Upsc nibandh lekhan-परंपरा और आधुनिकता 

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Upsc nibandh lekhan- परंपरा और आधुनिकता 

परंपरा और आधुनिकता परस्पर पूरक धारणाएं हैं-परस्पर विरोधी नहीं, जैसा कि उन्हें सामान्यतः समझा जाता है। उदाहरण के लिए भारतीय समाज को परंपरावादी कहा जाता है, यानी ऐसा समाज जो अतीतग्रस्त है और नवीनताओं को आसानी से स्वीकार नहीं करता। इसी तरह अमरीकी समाज को आधुनिक समाज माना जाता है, इस पूर्वग्रह के साथ कि वहां परपंरा का कोई सम्मान नहीं है। 

वास्तव में, देखें तो यह भ्रामक सरलीकरण है। भारत में परंपरागत खाप पंचायतों वाले हरियाणा के किसान भी कृषि में आधुनिक से आधुनिक परिवर्तनों को स्वीकार कर वहां तथाकथित कृषि क्रांति कर चुके हैं और अमरीका में अंतरिक्ष युग में जीने वाले भी 13 को अशुभ अंक मानते हैं और ढेरों आधुनिकता विरोधी सम्प्रदायों जैसे KuKlux Klan जैसी संकीर्ण नस्लवादी संस्था को जिलाए हुए हैं। उनके परंपरा प्रेम का यह हाल है कि अब वे तिरस्कृत और उत्पीडित आदिवासियों से भी जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। पर वास्तविकता यह है कि एक ही देश-काल में कुछ लोग परिवर्तनकामी, कुछ यथास्थितिवादी, तो कुछ कभी कुछ तो कभी कुछ और, मानते होते हैं। इसलिए दोनों धारणाओं को ठीक से समझ कर ही उनके बीच के संबंध पर गौर करें। 

हर समाज अपनी आवश्यकता और देश काल तथा समय के मर्म के अनुसार नए आचार-विचार-व्यवहार विकसित करता है। समय परिवर्तनशील है और हालात बदलते रहते हैं। इसलिए अतीत की कुछ बातें अनावश्यक और अप्रासंगिक होती जाती हैं जो अब आवश्यक नहीं उसे छोड़ जो जरूरी और कारगर या प्रेरणास्पद है उसे समाज स्वीकारते हुए पुरानी बातों में आवश्यक परिवर्तन करता रहता है। इस तरह अतीत से बदलता हुआ एक प्रवाह बना रहता है। इसे ही परंपरा कहते हैं-यानी परंपरा में पुराने और नए का समन्वय प्रवाहित रहता है। जब कुछ लोग अपने निहित हितों के लिए परंपरा में आवश्यक और अनिवार्य परिवर्तन भी नहीं होने देते तो वहपरंपरा नहीं रूढ़ि बन जाती है और समाज के विकास को अवरुद्व करती रहती है, और कभी-कभी घातक भी सिद्ध होती है। उदाहरण के लिए धर्मों का विकास एक समाज की आवश्यकतानुसार होता है। जब धर्म में देश-काल के अनुसार आवश्यक परिवर्तन नहीं होते तो वह रूढ़िग्रस्त हो जाता है और समाज की प्रगति में बाधा बनता जाता है। 

उसी समय कभी-कभी समाज में प्रतिरोधी या सुधार आंदोलन पैदा होते हैं। जैसे भारत में गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी द्वारा प्रवर्तित बौद्ध और जैन धर्म । इसी तरह यूरोप में आधुनिक काल के प्रारंभ में मार्टिन लूथर द्वारा जर्मनी तथा काल्वै द्वारा फ्रांस में शुरू किया गया ‘प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार आंदोलन।’ ऐसे प्रयासों से धर्म की रूढ़ियां टूटी थीं और समाज पहले से अधिक गतिमान हो गया था। पर कुछ लोगों द्वारा परिवर्तन का विरोध किया जाता है, शुद्धता के नाम पर। ऐसे में पुराना धर्म और भी कट्टर हो जाता है। इस तरह परंपरा और परिवर्तन में द्वंद्व शुरू हो जाता है जो आज तक जारी है। 

अब आधुनिकता को लें तो माना यह जाता है कि आधुनिकता पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में यूरोप में पुनर्जागरण के साथ शुरू हुई। पुनर्जागरण काल में धर्म-केंद्रिता के स्थान पर मानव-केंद्रिता बढ़ती गई। नई शिक्षा और मानववाद का प्रादुर्भाव हुआ। तर्क विवेक और विज्ञान का प्रभाव बढ़ने लगा। राज्य और धर्म के क्षेत्र अलग-अलग हो गए और सेक्युलरिज्म (पंथनिरपेक्षता) या कहें कि सांसारिकता का युग प्रारंभ हुआ। इस तरह समाज में नई प्रवृत्तियां, नई मानसिकता, नई संस्थाएं और नये जीवन-मूल्य विकसित हुए। कुल मिलाकर आधुनिकता उस परिवर्तन को कहा गया जिसके कारण समाज में पूंजीवाद, राष्ट्रवाद, जनवाद और विज्ञानवाद का वर्चस्व कायम होता गया। इससे समाज के आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक जीवन में भारी परिवर्तन हुए जिन्हें कभी-कभी क्रांतिकारी परिवर्तन भी कहा जाता है। ऐसा लगता है जैसे क्रांति परंपरा से विच्छेद के बाद ही होती है। 

ऐसा कई बार होता है कि आधुनिकता और क्रांति के आवेग में विस्फोटक और विध्वसंक परिवर्तन होते हैं और लगता है परंपराएं नष्ट हो गईं। पर गौर से देखें तो आधुनिकता और उसका सबसे उग्र रूप क्रांति भी सारी परंपराओं को नष्ट नहीं कर पाती। 

हम इस स्थिति को उदाहरणों के माध्यम से समझें तो बात एकदम स्पष्ट हो जाएगी। आधुनिक काल की सबसे बड़ी लाक्षणिकता मानवकेंद्रिता है जिससे मानववाद का प्रादुर्भाव हुआ। पर क्या केन्द्र में आने के बाद मानव ने धर्म का पूरी तरह तिरस्कार और बहिष्कार किया? नहीं, बस धर्म में आवश्यक सुधार किए गए। 

 इसी तरह परिवर्तन का सबसे आवेगपूर्ण और आवेशमय उदाहरण फ्रांस की क्रांति थी। उस समय राजसत्ता पर कब्जा कर पूंजीवाद अपने आर्थिक वर्चस्व की पुष्टि करना चाहता था। क्रांति द्वारा उसने ऐसा कर भी लिया। फ्रांस ही नहीं सारी दुनिया में पूंजीवाद का वर्चस्व कायम होता गया। पर क्या सामंतवाद का पूरी तरह विनाश हो पाया? श्रेणीबद्धता और असमानता सामंतवाद की सबसे उजागर लाक्षणिकताएं हैं। क्या वे समाप्त की जा सकी हैं? क्या आज भी राजतंत्र और धर्म कायम नहीं हैं? सारी आधुनिकता के बावजूद क्या समाज के लिए सबसे घातक पितृसत्ता और श्रेणीबद्धता (मनुवाद) पूरी तरह सारी दुनिया में कायम नहीं हैं? 

इस तरह हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि आधुनिकता और उसका सबसे सघन आग्रह क्रांति भी रूढ़ियों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाती। इससे यह साबित होता है कि परंपरा का चरित्र अनश्वर है। यह विश्लेषण परंपरा और आधुनिकता के बीच द्वन्द्व की स्थिति पर लागू होता है। अब हम यह देखें कि दोनों के बीच कोई द्वन्द्व है भी कि नहीं। 

सारी परंपराओं का आधुनिकीकरण होता रहता है और आधुनिकता में परंपरा प्रवाहित रहती है। परंपरा और आधुनिकता के बीच स्वस्थ संबंध का सबसे उल्लेखनीय उदाहरण ब्रिटेन है। एक तरह से वहां आधुनिकता का जन्म हआ और परंपरावादी निहित हितों ने पग-पग पर उसका विरोध किया। पर धीरे-धीरे आधुनिकता की जड़ें जमती गईं और परपराआम परितर्वन होता गया। वहां ‘क्राउन’ (मकट) यानी शासक का इंग्लैंड, स्काटलैंड और वेल्स के एकीकारण का प्रतीक माना जाता है। राजतंत्र की इस परंपरा को आज भी जरूरी माना जाता है, पर एक परिवर्तित रूप में। आज शासक के पास इतनी भी शक्ति नहीं कि वह जहां जाना चाहे जा सके या अपनी मर्जी से विवाह कर सके। उसके सारे अधिकार प्रधानमंत्री और संसद ने ले लिए हैं। पर एकता की परंपरा को बनाए रखने के लिए वह नाम मात्र का शासक बना हुआ है। परंपरा भी कायम है और आधुनिकता भी। 

भारत के संदर्भ में यदि धर्म जैसे नितांत परंपराग्रस्त क्षेत्र से उदाहरण लें तो देख सकते हैं कि तीर्थाटन और दान-दक्षिणा की परंपरा आज भी जारी है। पर तिरुपति जैसे सर्वाधिक लोकप्रिय तीर्थ स्थान में दान का एकदम आधुनिक इस्तेमाल होने लगा है। चढ़ावा में मिलने वाले सारे धन का सरकारी नियंत्रण में एक ट्रस्ट संचालन करता है और उस धन से शिक्षा संस्थान चलते हैं। यहां तक कि वहां चढ़ाए जाने वाले बाल से व्यापार होता है। बाल का निर्यात विग’ यानी नकली केश सज्जा के लिए होता है। 

भारत में प्रायः आधुनिकता और परंपरा को साथ-साथ देखा जा सकता है, मसलन परमाणु परीक्षण के समय नारियल फोड़ना, गाड़ी स्टार्ट करते समय प्रणाम करना, न्यायपीठ की स्थापना के समय हवन करना आदि। 

यह सकारात्मक और सर्जनात्मक प्रक्रिया है। जब परंपरा या आधुनिकता का अतिरेक होता है और एक-दूसरे को परस्पर विरोधी बना दिया जाता है तो समाज में विकृति पैदा होने लगती है और व्यापक समाज का भारी नुकसान होता है। 

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