Upsc toppers essay in hindi-शिक्षा और सशक्तीकरण 

Upsc toppers essay in hindi

Upsc toppers essay in hindi-शिक्षा और सशक्तीकरण

सशक्तीकरण आज का ज्वलंत मुद्दा है-महिला सशक्तीकरण, दलित सशक्तीकरण आदि। सशक्तीकरण का अर्थ राजनीतिक महत्व बढ़ने से लिया जाता है, जैसे महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देकर उनका राजनैतिक महत्व बढ़ाने से। पर वास्तव में व्यक्ति और समुदाय के लिए राजनीतिक सशक्तीकरण पर्याप्त नहीं। कारण सामने है। वयस्क मताधिकार द्वारा सामान्य नागरिक को सशक्त बना दिया गया पर क्या वह वास्तव में सशक्त हो पाया है ? ऐसा हो इसीलिए तो चुनाव प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन की बात उठाई जा रही है। हम देख रहे हैं कि अगर व्यक्ति और समुदाय आर्थिक रूप से सशक्त नहीं है तो उसे खरीदा और भटकाया जा सकता है। और गहराई से सोचें तो समझ में आ जाएगा कि आर्थिक रूप से भी सशक्त लोग समझदारी, सरोकार और संकल्प स्पष्ट न होने से आसानी से भटकाए जा सकते हैं। इसलिए सबसे जरूरी तो होता है सांस्कृतिक सशक्तीकरण और इस मूल समस्या पर ध्यान नहीं  दिया जा रहा है। इसी सारभूत समस्या के निदान में शिक्षा की  निर्णायक भूमिका बनती है। 

व्यक्ति और समुदाय का सशक्तीकरण तभी संभव होता है जब राज्य और समाज उन्हें स्वतंत्र और समान समझें। वर्ष 1947 के पहले सारा देश अशक्त था, क्योंकि उसे राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। आजादी के बाद वह प्राप्त हो गई पर उसे चरिताथ करने के लिए अपने संविधान की जरूरत थी। वर्ष 1950 में वह भी मिल गया। उसके द्वारा सभी वयस्कों को मताधिकार मिल गया, सभी नागरिकों को मूल अधिकार मिल गए और सबका अवसर की समानता मिल गई। भारत जैसे विषमताग्रस्त समाज में परंपरागत रूप से वंचित और पिछड गए लोगों को अतिरिक्त अवसर प्रदान करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया ताकि उन्हें आर्थिक और सामाजिक समानता प्राप्त हो सके। देखा यह गया कि संवैधानिक समानता के बावजद यथार्थ में समाज में बहुतों को, जैसे नारियों को वास्तविक समानता नहीं प्राप्त है। उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए बिल लाया गया पर वह संसद में पास नहीं हो पा रहा है, क्योंकि सभी लोग आज भी समानता के पक्ष में नहीं हैं। 

“सक्तिीकरण चेतना का प्रान है जो व्यक्ति और समुदाय को अपना उत्तरोत्तर विकास करने का आधार और अवसर देता है।” 

दलित और पिछड़े लोगों को आरक्षण प्राप्त है पर क्या उन्हें सामाजिक सम्मान प्राप्त है ? क्या गरीब को सामाजिक सम्मान प्राप्त है भले ही वह ब्राह्मण क्यों न हो? इसका मतलब यह है कि राजनीतिक सशक्तीकरण प्राप्त हो जाना पर्याप्त नहीं। जब तक सामाजिक सम्मान न प्राप्त हो जाय। इसके लिए कांशीराम सत्ता में भागीदारी को समाधान मानते थे-हर कीमत पर । सत्ता में भागीदारी हो भी गई। तो क्या दलित वास्तव में सशक्त हुआ? कुछ हुए पर पूरा समाज ? वास्तविकता यह है कि दलित और पिछड़ों में ही नहीं पूरे समाज में एक ‘मलाईदार’ वर्ग पैदा हुआ है। वास्तव में उसी का सशक्तीकरण हो रहा है। दो टूक कहा जाय तो हमेशा से समाज में शासक समुदाय ही सशक्त होता रहा है। जनतंत्र के विकास के बाद हुआ यह है कि शासक समुदाय में नीचे से कुछ और लोग शामिल होते गए ह और सशक्त समदाय की संख्या बढ़ती जा रही है। पर वास्तव में समाज का सशक्तीकरण नहीं हो पा रहा है। 

यह तभी संभव है जब पूरे समाज में ऐसी चेतना विकसित हो जाये जो लोगों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान पैदा करे ताकि लोग अपने अधिकारों को जान सकें और उनके लिए संघर्ष कर सकें, साथ ही अपने कर्तव्यों का भी निर्वाह करते रहें। इसी मूलभूत समस्या के निदान में शिक्षा की अनिवार्य भूमिका है। 

शिक्षा वास्तव में मनुष्य को चेतनशील प्राणी बनाती है, और चेतना के ही कारण मनुष्य में आत्म-सम्मान और आत्म–विश्वास, दायित्व बोध, सौंदर्य-बोध, न्याय-बोध और विवेक पैदा होते हैं। तभी मनुष्य अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जान-समझ सकता है। ऐसी शिक्षा की सबसे बड़ी किताब और सबसे उपयोगी शिक्षक जीवन और जगत है। 

यहीं पर यह चिन्हित करना जरूरी है कि आज दी जा रही औपचारिक शिक्षा वास्तव में लोगों का सांस्कृतिक सशक्तीकरण करने में अक्षम होती जा रही है। सूचनाएं अधिक से अधिक ज्ञान देने तक सीमित हैं। दी गई शिक्षा ली गई या नहीं इसे जानने का मापक परीक्षा प्रणाली है जिसमें अब ‘ऑब्जेक्टिव’ प्रश्न पूछने का चलन बढ़ता जा रहा है। यह प्रणाली स्मृति को ही महत्व देती है-साफ कहें तो रटने, पर जोर देती है। आज विज्ञान ने स्पष्ट कर दिया है कि रटना मस्तिष्क के निम्नतर कामों में है और मनुष्य ने याद करने की ऐसी मशीनें बना ली हैं, जो सस्ती भी हैं, मस्तिष्क पर याद रखने का जोर नहीं भी डाला जा सकता है। दिमाग को उच्चतर काम करने का अभ्यास करने में लगाना चाहिए-जैसे निर्णय लेना, चयन करना, चिन्तन-मनन अन्वेषण करना आदि। 

ऐसी स्थिति में जब तक यह निरर्थक और भ्रामक परीक्षा प्रणाली, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली नहीं बदलती, अनौपचारिक और ऑडिओ वीडियो शिक्षा प्रणाली के माध्यम से शिक्षित अशिक्षित सभी को जीवन के लिए आवश्यक शिक्षा दी जा सकती है। उदाहरण के लिए हम उपभोक्ता समाज में रह रहे हैं। उसकी आलोचना अलग एक मुद्दा है। परंतु आज कल टी.वी. पर एक सरकारी विज्ञापन दिखाया जा रहा है ‘जागो ग्राहक जागो। यह उपभोक्ता के सशक्तीकरण का एक जरूरी और सफल उपाय है। इसी तरह के बहुत से विज्ञापन पर्यावरण के संबंध में लोगों को जागरूक करने के बारे में जरूरी काम कर रहे हैं। चुनाव के दिनों मतदाताओं को सचेत करने के लिए प्रचार मतदाता को सशक्त बनाते हैं। 

” शिक्षा वास्तव में मनुस्य को चेतनशील प्राणी बनाती है, और चेतना के ही कारण मनुय में आत्म-सम्मान और आत्म विवास, दायित्व-बोध, सौंदर्य-बोध, न्याय-बोध और विवेक-बोध पैदा होते हैं।” 

इस तरह सशक्तीकरण चेतना का प्रश्न है जो व्यक्ति और समुदाय को अपना उत्तरोत्तर विकास करने का आधार और अवसर देता है। सशक्तीकरण के लिए बाहुबल, धनबल या सत्ताबल पर्याप्त नहीं। एक बलशाली व्यक्ति किसी सींकिया पहलवान के घर चौकीदारी कर सकता है। कोई बहुत धनी आदमी किसी माफिया या पुलिस से आतंकित रह सकता है और कोई मंत्री भी किसी गुट के नेता के मातहत हो सकता है। ऐसे लोग अपनी शक्ति का समुचित इस्तेमाल नहीं कर पाते। वास्तव में सशक्तीकृत व्यक्ति और समुदाय अपनी शक्ति का समुचित इस्तेमाल कर अपने को और समाज को आगे ले जा सकते हैं। ऐसा हो इसके लिए जिस चेतना की आवश्यकता होती है वह शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। यह शिक्षा सूचनाओं और ज्ञान मात्र से नहीं प्राप्त हो सकती। इसके लिए आर्थिक आधार और राजनीतिक अधिकार अनिवार्य है पर इतना ही पर्याप्त नहीं। इसके लिए एक सांस्कृतिक जागरण ही राह दिखा सकता है। 

अंत में सशक्तीकरण जनतांत्रीकरण का परम लक्ष्य है पर जब तक यह पूरे समाज में घटित नहीं होता यानी जब तक कुछ व्यक्तियों और कुछ समुदयों की जगह पूरे समाज का सशक्तीकरण नहीं होता तब तक समाज में तनाव. विग्रह और संघर्ष चलता रहेगा। 

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