विज्ञापन पर निबंध

विज्ञापन पर निबंध

विज्ञापन पर निबंध | Essay on Advertisement

 सुहानी सुबह लिहाफ में लिपटा कोई ज्योंही श्रुतिमधुर सुनना चाहता है, तो उसके कानों में गानों की चाशनी में पगा हआ स्वर सुनाई पड़ने लगता है-“यदि आपके मुँह से दुर्गंध आती है, यदि आपके दाँतों में सड़न है, यदि आप अपने दाँतों को दूध की तरह सफेद देखना चाहते हों, तो झटपट मुलायम झागवाले ‘बिनाका’ टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें। दिनभर की तरोताजगी के लिए ‘बिनाका’ टूथपेस्ट ही नहीं, बल्कि बिनाका टूथब्रश भी।” 

फिर, हमारे कानों में तरह-तरह की ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं—’जानते हैं, आपकी मनपसंद तारिका अपनी सुंदरता का राज क्या बताती हैं?-लक्स, ट्वायलेट ! बालों को झड़ने से कौन बचाता है-जी हाँ, सदा सुगंधित टाटा कोकोनट हेयर ऑयल ! और हाँ, लाखों की मनपसंद, दिलकश सिगरेट सीजर्स !” 

घर से बाहर निकलिए, तो लंबे-लंबे हृदयहीन लौह लैंपपोस्टर, हर क्षण दुर्गंध पीती हई बेपनाह दीवारें, भागती हुई खचाखच भरी बसें और ट्रामें-सब-की-सब अपने सीने में भड़कीले, रंग-बिरंगे पोस्टर चिपकाए कभी पहलवान छाप बीड़ी’ तो कभी दिलदार हुसैन जर्दा, कभी ‘सनलाइट साबुन’ और कभी सिनेमा, कभी सर्कस के विज्ञापन से आपकी नजरों को अपनी ओर जबरदस्ती खींच रही हैं। चिल्लाते हुए लाउडस्पीकर आपके कानों में कभी भक्तप्रह्लाद फिल्म, कभी फुटबॉल मैच, कभी दंगल के विज्ञापन उड़ेल रहे हैं। कभी ठहरने और भोजन का उत्तम प्रबंध करनेवाले होटलवाले, कभी सिरदर्द की दवावाले, कभी हाजमा दुरुस्त करनेवाले, कभी लॉटरी का टिकट बेचनेवाले अपनी छपी हुई सूचनाएँ आपके हाथ, आपके रिक्शे या आपकी मोटरों में फेंकते चले जा रहे हैं। 

और, शाम को ऊँचे मकानों पर विद्युत की करामात के रंग-बिरंगे अक्षरों और रेखाओं में चित्रित साइकिल, फिलिप्स रेडियो, उषा सिलाई-मशीन, पनामा सिगरेट, विलक्रीम, सन्फरॉइज्ड कपड़े, बाटा के जूते, बोर्नविटा आदि के प्रचार आपसे आँख-मिचौनी कर रहे हैं। यानी, सुबह से शाम तक आपकी आँखों के सामने, आपके कानों में ज्ञात या अज्ञात रूप से किसी-न-किसी वस्तु का प्रचार पहुँचाया जा रहा है, चाहे वह दैनिक पत्र हो या साप्ताहिक पत्रिका, चाहे वह रेडियो हो या टेलीविजन, चाहे सिनेमा हो या प्रदर्शनी-हर घडी, हर क्षण, विज्ञापन, आपका पीछा करता चल रहा है। आपके अस्तित्व को हर ओर से इसने घेर लिया। आपके मन-प्राणों पर यह इंद्रजाल-सा छा गया है। और आप विचार करें, तो लगेगा कि यह विज्ञान का युग नहीं, विज्ञापन का युग है। मानव के विधु-व्यक्तित्व को इस विज्ञापन-राहू ने ग्रस लिया है, 

उसकी साँसों पर हर क्षण यदि किसी का पहरा है, तो विज्ञापन का, उसकी चेतना पर यदि कोई मूच्छेना काम कर रही है, तो विज्ञापन की। हमारी दृष्टि यदि किसी ने पूरा तरह वर्णांध कर दी है, तो विज्ञापन ने, हमारी जिह्वा पर यदि किसी का जाप चलता है, तो विज्ञापन का। 

इस तरह, आधुनिक युग का यदि कोई सर्वाधिक उपयुक्त पर्याय है, तो विज्ञापनयुग। यदि आप विज्ञापन कला में विशारद हैं, तो सफलता आपके चरण चूमेगा। विज्ञापन द्वारा आप मिट्टी को सोना बना सकते हैं और सोने को मिट्टी। अच्छी-से-अच्छा पुस्तक कार हैं, यदि उनका विज्ञापन न हआ. अच्छा-से-अच्छा आविष्कार व्यथ ह, यादव विज्ञापन न मिला, अच्छा-से-अच्छा विचार व्यर्थ है, यदि उसे विज्ञापन ने नहीं छुआ 

अतः यदि आपने विज्ञापन के सारे स्रोतों को नारंगी की तरह निचोड़ लिया है, तो आपका सफलता निश्चित है। विज्ञापन के सम्मोहन से किसी का बच निकलना आसान नहीं। उसका मोहिनी से मुग्ध न होना किसी के लिए संभव नहीं। यही कारण है कि आज बड़ा-स-बड़ी कंपनियाँ विज्ञापन की नई-नई पद्धतियों का अन्वेषण करती हैं। उसक विशेषज्ञों पर रुपए पानी की तरह बहाती हैं। चित्र, कार्टून, मोहक अक्षर और बिजली का बत्ती, मूर्तियाँ, गुब्बारे, कैलेंडर आदि न मालूम कितने प्रकार से विज्ञापन किया जा रहा है। 

कभी किसी को ऊँट पर बैठाकर कभी डिब्बे का मकान बनाकर, कभी बोनों का जुलूस निकालकर विज्ञापन किया जाता है। कभी विधि-पद्धति से विज्ञापन किया जाता है, कभी निषेध-पद्धति से ‘सिगरेट पीना मना है; हाँ, विल्स फिल्टर भी।’ कभी किसी वस्तु को घटिया सिद्ध करने के लिए पाँच लाख इनाम घोषित किया जाता है, “तिलस्मी अंगूठी ! जब तक आप पहनेंगे, आपकी प्रियतमा अपर रूठी हो, तो आपकी बाँहों में फौरन चिपक जाएगी। और हाँ, तावीज! जब तक आपकी बाँहों में रहेगा, तब तक आपकी आमदनी बढ़ती रहेगी, जब तक आप पहने रहेंगे, तब तक तंदुरुस्ती बनी रहेगी।”

इस तरह न मालूम, कितने झाँसे, कितने हथकंडे, कितने फरेबी वाक्यों का सहारा लेना पड़ता है, ताकि विज्ञापन का जादू काम कर सके। कुछ कंपनियाँ तो विज्ञापन के लिए इतने नग्न बीभत्स चित्र प्रदर्शित करती हैं कि अनेक की वासनाएँ जागरित हो उठती हैं और वे उन वस्तुओं के क्रय के लिए विवश हो उठते हैं। 

किंत. विज्ञापन का केवल कृष्णपक्ष नहीं, शुक्लपक्ष भी है। विज्ञापन का अर्थ है, विशेष ज्ञापन–विशेष ज्ञान करा देना। यदि विज्ञापन न हो तो हमारा पर्याप्त अकल्याण हो सकता है। कैंसर की कोई नई औषधि निकली-विज्ञापन के बिना उसकी जानकारी न रहने से हम उसके लाभ से वंचित रह जाएँगे। इस प्रकार, नवीन-से-नवीन अनुसंधान स्थानीय रह जाएंगे. यदि उन्हें विज्ञापन का सहारा न मिला। यदि विज्ञापन न हो, तो नियक्तियों के रिक्त स्थानों का पता न चले, प्रोत्साहन के नए मार्ग न दिखें; ठेका. व्यवसाय और आपूर्ति के नए वातायन न खुलें। कोई इतिहास, दर्शन या साहित्य की ऐसी क्रांतिकारी पुस्तक निकली हो, जिससे विचारों में मंथन पैदा हो सकता के नए वातायन खुल सकते हों, सभ्यता की नई सड़क दीख सकती हो, मानव-मल्यों के एक नए चरण का ज्ञान हो सकता हो और मानव-संबंधों की अभिनव योजना हो सकती हो, तो उसका भी पता हमें विज्ञापन से ही चलता है। 

अतः और कला की सुरभि को फैलानेवाला गंधवाह है। यह हमारी पद्धतियों का विस्तार करनेवाला सहृदय है। यह माँग और पूर्ति के बीच सेतु है, वाणिज्य और व्यापार के धरे को गतिशील रखने के लिए ग्रीज है। यह वह पंख है, जिसपर अनुसंधान का समान आसानी से चलता है। यह उत्पादन की रीढ़ और आपणन की आधारशिला है। 

अतः, विज्ञापन अपने में श्वेत-श्याम कुछ नहीं है। यह तो मानवविवेक पर निर्भर करता है कि उसे हम किस पद्धति पर ले जाएँ। यदि हमने इसे धोखाधड़ी, मायाजाल, मृगमरीचिका तथा प्रवंचना का वाहन बनाया, तो मानव का अहित निश्चित है, किंतु यदि हमने इसे ज्ञान की परिधि विकसित करने, सहयोग बढ़ाने के साधन के रूप में काम लिया, तो इससे मानव का हित-ही-हित है। 

 

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