हरित जीडीपी पर निबंध | हरित अर्थव्यवस्था क्या है | हरित अर्थव्यवस्था Drishti IAS

हरित जीडीपी पर निबंध

हरित जीडीपी पर निबंध | हरित अर्थव्यवस्था क्या है | हरित अर्थव्यवस्था Drishti IAS or हरित जीडीपी : संपोषणीय विकास का रास्ता अथवा दुनिया को बचाने के लिए कितनी आवश्यक है हरित अर्थव्यवस्था 

पर्यावरण संतुलन की परवाह किए बगैर हमने जिस तरह से अनियंत्रित औद्योगिक विकास की राह को अपनाया, उससे व्यापक पर्यावरणीय क्षति हुई। अब इसके दुष्परिणाम भी स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। जैसे-जलवायु परिवर्तन, भूमण्डलीय तापन एवं ओजोन परत का नष्ट होना आदि। पर्यावरण असंतुलन के ये दुष्परिणाम परी दुनिया के लिए खतरे की घंटी हैं। इन दुष्परिणामों से बचने के लिए ही हमने हरित जीडीपी पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जो कि संपोषणीय विकास की दिशा में एक कारगर पहल है। अब हमें यह समझ में आने लगा है कि दुनिया को बचाने तथा भावी पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए ‘हरित अर्थव्यवस्था’ के साथ अपना तालमेल बढ़ाना ही होगा। 

“हरित जीडीपी की अवधारणा उस हरित अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है, जिसमें अल्प कार्बन उत्सर्जन अर्थात कम पर्यावरण प्रदूषण के साथ संसाधन कुशल व समावेशी विकास की पहल की जाती है।” 

हरित जीडीपी (हरित सकल घरेलू उत्पाद) का स्वरूप परम्परागत सकल घरेल उत्पाद से भिन्न है। हरित जीडीपी की अवधारणा उस हरित अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है, जिसमें अल्प कार्बन उत्सर्जन अर्थात कम पर्यावरण प्रदूषण के साथ संसाधन कुशल व समावेशी विकास की पहल की जाती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार यह अर्थव्यवस्था जहां एक ओर मानव कल्याण और सामाजिक समता को बढ़ावा देती है, तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरणीय जोखिम और पारिस्थितिकीय संकट को भी कम करती है। हरित जीडीपी के तहत जैविक विविधता की कमी और जलवायु परिवर्तनों के कारणों का मापन कर संपोषणीय विकास की तरफ कदम बढ़ाने पर बल दिया जाता है। संपोषणीय विकास से तात्पर्य ऐसे विकास से है, जिसमें संसाधनों का इस्तेमाल इस प्रकार किया जाता है, जिससे वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति होने के साथ भावी पीढ़ी के लिए भी । संसाधन अक्षुण्ण बने रहें। 

यदि हम किसी देश के संदर्भ में हरित जीडीपी की बात करते हैं तो इसका अभिप्राय यही होता है कि वह देश संपोषणीय विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए किस हद तक तैयार है। यानी हरित जीडीपी और संपोषणीय विकास एक-दूसरे के पूरक हैं तथा हरित जीडीपी की अवधारणा को विकसित कर हम संपोषणीय विकास को प्रोत्साहित कर सकते हैं। चूंकि हरित जीडीपी में पर्यावरण, आर्थिक विकास एवं मानव कल्याण का आधार होता है, अतः यह कहा जा सकता है कि हरित जीडीपी यानी हरित अर्थव्यवस्था ही संपोषणीय विकास का रास्ता बनाती है। 

हरित जीडीपी के तहत आय और रोजगार में वृद्धि, उत्पादन में वृद्धि आदि के लिए उन तौर-तरीकों को अपनाया जाता है, जिनसे कम से कम प्रदूषण फैले, ऊर्जा की बचत हो तथा पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ बनाए रखा जा सके। ग्लोबल सिटीजंस सेंटर ने हरित अर्थव्यवस्था के तीन स्तंभ निर्धारित किए हैं, जो ‘तिहरी आधार रेखा’ (Triple Bottom Line) कहे जाते हैं। इनमें पहला है टिकाऊ पर्यावरण। इस सिद्धांत के अनुसार हमारा जीवमंडल सीमित संसाधनों से युक्त है और इसमें पुनर्नवीकरण की सीमित क्षमता है। ऐसे में यदि बिना सोचे-समझे संसाधनों का बेतरतीब दोहन किया जाएगा, तो ये संसाधन समाप्त हो जाएंगे, जीवमंडल नष्ट हो जाएगा और भावी पीढ़ी के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। इसलिए हमें एसी आर्थिक प्रणाली का विकास कारना होगा, जो कि पारिस्थितिकी प्रणाली का सम्मान करे और संसाधनों का इस प्रकार से दोहन करे कि बिना पारिस्थितिकी तंत्र को हानि पहुंचाए वर्तमान तथा भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। 

दूसरा स्तंभ है सामाजिक न्याय। सामाजिक न्याय के सिद्धांत के अंतर्गत यह माना जाता है कि प्राकृतिक संसाधनों की तरह ही संस्कृति एवं मानव की गरिमा आदि भी महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं। ऐसे में इनके विकास हेतु हमें एक ऐसी आर्थिक प्रणाली का विकास करना चाहिए, जो सभी लोगों को (संपन्न एवं वंचितों को एक समान) एक गरिमापूर्ण जीवन देने में सक्षम हो सके। 

तीसरा स्तंभ है ‘स्थानीयता’। यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि संपोषणीय विकास एवं न्याय के लिए स्थानीय परिवेश से संबंध बनाना अति आवश्यक है। हरित अर्थव्यवस्था के अंतर्गत स्थानीय लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्थानीय उत्पादों के विकास पर बल दिया जाता है। 

ग्रीन जीडीपी के तहत जिन गतिविधियों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है उनमें पहली है, अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल। यह गैर प्रदूषक ऊर्जा होती है, इसीलिए इसे पर्यावरण हितैषी ऊर्जा भी कहा जाता है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, सामद्रिक ऊर्जा एवं बायोगैस ऊर्जा आदि अक्षय ऊर्जा के ही घटक हैं। अक्षय ऊर्जा के जरिए ही हम स्वच्छ प्रौद्योगिकी को भी बढ़ावा दे सकते हैं। दूसरी गतिविधि है भू-प्रबंधन। इसके अंतर्गत भूमि के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने वाले तौर-तरीकों को अपनाया जाता है, जिनमें सम्मिलित हैं-जैविक कृषि, शहरी वानिकी एवं मृदा का स्थरीकरण आदि। इसी क्रम में ग्रीन बिल्डिंग के तहत ऐसी इमारतों के निर्माण को वरीयता दी जाती है, जो ऊर्जा दक्ष होती हैं तथा जिनमें जल के कम भाग की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी इमारतों में वर्षा जल संचयन प्रणाली का भी बंदोबस्त रहता है। इसी प्रकार स्वच्छ परिवहन के तहत ऐसी परिवहन प्रणाली के विकास पर बल दिया जाता है, जिससे परिवहन से होने वाला प्रदूषण कम से कम हो। इसके लिए साइकिलिंग, वैकल्पिक ईंधन, सार्वजनिक परिवहन तथा हाइब्रिड एवं इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को वरीयता दी जाती है। इसी क्रम में जल प्रबंधन के तहत जहां वर्षा जल संचयन एवं जल सुधार पर विशेष बल दिया जाता है वहीं अपशिष्ट प्रबंधन के जरिए पर्यावरण प्रदूषण को कम से कमतर करने का प्रयास किया जाता है। 

“ग्रीन जीडीपी के तहत जिन गतिविधियों , को प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है उनमें पहली है अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल। यह गैर प्रदूषक ऊर्जा होती है, इसीलिए इसे पर्यावरण हितैषी ऊर्जा भी कहा जाता है।” 

विश्व में चीन वह पहला देश है, जिसने सर्वप्रथम वर्ष 2004 में अपने सकल घरेलू उत्पाद में हरित जीडीपी का फार्मूला और पैमाना पेश किया था। आर्थिक विकास में पर्यावरण नुकसान की कीमत को लेकर चीन ने पहली बार वर्ष 2004 के आंकड़े वर्ष 2006 में जारी किए। भारत ने इस दिशा में थोड़ी देर से कदम बढ़ाए और वर्ष 2009 में इस दिशा में सोचना शुरू किया। इसके बाद भारत के तत्कालीन सांख्यिकीय प्रमुख प्रणब सेन की अध्यक्षता में पारम्परिक जीडीपी में हरित जीडीपी के आंकड़ों पर अध्ययन शुरू हुआ और वर्ष 2015 में सर्वप्रथम इसकी सूची जारी की गई। वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों की हरित जीडीपी का आकलन भी शुरू किया है। 

भारत में हरित जीडीपी के जरिए संपोषणीय विकास की तरफ बढ़ना थोड़ा कठिन जरूर है, किंतु असंभव नहीं है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है तथा विश्व में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में यह चौथे पायदान पर है। वह अपनी अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि को बढ़ाना भी चाहता है। ये बातें ग्रीन जीडीपी के मार्ग में बाधक हैं। हालांकि, कुछ बातें भारत की राह को आसान भी बनाती हैं। जैसे, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान के दृष्टिकोण से भारत काफी सक्षम है तथा कम कीमत वाली विनिर्माण और सेवाओं एवं पारंपरिक ज्ञान के बल पर हरित अर्थव्यवस्था के क्रम में बढ़त लेने में सक्षम है। पिछले कुछ वर्षों में जहां भारत में ‘हरित अनुसंधान’ में वृद्धि देखी गई है, वहीं अक्षय ऊर्जा निवेश के मामले में भारत को तीसरा सबसे आकर्षक देश माना जा रहा है। यह कहना असंगत न होगा कि भारत हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में अपना कदम आगे बढ़ा चुका है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की स्थापना, पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन तथा राष्ट्रीय क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान के रूप में भारत ने हरित जीडीपी की दिशा में सधे हुए कदम बढ़ाए हैं, जो कि संपोषणीय विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगे। 

बढ़ते हुए पर्यावरणीय संकटों को देखते हुए वैश्विक समुदाय की यह साझा जिम्मेदारी बनती है कि वह पर्यावरण को बचाने के लिए आगे आए। हमें यह समझना होगा कि जब पर्यावरण बचेगा, तभी मानवता भी बचेगी और हमारी भावी पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। इसके लिए दुनिया के देशों को अपने निजी हितों से मुंह मोड़कर न सिर्फ हरित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ाना होगा, बल्कि इसमें निवेश भी बढ़ाना होगा। दुनिया को हरा-भरा रखकर ही हम उस संपोषणीय विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा सकते हैं। याद रह, यही मानवता की भलाई का भी रास्ता है। 

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