ग्लोबल वार्मिंग : विश्व की सर्वाधिक खतरनाक समस्या | ग्लोबल वार्मिंग पर निबंध

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ग्लोबल वार्मिंग (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2013) अथवा ग्लोबल वार्मिंग : विश्व की सर्वाधिक खतरनाक समस्या (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2016) ,ग्लोबल वार्मिंग पर निबंध

मानव ही नहीं, संपूर्ण भूमण्डल के ऊपर वर्तमान में जो खतरे रहे हैं उनमें से एक है जलवायु परिवर्तन। जलवायु परिवर्तन मी समस्या है जो पर्यावरण संबंधी प्रायः सभी समस्याओं का स्रोत है। इस समस्या की गम्भीरता पर सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने पेरिस सम्मेलन में कहा था- “वैश्विक जलवायु की सुरक्षा किसी देश विशेष की समस्या नहीं है, यह संपूर्ण विश्व की समस्या है और इसके लिए साझा रणनीति अपनाने की जरूरत है।’ वस्तुतः जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप ओजोन छिद्र का विस्तार हो रहा है तथा भूमण्डलीय तापन में लगातार वृद्धि हो रही है। 

“विश्वव्यापी ताप वृद्धि का विश्व स्तर पर सामना करने हेतु 141 देशों के बीच हुआ क्योटो (जापान) समझौता 16 फरवरी, 2005 से लागू हो गया।” 

भूमण्डलीय तापन वास्तव में 18वीं सदी की औद्योगिक क्रांति का परिणाम है। इसका श्री गणेश 18वीं सदी के अंत में यूरोप से हुआ था। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में यह पूर्वी यूरोप से लेकर अमेरिका तक तेजी से फैल गया था। औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन के लगातार प्रयोग से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में निरंतर वृद्धि होती गयी। इसका सीधा परिणाम पृथ्वी की गर्माहट के रूप में आज हमारे सामने है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के तापमान में पिछली शताब्दी की अपेक्षा इस शताब्दी में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक की ही वृद्धि हुई है। एक अन्य अनुमान के अनुसार वर्ष 2080 तक पृथ्वी के तापमान में 1 डिग्री से लेकर 3.5 डिग्री तक की वृद्धि की संभावना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी की ताप में वृद्धि होना कोई बड़ी घटना नहीं है किन्तु तापवृद्धि के साथ साथ वातावरण में कार्बनडॉईआक्साड तथा अन्य गैसों की मात्रा में वृद्धि होना अधिक हानिकारक है। गैसों की इस वृद्धि से ही आज जलवायु में परिवर्तन के लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार यदि यही स्थिति रही तो आगामी 100 वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समद्र के जल स्तर में 15 सेमी. से लेकर 95 सेमी. तक की वृद्धि हो सकती है। इसके परिणाम काफी भयावह हो सकते हैं। 

आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व तक जलवायु क्षरण कोई समस्या नहीं थी। वर्ष 1861 में पहली बार वैज्ञानिक टिडेल ने यह तथ्य उजागर किया कि वायुमंडल में जल वाष्प, कार्बन डाईऑक्साइड तथा लम्बे तरंग दैर्ध्य के विकिरण को अवशोषित कर लेते हैं जिससे वातावरण अधिक गर्म हो जाता है। इसी क्रम में 1896 में स्वीडिश वैज्ञानिक आरहेनियस ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि कोयले के दहन से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इससे ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ता है तथा पृथ्वी के ताप में वृद्धि होती है। 1924 में अमेरिका के भौतिक विज्ञानी लोटका ने अपने अध्ययन द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया कि औद्योगिक गतिविधियों के कारण आगामी 500 वर्षों में पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा वर्तमान स्तर की दोगुनी हो जायेगी। 1949 में एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ने बताया कि 1850 से 1940 के मध्य वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। 1967 में सर्वप्रथम कंप्यूटर से प्राप्त आंकड़ों से पता चला कि पृथ्वी की गर्माहट के लिए कार्बन डाईआक्साइड मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

ग्लोबल वार्मिंग क्या है?—सामान्य रूप से पृथ्वी का तापमान लगभग स्थिर रहता है। यह स्थिति सूर्य से आने वाले ऊष्मीय विकिरण तथा पृथ्वी से परावर्तित होने वाली ऊष्मा के मध्य संतुलन से बनती है। सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली उष्मा का 6 प्रतिशत अंश वायुमंडल में परावर्तित हो जाता है। इसी प्रकार इसका 27 प्रतिशत अंश बादलों द्वारा तथा 2 प्रतिशत अंश पृथ्वी की सतह द्वारा परावर्तित हो जाता है। इस प्रकार सौर ऊष्मा का 35 प्रतिशत अंश सीधे परावर्तित हो जाता है। शेष 65 प्रतिशत में से 14 प्रतिशत अंश वायुमण्डलीय गैसों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। शेष 51 प्रतिशत ऊष्मा पृथ्वी की सतह को प्राप्त होती है। यह ऊष्मा धीरे धीरे अवरक्त विकिरण के रूप में वायुमण्डल से निकल जाती है। पिछले कुछ वर्षों के अंदर अवशोषण और परावर्तन की इस प्राकृतिक/ भौतिक क्रिया में ऊष्माशोषी गैसों की मात्रा में वृद्धि के कारण असंतुलन की स्थिति बन गयी है। परिणामतः पृथ्वी का वातावरण हरित गृह का रूप लेता जा रहा है। कार्बन डाइआक्साइड, मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, नाइट्रस आक्साइड जैसी गैसें पृथ्वी के वातावरण में ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती हैं। ये उष्मारोधी गैसे पृथ्वी की सतह के चारों ओर एक घना आवरण बना लेती हैं जिससे धरती की सतह से होने वाली विकिरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ती है। फलतः पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होती है। वैज्ञानिकों द्वारा प्रदत्त आंकड़ों के आधार पर यह ज्ञात होता है कि पिछली सदी के दौरान धरती का औसत तापमान आधा डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ गया। तापमान वृद्धि की वर्तमान दर के अनुसार, वर्ष 2100 तक विश्व का तापमान विनाशक स्थिति तक बढ़ सकता है। स्पष्टतया आगामी कुछ दशकों में हमें तापमान वृद्धि तथा ओजोन परत के क्षरण दोनों समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। 

ओजोन क्षरण व उसके प्रभाव-ओजोन ऑक्सीजन का ही एक रूप है जिसमें दो के स्थान पर तीन अणु होते हैं। ओजोन परत के अभाव में अथवा इसके क्षीण होने की स्थिति में पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है जो जीवधारियों से लेकर वनस्पतियों तक सभी के लिए हानिकारक होती है। सर्वप्रथम 1960 में ओजोन क्षरण की जानकारी प्राप्त हुई थी तथा 1984 में वैज्ञानिकों ने दक्षिणी ध्रुव के ऊपर 40 किमी. व्यास वाले ओजोन छिद्र का पता लगाया था। ओजोन परत वास्तव में ट्राइआक्सीजन की एक परत है जिसे ओजोन गैस भी कहा जाता है। यह रंगहीन होता है किन्त द्रवित अवस्था में इसका रंग गहरा नीला होता है। पृथ्वी की सतह के ऊपर क्षोभमंडल के आगे समतापमंडल होता है। ओजोन मंडल समताप मंडल के निचले भाग में 15 से 35 किमी. के मध्य स्थित होता है। उसकी ऊपरी सीमा 55 किमी. तक होती है। ओजोन का सर्वाधिक घनत्व 20-25 किमी. के मध्य रहता है। सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी किरणें इस परत से या तो परावर्तित हो जाती हैं अथवा अवशोषित हो जाती हैं। इसके कारण ओजोन परत में तापमान की वृद्धि होती है। ओजोन परत के नीचे के भाग में तापमान समान रहता है। इसलिए वनस्पतियों तक सभी के लिए हानिकारक होती है। सर्वप्रथम 1960 में ओजोन क्षरण की जानकारी प्राप्त हुई थी तथा 1984 में वैज्ञानिकों ने दक्षिणी ध्रुव के ऊपर 40 किमी. व्यास वाले ओजोन छिद्र का पता लगाया था। ओजोन परत वास्तव में ट्राइआक्सीजन की एक परत है जिसे ओजोन गैस भी कहा जाता है। यह रंगहीन होता है किन्तु द्रवित अवस्था में इसका रंग गहरा नीला होता है। पृथ्वी की सतह के ऊपर क्षोभमंडल के आगे समतापमंडल होता है। ओजोन मंडल समताप मंडल के निचले भाग में 15 से 35 किमी. के मध्य स्थित होता है। उसकी ऊपरी सीमा 55 किमी. तक होती है। ओजोन का सर्वाधिक घनत्व 20-25 किमी. के मध्य रहता है। सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी किरणें इस परत से या तो परावर्तित हो जाती हैं अथवा अवशोषित हो जाती हैं। इसके कारण ओजोन परत में तापमान की वृद्धि होती है। ओजोन परत के नीचे के भाग में तापमान समान रहता है। इसलिए इस मंडल को समताप मंडल कहते हैं। ओजोन परत को सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाली गैस क्लोरीन होती है किन्तु यह मुक्त अवस्था में नहीं पाई जाती है। अतः यह अधिक क्षति नहीं कर पाती। इस प्रकार ओजोन परत को सर्वाधिक क्षति पहुंचाने वाली गैस क्लोरोफ्लोरो कार्बन मानी जाती है। इसके अतिरिक्त क्लोरीन, फ्लोरीन, ब्रोमीन, नाइट्रस आक्साइड गैसें भी ओजोन परत को हानि पहुंचाती हैं। अत्यंत अल्पमात्रा में उपस्थित मिथाइल क्लोराइड गैस भी इसके लिए हानिकारक होती है। इन गैसों की उपस्थिति में ओजोन आक्सीजन तथा नवजात आक्सीजन में विभक्त होती है जो पुनः संयोजित नहीं हो पाती। ओजोन के टूटने या ओजोन के कम होने की प्रक्रिया को ओजोन क्षरण या ओजोन रिक्तिकरण कहते हैं। ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों का “ओजोन क्षरण पदार्थ’ कहते हैं। इन पदार्थों का उपयोग रेफ्रिजरेटरों, शीतलन उपकरणों, स्वास्थ्य उत्पादों, फोम के निर्माण, उद्योगों में सूक्ष्म मार्जन कार्यों, अग्निशमन प्रणालियों आदि में किया जाता है। जब ओजोन परत में ओजोन गैस का अभाव या ओजोन क्षिद्र का निर्माण प्रक्षेपण यानों से उत्सर्जित गैस के द्वारा होता है तो ऐसे ओजोन छिद्र को ऐरोसोल कहते हैं। 

वैश्विक प्रयास-1985 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, विश्व मौसम विज्ञान संगठन तथा अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संघ ने वैश्विक ताप वृद्धि पर सहमति बनाने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत विएना सम्मेलन 1985 से शुरू हुई। इस मुहिम के परिणाम स्वरूप 1987 में मांट्रियल समझौता हुआ जिस पर 48 देशों ने हस्ताक्षर किया। 1 जनवरी, 1989 से लागू इस समझौते में वर्तमान में 189 देश शामिल हैं। इस प्रोटोकाल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन के उत्पादन एवं खपत में पर्याप्त कटौती तथा हेलोन गैसों के उत्पादन एवं खपत को पूरी तरह समाप्त करने पर सहमति हुई थी। 

“भूमण्डलीय तापन के विस्तार पर लगाम कसने के लिए यह आवश्यक है कि सर्वप्रथम वायुमण्डल में हानिकारक गैसों के सांद्रण को कम किया जाय।” 

पर्यावरण के प्रति मानव समाज के चिन्तन एवं जागरुकता के कारण वर्ष 1992 में दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन रियो डि जेनेरियो में हुआ, इस सम्मेलन को अर्थ सम्मिट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें 150 से भी अधिक देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथा लाभप्रद सिद्धांत पर आम सहमति हुयी कि शान्ति, विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा एक दूसरे पर आश्रित हैं, इसमें से किसी को भी स्वतंत्र रूप से देखना सम्भव नहीं है। यह सहमति अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप रियो नाम से एक 26 सिद्धांतों वाला दस्तावेज बनाया गया जिसका मुख्य उद्देश्य विश्व का संयमित एव संतुलित विकास है। हालांकि इन सिद्धांतों को अपनाने हेतु कोई कानूनी बन्धन नहीं है पर बहुत से राष्ट्रों ने इसे अपनाने में अपना हित समझा है तथा अपने राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों में इसे एक प्रमुख स्थान दिया है। 

विश्वव्यापी ताप वृद्धि का विश्व स्तर पर सामना करने हेत 141 देशों के बीच हुआ क्योटो (जापान) समझौता 16 फरवरी. 2005 से लागू हो गया। ज्ञातव्य है कि क्योटो में विश्व जलवाय परिवर्तन पर 1 से 11 दिसम्बर, 1997 तक एक सम्मेलन आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन के समापन पर जारी घोषणा-पत्र अर्थात “क्योटो प्रोटोकॉल’ में छह गैसों (CO., NO, CH, HFC, PFC, SF) के उत्सर्जन (Emission) में 1990 के स्तर पर 5.2% कटौती करने पर अमेरिका सहित 38 विकसित देशों द्वारा प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। 

भारत क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर के साथ-साथ इसकी पुष्टि भी कर चुका है। उल्लेखनीय है कि पुष्टि के बाद भी भारत पर किसी । तरह की प्रतिबद्धता नहीं है और उसे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन से | किसी प्रकार की कटौती नहीं करनी है। क्योंकि वह विकसित देशों की | सूची में नहीं है। क्योटो प्रोटोकॉल की पुष्टि से भारत को कई फायदे हैं। इससे भारत में पुनर्नवीनीकरण ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन तथा वनीकरण योजना में निवेश होगा। इसके अलावा क्योटो प्रोटोकॉल से भारत को संतुलित विकास को मद्देनजर रखते हुए स्वच्छ प्रौद्योगिकी परियोजनाओं हेतु बाहरी सहायता भी प्राप्त हो सकेगी। 

तापवृद्धि के निवारक उपाय–विभिन्न संधियों (प्रोटोकाल) में उल्लिखित शर्तों का सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों द्वारा कड़ाई अनुपालन तापवृद्धि को रोकने में काफी सहायक साबित हो सका है। किन्तु इसके अतिरिक्त कई अन्य निवारक उपाय हैं जो कि सकते हैं। विभिन्न देशों की सरकारों को इन उपायों को देश की नीतियों में शामिल करना चाहिए ताकि इनका नागरिक स्तर पर अनुपालन हो सके। कुछ निवारक उपाय इस प्रकार हैं

1. वृक्षारोपण-वृहद् स्तर पर वृक्षारोपण द्वारा वैश्विक ताप वृद्धि पर काफी हद तक नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। वृक्ष कार्बन डाइ आक्साइड के प्रमुख उपभोक्ता हैं। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार 120 मिलियन हेक्टेयर का वन क्षेत्र प्रतिवर्ष 780 मिलियन टन कार्बन डाइ आक्साइड का अवशोषण कर सकता है। इसका सीधा सा आशय है कि यदि पृथ्वी की सतह में वनाच्छादित क्षेत्रों की वृद्धि कर दी जाय तो मानवीय क्रिया कलाप द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइआक्साइड गैस की बड़ी मात्रा को प्राकृतिक रूप से समाप्त किया जा सकता है। 

2.बायो गैस के उपयोग का विस्तार-विकासशील देशों तथा अल्पविकसित देशों में प्रायः खाना बनाने तथा अन्य कार्यों के लिए लकड़ी, गोबर के उपले इत्यादि का उपयोग किया जाता है। इससे कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसे बंद करके बायोगैस को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 

3.सौर ऊर्जा-जीवाश्म ईंधन के प्रयोग की अपेक्षा सौर ऊर्जा का उपयोग पर्यावरण की दृष्टि से अधिक लाभकारी है। सर्य एक अक्षय ऊर्जा भंडार है। विभिन्न देशों को चाहिए कि वे अपने देश में सौर ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन दे। इसका जैसे-जैसे विस्तार होगा जीवाश्म ईंधन का उपयोग घटेगा। 

भारत की स्थिति–वैश्विक ताप वद्धि पर अंतर्राष्ट्रीय चिंता में शामिल भारत ने 1992 में मांट्रियल प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर किया था। 1998 में देश के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा ओजोन नष्ट कारक पदार्थ (वियमन) अधिनियम, 1998 बनाया गया। इस अधिनियम के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार है- 

(1) ओजोन नष्ट कारक पदार्थों के उत्पादन, निर्यात, आयात हेतु पर्यावरण मंत्रालय से लाइसेंस आवश्यक 

(2) ओजोन नष्ट कारक पदार्थों के उत्पादन संबंधी प्रकियाओं को समाप्त करने हेतु समय सीमा तय की गयी। 

भूमण्डलीय तापन के विस्तार पर लगाम कसने के लिए यह आवश्यक है कि सर्वप्रथम वायुमण्डल में हानिकारक गैसों के सांद्रण को कम किया जाय। हानिकारक गैसों के उत्सर्जन की मात्रा को कम करने के प्रश्न पर विकसित और विकासशील देशों के मध्य एक द्वन्द्व की स्थिति बनी हुई है। यह तय है कि औद्योगीकीकरण का कार्य विकसित देशों में तीव्रता से हुआ है। इस प्रकार से उनकी जिम्मेदारी भी अधिक बनती है। प्रायः पिछले सभी सम्मेलनों और बैठकों में विकसित देशों ने इस जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते हुए विकासशील देशों को ही दोषी ठहराने का कार्य किया है। यह वास्तव में निदनीय है। आज सभी देशों को अपने निजी हितों को त्याग कर वैश्विक हित पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। गर्म होती धरती को बचाने के लिए यदि हमने ठोस उपाय न किए तो यह संपूर्ण । पृथ्वी के लिए घातक होगा। 

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