वेल्क्रो का आविष्कार किसने किया-Velcro kya hai

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 वेल्क्रो का आविष्कार किसने किया-Velcro kya hai

यह सन् 1948 की बात है। जॉर्ज डी. मिस्ट्रेल नामक एक स्विस इंजीनियर शिकार के लिए पहाड़ी जंगली इलाके में गया। वहाँ वह खूब घूमा-फिरा। घूमने के दौरान ही उसके मोजों तथा पैंट में बारीक बर व रेशे चिपक गए। उसने जब उन्हें निकालने की कोशिश की तो उसे काफी परेशानी | हुई। किंतु परेशान होकर खीझने के ‘बजाय वह घटना का अध्ययन करने लगा। 

उसने देखा कि हर रेशा एक लूप बनाकर उसके कपड़ों से चिपक गया है। वह सोचने लगा कि अगर ऐसा कपड़ा बना दिया जाए, जो आपस में एक-दूसरे से चिपक जाए तो सिलाई, बटनों, जिपर आदि की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। 

पर यह सोचना आसान था, करना कठिन। उसे दो प्रकार के कपड़ों की आवश्यकता थी-एक, जिसमें हुक हों और दूसरा, जिसमें लूप हौं। काफी ढूँढ़ने के बाद उसे एक ऐसा कपड़ा बुननेवाला मिला, उसकी आवश्यकतानुसार जो छोटा सा कपड़ा बुनने के लिए तैयार हो गया। 

जब पहला सैंपल मिला तो डी. मिस्ट्रेल ने उसपर प्रयोग किया और पाया कि यह काम करता है, पर ऐसा कपड़ा बड़े पैमाने पर बनाना अभी भी एक समस्या थी। डी. मिस्ट्रेल इसके लिए लगातार प्रयोग करता रहा और उसने कपड़ों पर भाप का प्रभाव, गरम हवा का प्रभाव, अल्ट्रासोनिक किरणों का प्रभाव डाला, गोंद लगाया, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। काफी शोध के पश्चात् उसे नायलॉन के धागे से बने कपड़े में लूप बनाने में सफलता मिल गई। इसके बाद उसे इन लूपों से काट-काट कर हुक तैयार करने में भी सफलता मिल गई। 

अब उसने एक मशीन बनाने की योजना शुरू की, जो इन लूपों-हुकों को तैयार करे। इस काम में उसे आठ साल लग गए। अब उसकी मशीन फटाफट ऐसा कपड़ा बनाने लगी। डी. मिस्ट्रेल ने अपने इस कपड़े का नाम ‘वेलक्रो’ रखा। वेलक्रो’  का अर्थ है वेलवेट और ‘क्रो’ अर्थात् क्रोचेट। फ्रांसीसी भाषा में छोटे हुकों को ‘क्रोचेट’ कहा जाता है। 

अब वेलको का प्रयोग तेजी से बढ़ने लगा। इसे आसानी से खोला और बंद किया जा सकता था। इसने बटनों और जिप का स्थान ले लिया। 

वेलक्रो वास्तव में एक अद्भुत चीज है। एक वर्ग सेंटीमीटर वेल्क्रो एक किलोग्राम तक का दबाव सह सकता है। यदि वेलको कपड़े पहनकर आदमी कूदकर ऐसी दीवार से चिपक जाए, जो वेलक्रो लूपवाली हो तो वह चिपककर लटका रह जाएगा। उसे छुड़ाने के लिए कई मजबूत साथियों की आवश्यकता पड़ेगी

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