Upsc Nibandh in Hindi-दक्षता विकास और हमारी शिक्षा व्यवस्था 

Upsc Nibandh in Hindi

Upsc Nibandh in Hindi दक्षता विकास और हमारी शिक्षा व्यवस्था 

दक्षता विकास हमें आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होता है, अतः यह हमारी शिक्षा व्यवसाय का अभिन्न अंग होना चाहिए। यह तथ्य सर्वविदित है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था दोषपूर्ण है। इस शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह है कि न तो इसमें व्यावसायिकता का संस्पर्श है और न ही दक्षता और कौशल का पुट। यही कारण है कि हमारी आज की शिक्षा व्यवस्था पढ़े-लिखों एवं डिग्री धारकों को आत्मनिर्भर बना पाने में सफल नहीं हो रही है। डिग्री धारकों की संख्या तो निरंतर बढ़ती जा रही है, किंतु इनमें से आत्मनिर्भरता प्राप्त करने वालों का स्तर न्यून है। यही कारण है कि देश में डिग्रीधारी बेरोजगारों की फौज बढ़ती ही जा रही है, जिन्हें हम ‘शिक्षित बेरोजगारों’ के रूप में अभिहित करते हैं। यह कहना असंगत न होगा कि देश में बेरोजगारी की भयावह हो चुकी समस्या के लिए हमारी वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक जिम्मेदार है। इसमें बदलाव की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। जरूरत इसे दक्षता विकास से जोड़कर समयानुकूल बनाने की है। 

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि इस शिक्षा व्यवस्था के बल बूते पर यदि कुछ युवा रोजगार पा भी जाते हैं, तो उन्हें अपनी पसंद एवं अपनी योग्यता के अनुरूप कार्य नहीं मिलता है। उच्च शिक्षित होते हुए भी उन्हें नीचे के पदों पर कम वेतनमान पर काम करना पड़ता है, जिससे उनके मन में हीन ग्रंथियां पनपना स्वाभाविक है। अपनी रुचि एवं अपेक्षाओं के प्रतिकूल काम करना ऐसे शिक्षित युवकों की आवश्यकता होती है। इससे सामाजिक असंतोष बढ़ता है। 

यह अत्यंत खेद का विषय है कि औपनिवेशिक काल में बाबुओं की खेप तैयार करने के लिए शिक्षा व्यवस्था का जो ढांचा लार्ड मैकाले ने तैयार किया था, उसमें आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम कोई आमूलचूल सुधार न कर पाए। यही वजह है कि कोई मूलभूत परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी विकृतियां एवं दोष तथा इसके नकारात्मक प्रभाव यथावत न सिर्फ बने रहे, बल्कि धीरे-धीरे इनका दायरा बढ़ता गया। आज की स्थिति अत्यंत विकट है। हमारे देश में स्कूल-कॉलेज जैसी व्यवस्थित प्रणाली के माध्यम से ज्ञान तो दिया जा रहा है, किंतु इसमें आत्मनिर्भर बनाने वाले कौशल एवं दक्षता जैसे अवयवों का नितांत अभाव है। यही कारण है कि बढ़-चढ़कर शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल करने वाले उच्च शिक्षितों तक को जीविकोपार्जन के मोर्चे पर विफल होते देखा जा रहा है। 

“यह अत्यंत खेद का विषय है कि औपनिवेशिक काल में बाबुओं की खेप तैयार करने के लिए शिक्षा व्यवस्था का जो ढांचा लार्ड मैकाले ने तैयार किया था, उसमें आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम कोई आमूलचूल सुधार न कर पाए।” 

हम आजादी के इतने वर्षों बाद भी अपनी शिक्षा प्रणाली में उस सृजनशीलता का विकास नहीं कर पाए, जो रोजगार में सहायक बनती और शिक्षित युवकों को आत्मनिर्भर बनाती। आजादी के तुरंत बाद से हमारी शिक्षा व्यवस्था में मूलचूल परिवर्तन किए जाने की न सिर्फ आवश्यकता महसूस की जाती रही, अपितु इस प्रकार का परिवर्तन किए जाने की पैरोकारी शिक्षक, अभिभावक एवं प्रबद्ध वर्ग द्वारा भी की जाती रही। इसके बावजूद हम शिक्षा व्यवस्था में सुधारों की पहल में पिछड़ गए। जो पहले की भी गईं, वे इतनी अव्यावहारिक थीं कि इनका उलटा प्रभाव पड़ा। इनसे सृजनशीलता का विकास तो नहीं हुआ, उलटे छात्रों एवं अभिभावकों पर निरर्थक बोझ ही बढ़ा। 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि हमने शिक्षा व्यवस्था को नंबरों का खेल बना डाला, जिससे छात्रों में बजाय सृजनशीलता, दक्षता एवं कौशल का विकास होने के, उन पर शत-प्रतिशत अंक लाने का दबाव बढ़ता गया। अंकों का आंकड़ा बढ़ाने की न सिर्फ होड़ बढ़ती गई, बल्कि यह छात्रों की मजबूरी भी बन गई। यदि छात्र अधिक-से अधिक अंक न बटोरें तो आगे की कक्षाओं में प्रवेश ही न मिले। इसके लिए अभिभावकों का भी उन पर दबाव रहता है। अब जरा सोचिए कि प्राप्तांकों की इस होड़ में फंसा आज का छात्र कौशल या दक्षता विकास के लिए कब और कैसे समय निकाले। यह प्रश्न सहज और स्वाभाविक है कि क्या इस व्यवस्था में नए दौर के युवकों में किसी दक्षता का विकास संभव है और वह भी आज की औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप? आज का मध्यवर्गीय युवा पढ़-लिखकर नौकरी के सिवा किसी अन्य विकल्प के बारे में सोच ही नहीं पाता है। ऐसे में प्राप्तांकों की होड़ में अपनी ऊर्जा को खपाना उसकी मजबूरी बन चुका है। वह कौशल विकास को भूल चुका है, जबकि कौशल विकास आज के दौर की अनिवार्यता है। 

वैश्विक स्पर्धा में आगे रहने, देश के विकास एवं मजबूती के लिए तथा देश के युवकों के बेहतर भविष्य के लिए वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का समय आ गया है। समय की जरूरत है कि हम न सिर्फ दक्षता विकास को प्रोत्साहन दें, बल्कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली के ढांचे में बुनियादी बदलाव लाएं। यह काम बहुत आसान नहीं है, क्योंकि थोड़े-बहुत बदलावों से काम चलन वाला ना इतनी पुरानी एवं लगभग निरर्थक शिक्षा प्रणाली का पूरा चेहरा चरित्र बदलने की आवश्यकता है। यह थोड़ा कठिन काम है कि जरूरी भी। यदि हम यह बदलाव नहीं ला पाए, तो समय के सात चल नहीं पाएंगे। समय के साथ न चल पाने का अर्थ तो आप भलीभांति समझते ही होंगे। 

शिक्षा के दौरान ही दक्षता विकास पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, जो कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली के बलबूते पर संभव नहीं है, क्योंकि नंबरों के खेल के इर्द-गिर्द सिमटी इस शिक्षा प्रणाली में दक्षता एवं कौशल विकास की कहीं कोई गुंजाइश भी नहीं है। इसका रेखांकन हम पहले भी कर चुके हैं। यदि हम यह सोचें कि पाठ्यक्रम में दक्षता विकास के लिए थोड़े-से हेर-फर से काम चल जाएगा, तो हमारा ऐसा सोचना न तो सही है और न ही व्यावहारिक ही है। शिक्षा व्यवस्था को समयानुकूल एवं रोजगारपरक बनाने के लिए पाठ्यक्रम एवं शिक्षा व्यवस्था में पूर्ण बदलाव तो लाना ही होगा, साथ ही उद्यमिता की भावना को भी इसके साथ जोड़ना होगा। हमारे देश में अब तक जो शिक्षा व्यवस्था चलती आई है, उसकी एक नकारात्मक देन यह है कि उसने थोथे ज्ञान को प्रदान कर उद्यमिता की भावना का इस हद तक विलोपन किया कि हमारा युवा, विशेष रूप से शिक्षित युवा उद्यमिता की भावना से विमुख हो गया। वह बाबू या चपरासी या इससे ऊपर की नौकरियां तो पाना चाहता है, किन्तु उद्यम नहीं करना चाहता। ऐसी स्थिति में शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के साथ-साथ मानसिकता में बदलाव लाना भी जरूरी है। जब तक उद्यमिता की भावना का विकास नहीं होगा, तब तक दक्षता विकास के भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकेंगे। जब उद्यमिता का भावना विकसित होगी, दक्षता से युक्त शिक्षा मिलेगी, तब उद्यमशीलता एवं सृजनशीलता दोनों बढ़ेगी। इन दोनों का समन्वय लाभकार परिणाम देगा। 

“वैश्विक स्पर्धा में आगे रहने, देश के विकास एवं मजबूती के लिए तथा देश के युवकों के बेहतर भविष्य के लिए वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का समय आ गया है। समय की जरूरत है कि हम न सिर्फ दक्षता विकास को प्रोत्साहन दें, बल्कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली के ढांचे में बुनियादी बदलाव लाएं।”

वर्तमान युग औद्योगिक युग है। शिक्षा में दक्षता विकास को प्रोत्साहित कर हम उद्योग को अभीष्ट आयाम दे सकते हैं। हमारे उद्यमशील एवं दक्ष युवा उद्योगों को विस्तार देकर देश के आर्थिक विकास में केन्द्रीय भूमिका निभा सकते हैं। एक तरफ तो वे आत्मनिर्भर बन कर देश के आर्थिक विकास में योगदान करेंगे, तो दूसरी तरफ नौकरियों पर उनकी निर्भरता खत्म होगी। हमने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक पहचान दिलाने के उद्देश्य से ‘मेक इन इंडिया’ नामक जिस वैश्विक पहल का आगाज किया है, उसका प्रमुख उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति में भारत का युवा अप्रतिम भूमिका निभा सकता है। युवकों की भूमिका को सार्थक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें दक्ष एवं उद्यमशील बनाया जाए। यह काम शिक्षा के स्तर पर, शिक्षा के दौरान ही हो सकता है। हमें यह सूरत बनानी होगी और इसके लिए एक मजबूत अधोसंरचना वाली उस शिक्षा व्यवस्था को स्थापित करना होगा, जिसमें दक्षता विकास को वरीयता दी जाए। 

किसी भी देश के दीर्घकालिक विकास एवं सुदृढ़ स्थिति के लिए पहली जरूरत इस बात की होती है कि उस देश की शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो तथा उसमें ‘दक्षता का विकास’ अनिवार्य रूप से सम्मिलित हो। भारत के विकास के लिए अब वह समय आ गया है कि हम दक्षता विकास को प्रोत्साहन देने के साथ शिक्षा के ढांचे में बुनियादी बदलावों की पहल करें। पहलें होती दिख भी रही हैं। अच्छे दिनों को हम भविष्य में नजदीक होते देखेंगे। 

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