युद्ध और शांति पर निबंध | War and Peace Essay in Hindi

War and Peace Essay in Hindi

युद्ध और शांति पर निबंध | War and Peace Essay in Hindi

 विश्व में छोटे से छोटे मंच से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे वृहत्तम मंच पर हमें विश्वशांति एवं निरस्त्रीकरण तथा उनके उपायों की चर्चाएँ सुनने को मिलती हैं. इसके साथ ही दूसरी ओर परमाणु आयुधों की दौड़ के ब्यौरे पढ़ने सुनने को मिलते हैं. कहीं से परमाणु बमों के परीक्षणों के समाचार आते हैं, कहीं पर दूरमारक प्रक्षेपास्त्रों के लगाए जाने की खबरें आती हैं तथा कहीं से नए नए विध्वंसकारी एवं विनाशकारी आयुधों के आविष्कार की गुप्त रिपोर्ट पढ़ने को मिलती है. ऐसा लगता है कि विश्व के कर्णधार दोहरी नीति पर चल रहे हैं अथवा शांति स्थापना के नाम पर शांति भंग करने की तैयारियां पूरी सामर्थ्य के साथ कर रहे हैं. हो सकता है कि वे युद्ध की इतनी विकट तैयारी करना चाहते हैं कि युद्ध की स्थिति में उनके विनाशकारी प्रभावों के भय के कारण लोग युद्ध करना ही न चाहें. प्रसिद्ध विचारक सिसरो का यह कथन अक्षरशः चरितार्थ होता हुआ दिखाई दे रहा है—युद्ध छेड़ने का एक ही बहाना हो सकता है कि हम क्षतिग्रस्त हुए बिना शांतिपूर्वक रह सकें.

शांति : जीवन की स्वाभाविकता 

प्रत्येक जीव, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि सब शांतिपूर्वक रहना चाहते हैं. शांति भंग होने पर जीवन आपत्तिग्रस्त बन जाता है. हम चाहे जब देख सकते हैं कि जीवन अथवा वातावरण को उद्वेलित करने वाली परिस्थितियों को प्रत्येक जीव सहज भाव से अस्वीकार करता है. आँधी. तूफान आदि की आशंका मात्र से पशु-पक्षी अपने स्थानों को छोड़कर अपने प्राणों के रक्षार्थ इधर-उधर भागने लगते हैं, सामान्य मनुष्य भी झगड़े-टंटों से दूर ही रहना चाहते हैं. वे तो यहाँ तक कहते हुए सुने देखे जा सकते हैं कि आधी रोटी कम खा लेंगे, परन्तु शांति से रहना चाहते हैं. विश्व इतिहास में सम्भवतः एक भी ऐसा उदाहरण देखने व पढ़ने को नहीं मिलेगा, जब यह कहा गया हो कि युद्ध एक अच्छी चीज है तथा वह मानव जीवन के लिए काम्य है. पार्थ सदृश अजेय धनुर्धर वीर भी युद्ध की विभीषिका की परिकल्पना मात्र से सिहर उठा था और युद्ध से विरत होते हुए उसने अपने सारथी, सखा एवं गुरु श्रीकृष्ण के प्रति जो वचन कहे थे, वे लोक व्यवहार की दृष्टि से उसके वर्ग के युद्धजीवी एवं युद्धकर्मी क्षत्रिय की मानसिकता को मुखर करते हैं. 

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।

वेपधुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ 

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितम् । 

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यमिर्जनार्दन ॥  (श्रीमद्भगवद्गीता 1/28,29-39)

अर्थात् हे ! कृष्ण इस युद्ध की इच्छा वाले खड़े हुए स्वजन-समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं, मुख सूखा जाता है और मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच होता है. हे जनार्दन, कुल के नाश करने से होने वाले दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए? 

विश्व-विजय की महत्त्वाकांक्षा लेकर निरन्तर युद्ध करने वाले सिकंदर से जब उसके गुरु अरस्तू ने यह प्रश्न किया था कि तुम विश्व विजय प्राप्त करने के उपरान्त क्या करोगे ? तब उसने यह उत्तर दिया था कि “चैन की नींद सोऊँगा” और अरस्तू ने हँसकर यह इंगित किया था, “तब अभी और यहीं चैन की नींद क्यों नहीं सो जाते ?” अपनी युद्ध-विजयों द्वारा समस्त यूरोप को हिला देने वाले नेपोलियन का भी यही निष्कर्ष था कि “युद्ध बर्बर लोगों का पेशा है.” मध्यकाल के यूरोपवासी विचारक मैकियावेली ने भी युद्ध की भर्त्सना करते हुए कहा था कि युद्ध ऐसा पेशा है, जिसमें मनुष्य सम्मानपूर्वक नहीं रह सकता. वह ऐसा पेशा है जिसमें लाभ कमाने के लिए सैनिक को झूठा, लुटेरा और क्रूर बनना पड़ता है. डॉ. राधाकृष्णन ने ठीक ही कहा है कि “सामूहिक हत्या का नाम युद्ध है.” 

चैन की नींद सोना ही जीवन का चरम लक्ष्य होते हुए भी मानव युद्ध में प्रवृत्त होता है. आखिर क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर यह कहकर दिया जाता है कि साँप काटे नहीं, परन्तु फुफकारता रहे अन्यथा कोई भी उसको चैन से नहीं रहने देगा. छोटा-बड़ा हर राहगीर उसको कंकड़, लाठी मारेगा. भले ही युद्ध न किए जाएँ, परन्तु युद्ध की पूरी तैयारी रखी जाए, जिससे कोई अन्य देश हम पर आसानी से आक्रमण न कर सके. जो भी हो, विवादों को तय करने के लिए सदैव बातचीत व समझौते के मार्ग को अच्छा बताया गया है, युद्ध कर्म को निर्मम, कठोर, जंगली अमानवीय, अव्यावहारिक आदि कहकर युद्ध की भर्त्सना सर्वत्र एवं सर्वकालों में की गई है. प्रत्येक युद्ध के बाद सद्भावीजनों ने स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में प्रयत्न किया है. महाभारतकार ने विजेता से रुदन कराकर मनुष्य की युद्ध-विरतता को ही प्रकट किया है. इसी शताब्दी में दो विश्वयुद्ध हुए और दोनों के उपरान्त विश्व में स्थायी शांति की स्थापना के लिए क्रमशः राष्ट्र संघ (League of Nations) तथा संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations Organisation) की स्थापना की गई. यद्यपि ये संस्थाएँ अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में पूर्णतः सफल नहीं हो पाईं तथापि इतना तो निश्चित है कि ये एक सीमा विशेष तक युद्ध को टालने में सफल रहीं. कम से कम इन्होंने शांतिपूर्वक रहने की मानवेच्छा को तो उजागर किया ही है.

शांति का मूल्य

प्रत्येक वस्तु की भाँति शांति का भी मूल्य होता है. यदि कोई व्यक्ति अथवा राष्ट्र शांतिपूर्वक रहना चाहता है तो इसको शांति के लिए अपेक्षित मूल्य चुकाना ही पड़ेगा. आक्रमण होने पर देश या तो अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ समझौता करते हुए आक्रामक देश को मुंहमांगी रियायतें देकर राजी करे अथवा पूरी शक्ति एवं सामर्थ्य के साथ उसका सामना करे. यह सब जानते हैं कि समझौतों द्वारा प्राप्त शांति अस्थायी होती है. द्वितीय विश्वयुद्ध की पूर्व वेला में म्यूनिख समझौता इसका ज्वलन्त प्रमाण है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने म्यूनिख समझौता इसलिए किया था कि ब्रिटेन उस समय हिटलर की चुनौती का सामना करने की स्थिति में नहीं था, परन्तु समझौते की स्याही सूखने से पहले ही जर्मनी के तानाशाह सर एडोल्फ हिटलर ने युद्ध की घोषणा कर दी थी. म्यूनिख समझौते के अवसर पर यदि ब्रिटेन युद्ध के लिए तैयार होता, तो न म्यूनिख समझौता होता और न हिटलर ब्रिटेन की कमजोरी का आकलन करके इतनी आसानी से युद्ध की घोषणा ही कर सकता. इतिहास साक्षी है कि अपनी स्थिति के प्रति सन्तुष्ट रहने वाले राष्ट्रों ने आक्रमणकारियों को आक्रमण के लिए ललचाया है और वे देश सदैव परास्त होकर दासता को प्राप्त हुए हैं. इसके विपरीत, जो राष्ट्र सदैव पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार रहे अथवा रहते हैं, उनको सदैव सम्मान प्राप्त होता रहा है और अन्य देश उनके साथ मित्रता करने के इच्छुक रहे हैं. ऐसे ही देश सदा शांति से भी रहे हैं. 

स्थायी शांति 

वास्तविक और स्थायी शांति वह शांति होती है, जो सम्मान से प्राप्त की जाती है और जिसमें ससम्मान जिया जाता है. ऐसी शांति युद्ध में अर्जित विजय की अपेक्षा किसी प्रकार कम नहीं होती है, क्योंकि यह शत्रुओं को आतंकित करके उपलब्ध होती है. जिस प्रकार अनवरत चौकीदारी स्वतन्त्रता का मूल्य है, उसी प्रकार युद्ध के लिए सदैव कटिबद्ध रहकर ही शांति का मूल्य चुकाया जा सकता है. यदि आक्रमण करने वाला यह जानता है कि आक्रमण का मुँहतोड़ उत्तर दिया जाएगा, तो वह आक्रमण करने के पूर्व कम से कम सौ बार आगा पीछा सोचेगा. यदि फिर भी आक्रामक हमला कर देता है, तो उसकी वही दुर्गति होती है जो भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान की हुई थी. यदि भारत ने पिछली पराजयों से सबक न सीखा होता, तो पाकिस्तान को मनमानी करने का अवसर मिल ही जाता. अमरीका से सहायता एवं चीन से आश्वासन प्राप्त करने के फलस्वरूप पाकिस्तान के तानाशाह को पूर्ण विश्वास था कि वह भारत को रौंद डालेगा. किन्तु युद्ध के लिए भारत की तैयारी का परिणाम सर्वथा विपरीत हुआ. फलतः पाकिस्तान के कर्णधार भविष्य में भारत पर आक्रमण करने का विचार बहुत कठिनाई से करेंगे. 

युद्ध के लिए तैयार रहने से दोहरा लाभ होता है. इससे राष्ट्र को आत्म-रक्षा की शक्ति तो प्राप्त होती ही है, बल्कि आक्रमण के विरुद्ध आतंक उत्पन्न करने की भी सामर्थ्य आ जाती है, अतएव हमारे विचार में युद्ध के लिए तैयार रहने के कार्यक्रम को किसी भी राष्ट्र में सर्वप्रथम प्राथमिकता एवं सर्वोच्च वरीयता प्राप्त होनी चाहिए. हम इस विचारधारा से पूर्णतः सहमत हैं कि भारत को परमाणु बम का निर्माण करना चाहिए. तृतीय विश्वयुद्ध के बादल विश्व-क्षितिज पर वर्षों से घुमड़ रहे हैं, परन्तु बरस नहीं सके, क्योंकि रूस और अमरीका एक-दूसरे की मारक शक्ति से आतंकित थे. दोनों शक्तियाँ जानती थीं कि आक्रमणकारी भी नष्ट हो जाएगा. देश की प्रगति एवं उसके विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसकी सीमाएँ सर्वथा निरापद बनी रहें. शांति और अहिंसा के पुजारी एवं आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ देवदूत को भी इसी बात का दुःख था कि भारत में युद्ध करने की शक्ति नहीं रह गई है. उन्होंने अपने मित्र एच. एस. पोलक को एक बार लिखा था कि “मैंने यह खोज की है कि भारत में युद्ध की प्रवृत्ति तो मौजूद है, परन्तु युद्ध लड़ने की शक्ति समाप्त हो गई है. उसको चाहिए कि वह शक्ति सम्पादित करे और उसके बाद, यदि उसकी इच्छा हो, तो वह 

विश्व को अहिंसा का संदेश दे. भारत जो कुछ करे या दे, एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में करे, न कि एक दुर्बल राष्ट्र के रूप में. भले ही वह अहिंसा का पाठ विश्व को कभी न पढ़ा पाए.” 

राष्ट्र कवि ‘दिनकर’ ने उचित ही कहा है- 

क्षमा शोभती उस भुजंग को, 

जिसके पास गरल हो। उसको क्या, जो दन्त हीन, 

जो विषरहित, विनीत, सरल हो ।  (कुरुक्षेत्र)

एक स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए यह अत्यावश्यक है कि वह युद्ध के लिए आवश्यक शक्ति संचित करे तथा स्वयं को सदैव युद्ध के लिए तैयार रखे. ऐसा अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति तथा आन्तरिक शांति दोनों ही के लिए आवश्यक है, जो राष्ट्र दुर्बल एवं शक्तिहीन हैं, उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में भी सम्मानजनक स्थान नहीं प्राप्त होता है, जो राष्ट्र शक्ति सम्पन्न है, वही शांति की बात अधिक सशक्त ढंग से कर सकता है. हमारे राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि चारों ओर शत्रुओं की घात लगी है. ऐसे में शक्ति सम्पन्न होने पर ही हमारा राष्ट्र विश्व-पटल पर सशक्त रहेगा, अपनी सीमाओं की भी भली-भाँति रक्षा कर पाएगा तथा इसके साथ-ही-साथ आन्तरिक उपद्रवों से भी सशक्त ढंग से निपट पाएगा. यह नहीं भूलना चाहिए कि शांति बन्दूक की नली से निकलती है. 

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