वाराहमिहिर की जीवनी |Biography of Varahamihir in Hindi

वाराहमिहिर की जीवनी

वाराहमिहिर की जीवनी |Biography of Varahamihir in Hindi

 विश्वप्रसिद्ध ज्योतिषशास्त्री वाराहमिहिर का जन्म सन् 505 ई० को उज्जैन के कपिथ नगर में हुआ था। वाराहमिहिर का नाम मिहिर था। वे राजा विक्रमादित्य के दरबार में राजज्योतिषी थे। 

कहा जाता है, उन्हें ज्योतिष विज्ञान और खगोल विज्ञान का अत्यन्त | उच्चकोटि का ज्ञान प्राप्त था। 

वाराहमिहिर अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करके, आर्यभट्ट से प्रभावित होकर ज्योतिष विद्या अध्ययन में जुट गए थे। उन दिनों उज्जैन विद्या का केन्द्र माना जाता था। उन्होंने वहीं से शिक्षा प्राप्त की और वहीं पर वे विक्रमादित्य के राजदरबार में नवरत्नों की श्रेणी में आ गए। 

वाराहमिहिर वेदों के ज्ञाता थे। |साथ ही उन्हें खगोल विज्ञान व ज्योतिष विज्ञान का बहुत श्रेष्ठ ज्ञान था। उन्होंने पर्यावरण विज्ञान, जल विज्ञान और भू-विज्ञान पर भी काफी कार्य किया। अपने ज्ञान के आधार पर उन्होंने खगोल विज्ञान को अत्यन्त रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने सिद्धान्तकी वृहत्त सहिता, वृहज्वाल आदि ग्रन्थों की रचना की। 

वारहमिहिर का कथन था कि ज्योतिष विज्ञान एक अथाह सागर के समान है, जिसे पार कर पाना अत्यन्त कठिन है। उन्होंने जितनी भी पुस्तकों की रचना की, सभी को आज मानक ग्रन्थों के रूप में मान्यता प्राप्त है। पाठक इन पुस्तकों का अत्यन्त रुचि के साथ अध्ययन करते हैं और उनसे उच्च श्रेणी का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यही नहीं, आने वाले समय में भी वाराहमिहिर को भावी पीढ़ियां याद रखेंगी। 

वाराहमिहिर को वाराह की उपाधि मिलने के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है, जो इस प्रकार है- 

एक बार राजा विक्रमादित्य ने मिहिर से पूछा-“राजज्योतिषी जी, जरा गणना करके बताइए, हमारे राजकुमार की आयु कितनी है?” 

मिहिर ने गणना की, किन्तु मौन रहे। उनकी चुप्पी देखकर राजा विक्रमादित्य ने जानने की जिद की कि राजकुमार की आयु कितनी है? 

उनके जिद करने पर मिहिर ने विवश होकर कहा-“महाराज! मेरी ज्योतिष गणना के अनुसार राजकुमार मात्र अट्ठारह वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेंगे।” 

वाराहमिहिर के इस कथन पर राजा और रानी स्तब्ध रह गए। यद्यपि उन्हें मिहिर की बात बुरी लगी, किन्तु वे जानते थे कि मिहिर झूठ नहीं बोलते, उनकी बात में सत्यता होती है। 

धीरे-धीरे समय बीतता गया। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने मिहिर से कहा “हम अपने पुत्र का जीवन बचाने का भरसक प्रयास करेंगे।” 

किन्तु विधि के विधान के अनुसार जब राजकुमार अट्ठारह वर्ष का हुआ, तो एक जंगली सूअर ने उसे मार डाला। मिहिर की बात सत्य सिद्ध हुई। 

जब यह खबर राजा के पास पहुंची, तो उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें राजज्योतिष से इस बात का पहले ही पता चल चुका था। इधर मिहिर भी राजकुमार की मृत्यु से अत्यन्त शोकाकुल थे। 

तब राजा विक्रमादित्य ने मिहिर से कहा-“हे राजज्योतिष जी! मैं हार गया हूं और तुम जीत गए हो।” । 

इस पर मिहिर ने उत्तर दिया-“महाराज यह मेरी जीत नहीं है, बल्कि ज्योतिष और खगोल विज्ञान का सत्य है।” 

राजा विक्रमादित्य उनकी प्रतिभा से बहुत खुश थे। उन्होंने मिहिर को मगध राज्य का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘वाराह’ प्रदान किया। तभी से मिहिर वाराहमिहिर के नाम से प्रसिद्ध हो गए। 

More from my site

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

11 − 3 =