Upsc topper essay copy in hindi medium-कंप्यूटर और हिन्दी 

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Upsc topper essay copy in hindi medium- कंप्यूटर और हिन्दी 

सबसे पहले हम कंप्यूटर और हिन्दी की अलग-अलग अर्थवत्ता समझ लें, फिर उनके बीच के संबंध का भारत के लिए महत्व पर गौर करेंगे। 

यह तो निर्विवाद है कि कंप्यूटर मानव इतिहास में सबसे चमत्कारी आविष्कार है, इसलिए कि वह मानव-मस्तिष्क का ही विस्तार है। मानव मस्तिष्क प्रकृति की सबसे विवेकपूर्ण रचना है। वह संसार का जटिलतम और समर्थतम यंत्र है और अभी भी विकासमान है। वह क्या-क्या करने में समर्थ है, इसकी संभावनाएं भी उजागर होती जा रही हैं। कंप्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर में परिवर्तन की अनन्त संभावनाएं हैं। अब तो कंप्यूटर सर्विस सेक्टर के लिए भी अपरिहार्य हो गया है। शैक्षिक और बौद्विक क्षेत्रों में भी उसकी उपयोगिता ज्यों-ज्यों समझ में आ रही है, त्यों-त्यों उसका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। जब से लैपटाप और टैबलेट चुनावी मोहरा बना है वह युवाओं के भी पहुंच के अंदर आता जा रहा है। वैसे भी पांच-दस रुपए में साइबर कैफे, नेट-सर्विस उपलब्ध करा दे रहे हैं। 

पर हम यहां उसके मौजूदा इस्तेमाल से अधिक प्रभावित नहा है। अभी तो इसका इस्तेमाल बहत निचले स्तर पर ही हो रहा है। बहुतों के लिए तो वह टाइप राइटर मात्र है। कुछ के लिए विकसित कैलकुलेटर भी है। वह घरों में और बैंकों में आमदनी-खर्चों के लेखा-जोखा के रूप में भी इस्तेमाल हो रहा है। बहुतों के लिए वह इनडोर गेम का खजाना है या फिर अश्लील फिल्मों का अनन्त स्रोत। कुन्डली बनाने और अन्धविश्वास फैलाने में भी उसका उपयोग हो रहा है। पर ये सब तो कंप्यूटर के बाएं हाथ के खेल हैं। असल में क्या-क्या कर सकता है कंप्यूटर? 

वैसे तो सारा विज्ञान-विशेषकर भौतिकी और खगोलविज्ञान (Astronomy) आज कंप्यूटर पर निर्भर हो गया है। सूक्ष्म से सूक्ष्म और पल-पल के तथ्यों की विराटतम गणनाएं जो मानव मस्तिष्क के लिए दुष्कर और असंभव थीं, अब चुटकी बजाते संभव हैं। क्या आदमी ग्रह-नक्षत्रों की उसी तरह बात कर सकता था जैसे जंगल–पहाड़ों की, बिना कंप्यूटर की मदद के? विज्ञान के क्षेत्र में उसकी उपयोगिता और क्षमता के बारे में अधिकांशतः बातें ज्ञात हैं। इसलिए उन्हें छोड़ कर हम साहित्य-कला-विचार-दर्शन में उसके योगदान की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। 

कंप्यूटर की मदद से आज के संगीतकार संगीत की एक नई दनिया बसा रहे हैं, जिससे विश्व-संगीत की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं। चित्रकला के Vibgyor के सात रंगों का तो काफी पहले से पता था। अब एक रंग के बीसियों शेड्स और फिर उनमें भी न जाने कितने फ्यूजन संभव हो गए हैं। इसी तरह मर्तिकला और वास्तुकला में भी कंप्यूटर का इस्तेमाल बढ़ रहा है। साहित्यकला में मनुष्य की कल्पनाशीलता को मूर्त रूप देने में कंप्यूटर की भूमिका अभी तय होनी है। वैसे अभी भी तलनात्मक अध्ययन को तो उसने काफी आसान बना ही दिया है। विचार-दर्शन में तो मानव-मस्तिष्क बिना कंप्यूटर के भी कितना कछ करता रहा है। अब संरचनागत और भाषागत विचारों के क्षेत्र में विविध प्रयोग-शोध कंप्यूटर आसान कर रहा है। 

कुल मिलाकर कंप्यूटर मस्तिष्क का अपरिहार्य उपकरण और विस्तार बन गया है और मानव द्वारा रचना और संहार यानी उसकी सकारात्मक और नकारात्मक क्षमताएं अनन्त हो गई हैं 

अब जरा हिन्दी की स्थिति देख लें। हिन्दी अपने विविध रूपों में देश की एक तिहाई आबादी की मातृभाषा है और उससे अधिक लोगों द्वारा समझी जाती है। दुनिया के 22 देशों में लोग हिन्दी समझते-बोलते हैं। और यह जग जाहिर है कि व्यक्ति अपनी मातृ-भाषा के माध्यम से ही सबसे अधिक ग्रहण और अभिव्यक्त कर सकता है। भारत की विशेष स्थितियों और नीतिगत कमजोरियों के कारण ही भारत में अंग्रेजी का शर्मनाक वर्चस्व बना हुआ है और जनता भी अंग्रेजी के प्रति विभ्रम का शिकार है। परन्तु देर-सवेर भारत की अन्य भाषाओं सहित हिन्दी को जन माध्यम बनाए बिना भारत की पूरी रचनात्मक प्रतिमा का इस्तेमाल नहीं हो सकता। 

हिन्दी का इतिहास पीछे अमीर खुसरो और चंदवरदाई तक जाता है पर आज की हिन्दी यानी खड़ी बोली हिन्दी का इतिहास राष्ट्रीय आंदोलन के साथ-साथ चला है। इस राष्ट्रवाद के विकास में हिन्दी भी एक माध्यम बनी थी। कुछ लोग भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का प्रारंभ 1857 के महाविप्लव से मानते हैं तो कुछ लोग 1885 में राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन से। बहरहाल, हिन्दी खड़ी बोली में गद्य रचना भी 19 वीं सदी के अंतिम दशक में शुरू हुई। इस तरह आधुनिक हिन्दी का इतिहास अधिक से अधिक डेढ़ सौ साल का है। इतने समय में हिन्दी साहित्य ने अभूतपूर्व प्रगति की है। हम तुलना करें। अंग्रेजी भाषा की पहली साहित्यिक रचना चौदहवीं सदी में Canterbury Tales है। अंग्रेजी साहित्य का उत्कर्ष शेक्सपियर को मानें तो वह सोलहवीं सदी का अंत और सत्रहवीं का प्रारंभ है। यानी अंग्रेजी को अभिव्यक्ति के माध्यम के उत्कर्ष तक पहुंचने में करीब तीन सौ वर्ष लगे पर हिन्दी ने मुंशी इंशाअल्लाह खां से मुंशी प्रेमचंद तक पहंचने में सौ साल भी नहीं लगाए। पर एक अंतर है जो आज भी चुनौती बना हुआ है। अंग्रेजी अपनी प्रगति यात्रा के दौरान साहित्य ही नहीं, विज्ञान और समाज विज्ञान का भी माध्यम बनती गई। आज जब हम अंग्रेजी साहित्य की बात करते है तो केवल शेक्सपियर, मिल्टन, शेली, कीट्स और बर्नाड शा आदि का ही नाम नहीं लेते। अंग्रेजी वाङ्गमय में एडम स्मिथ, हाब्स, लॉक, डार्विन और हॉकिंस का भी नाम लेते हैं। हम हिन्दी क बारे में ऐसा ही नहीं कह सकते। हिन्दी में प्रेमचंद, निराला आर मुक्तिबोध जैसे साहित्यकारों का तो नाम लिया जा सकता है पर वैसे ही कुशल और ख्याति प्राप्त किसी वैज्ञानिक या समाज वैज्ञानिक का नाम नहीं ले सकते। हिन्दी अभी भी ज्ञान-विज्ञान की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम नहीं बन पाई है। 

भाषा सामाजिक उत्पाद है और सामाजिक चुनौतियों को आत्मसात करती हुई विकसित होती रहती है। यह बेहद उपयुक्त समय था कि आधुनिक हिन्दी और राष्ट्रीय आंदोलन का विकास साथ-साथ हो रहा था। वैविध्यपूर्ण देश में राष्ट्रीय एकता को चरितार्थ करने के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी को महत्व दिया गया। भारतेन्दु ने दो-टूक कहाः “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।’ गैर हिन्दी भाषी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सुब्रमण्यम भारती आदि ने हिन्दी के महत्व को चिन्हित किया और हिन्दी धीरे- धीरे सारे भारत में राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकृत होती गई। हिन्दी का असाधारण विकास हुआ। 

पर आजादी मिलने के बाद हिन्दी नकारात्मक राजनीति का शिकार होती गई और निहित स्वार्थों ने हिन्दी की प्रगति में बाधा पहुंचाने की कोशिशें कीं। यहां तक कि हर साल राष्ट्र भाषा दिवस मनाने की जरूरत पड़ती है फिर भी कोई उल्लेखनीय प्रगति होती नहीं दिखाई देती। 

कंप्यूटर और भूमंडलीकरण ने फिर हिन्दी के समक्ष एक चुनौती खड़ी कर दी है। अगर इस चुनौती का सामना हिन्दी-यानी हिन्दी के बुद्धिजीवी, हिन्दी प्रदेशों की सरकारें और केंद्र सरकार कर पाती हैं तो हिन्दी एक उच्च स्तर पर पहुंच सकती है। पर ऐसा होता नहीं देखाई दे रहा है। 

अभी तक हिन्दी का मुकम्मल ‘यूनीकोड’ तक विकसित नहीं हुआ। एक फान्ट में टाइप की हुई चीज दूसरे फान्ट में जाते ही अनर्थ का शिकार हो जाती है। हिन्दी के बुद्धिजीवी और साहित्यकार अक्सर शरमाने का नाटक करते हुए बताते हैं कि वे अभी भी कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं कर पाते यानी अभी भी | वे ज्ञान-विज्ञान के अनंत स्रोत से वंचित हैं। पता नहीं क्यों हिन्दी के बुद्धिजीवी और साहित्यकार स्वयं मान कर चलते हैं कि वे अंग्रेजी वालों के सामने दोयम दर्जे के हैं। जबकि हाल के दिनों में कंप्यूटर के माध्यम से हिन्दी के प्रयोग में आश्वस्तिदायक वृद्धि हुई है। 

कंप्यूटर एक यंत्र ही नहीं, एक मानसिकता, एक उपलब्धि और संभावना का सूचक है। इसे आत्मसात् और क्रियान्वित किए बिना हिन्दी के विकास में गुणात्मक परिवर्तन संभव नहीं। इसके लिए हिन्दी को समर्थ बनाने वाले ‘हार्ड’ और ‘सॉफ्टवेयर’ विकसित करना होगा और हिन्दी भाषियों को बौद्धिक तथा सांस्कृतिक अवसर का भरपूर इस्तेमाल करना होगा। 

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