कार्ड रखने से झंझट से आजादी मिल जाती है. नेशनल कॉमन मोबेलिटी कार्ड की मदद से आप टोल टैक्स, पार्किंग चार्ज, ट्रेन और मेट्रो ट्रेन में किराए का भुगतान कर सकते हैं. कि

भारत में राष्ट्रीय आपात लगाने के लिए क्या परिस्थितियों होना आवश्यक है ?

– राष्ट्रपति पूरे देश में या किसी भाग में अनुच्छेद 352 के तहत् तीन परिस्थितियों में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकता है, ये परिस्थितियाँ हैं- 

1.युद्ध की स्थिति, 2. बाह्य आक्रमण या आक्रमण की आशंका, 3. सशस्त्र विद्रोह, राष्ट्रपति यह उदघोषणा किसी घटना के पूर्व भी, यदि यह आभास हो जाए कि ऐसी परिस्थिति आने वाली है, तो वह आपातकाल लगा सकता है.

 संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र क्या है?

– संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की जनरल असेम्बली ने 10 दिसम्बर, 1948 को प्रस्ताव संख्या 271A-द यूनिवर्सल डिकलेरेशन ऑफ ह्यूमेन राइट्स (UDHR) पारित किया. इस घोषणा-पत्र में प्रस्तावना और 30 अनुच्छेद हैं. इसका उद्देश्य विश्व में स्वतन्त्रता, न्याय और शांति के हेतु सभी के लिए समान रूप से मूलभूत मानवाधिकारों को मान्यता प्रदान करना है,

साधारण विधेयक व धन विधेयक में क्या अन्तर होता है?

– साधारण विधेयक लोक सभा या राज्य सभा में से किसी में भी प्रस्तुत किया जा सकता है, इसकी प्रस्तुति से पूर्व राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य नहीं होती. दोनों सदनों में इस पर असहमति होने पर संयुक्त अधिवेशन बुलाया जा सकता है, राष्ट्रपति इसे अनुमति देने से पूर्व संसद को पुनर्विचार के लिए भेज सकता है. 

धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से केवल लोक सभा में प्रस्तुत किया जा सकता है. राज्य सभा केवल उस पर विचार कर सकती है. अंतिम पारित करने का अधिकार लोक सभा का ही होता है, राष्ट्रपति इसे पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता, इसके लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन नहीं बुलाया जाता|

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