विद्युत बल्ब का आविष्कार कैसे हुआ-Vidyut bulb ka aavishkar kaise hua

विद्युत बल्ब का आविष्कार कैसे हुआ

विद्युत बल्ब का आविष्कार कैसे हुआ-vidyut bulb ka aavishkar kaise hua

कैसे बना विद्युत बल्ब?

विभिन्न पर्व-त्योहार, शादी-विवाह और समारोह के समय रात्रि में जब जगमग-जगमग करते रंग-बिरंगे बल्बों की मालाएं नजर आती हैं तो इन बल्बों के आविष्कारक वैज्ञानिक एडीसन की याद बरबस आ ही जाती है। 

कैसे बना विद्युत बल्ब?

यह सर्वविदित है कि बिजली के बल्बों के आविष्कारक के रूप में अमेरिका के वैज्ञानिक अल्वा ऐडीसन का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है, किंतु अमेरिका से सैकड़ों मील दूर स्थित इंग्लैंड के एक वैज्ञानिक जोसेफ विल्सन स्वान भी उसी समय बिजली के बल्ब के निर्माण में जी-जान से लगे हुए थे। किंतु इसे एक संयोग ही कहेंगे कि एडीसन ने इस क्षेत्र में बाजी मार ली और वह बिजली बल्ब के आविष्कारक बन गए। 

उस समय इन दोनों ही वैज्ञानिकों को यह तो मालूम हो गया था कि यदि किसी सुचालक धातु के पतले तंतु में बिजली प्रवाहित की जाए तो वह गर्म होकर दमकने लगता है, किंतु इनके सम्मुख सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बिजली के बल्ब में प्रयुक्त होने वाले इस सुचालक तंतु को ऐसी कौन-सी धातु से बनाया जाए, ताकि वह सामान्य तापमान पर भी पिघलकर गल नहीं पाए। 

एडीसन और स्वान दोनों की प्रकृति में पाए जाने वाली हजारों कुदरती चीजों से सुचालक तंतु ‘फिलामेंट’ बना-बना कर करीब दो वर्ष तक प्रयोग करते रहे, किंतु ज्योंही ‘फिलामेंट’ को किसी पतले कांच के खोल में बंद करके उसमें बिजली प्रवाहित करते तो वह ‘फिलामेंट’ सामान्य ताप पर ही पिघल कर जल जाता।

एडीसन ने तो अपने आसपास की प्रत्येक वस्तु को फिलामेंट बनाया और उसका प्रयोग किया, किंतु उसे सफलता नहीं मिली। जब करीब दो वर्ष के पश्चात् एडीसन ने एक दिन सूती धागे पर कार्बन लगे फिलामेंट का सर्वप्रथम प्रयोग कर सन् 1880 में व्यावसायिक स्तर पर बिजली के बल्बों का निर्माण भी शुरू कर दिया।

यद्यपि यह फिलामेंट भी ज्यादा नहीं चले, किंतु एक बार तो इन फिलामेंट से बने बल्बों को जलाकर विश्व के प्रमुख देशों में रोशनी की जाने लगी। प्रारंभ में बल्ब बनाने की तमाम प्रक्रियाएं हाथ से होती थीं और एक बल्ब तैयार करने में करीब दो सौ हाथों से गुजरना पड़ता था, इसलिए तब इन विद्युत बल्बों की कीमत भी कुछ ज्यादा ही थी। उस समय एडीसन का बल्ब ढाई डॉलर में और स्वान का बल्ब पंद्रह शिलिंग में बिकता था। 

आज स्वचालित मशीनों से एक घंटे में हजारों बल्ब बन जाते हैं और आज इन बल्बों में सूती धागों पर चढ़े कार्बन के फिलामेंट की बजाय टंगस्टन धातु के सुचालक तंतु का फिलामेंट इस्तेमाल किया जाता है, जो करीब 3400 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ही पिघलता है। टंगस्टन धातु के बने इस फिलामेंट की लंबाई 21 इंच होती है, जिसे कुंडलित कर बल्ब में लगाया जाता है।

ज्यादा वाट के बल्बों में फिलामेंट ज्यादा मोटाई का होता है। प्रायः इनकी मोटाई मिलीमीटर के सौवें हिस्से से लेकर हजारवें हिस्से तक होती है। यदि फिलामेंट का यह तंतु न टूटे तो एक बल्ब कोई एक हजार घंटे तक रोशनी दे सकता है। वास्तव में, बिजली का बल्ब लगभग दस फीसदी ऊर्जा को ही रोशनी में बदल सकता है।

आमतौर पर बिजली के बल्बों की रोशनी पीली होती है, किंतु छोटे बल्बों को रंगीन बनाने के लिए उनके भीतर पेंट की परत चढ़ाई जाती है। कुछ बल्बों में बाहर की सतह पर भी पेंट किया जाता है। बल्बों की माला को अपने आप जलाने-बुझाने के लिए माला में एक ‘मास्टर बल्ब’ लगाया जाता है। इस प्रकार बल्ब के निर्माण से रात के अंधेरे को कुछ हद तक कम करने में सफलता मिली।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

seventeen + two =