Upsc ka nibandh in hindi | कानून के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन | व्यवहार परिवर्तन में कानून की भूमिका

Upsc ka nibandh in hindi

Upsc ka nibandh in hindi | कानून के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन | व्यवहार परिवर्तन में कानून की भूमिका (Social Change Through Law) 

कानून किसी भी तरह के समाज की इच्छा का प्रतिबिंब होता है यदि आप किसी भी समाज का अध्ययन करना चाहते हैं, तो आपको उस समाज द्वारा बनाए गए कानूनों का अध्ययन करना होगा और इसके पश्चात आपको पता चल जाएगा कि समाज की गति अग्र है या पश्च है। दरअसल, इस पहलू के दो तरीके हैं। अपनी आवश्यकताओं के अनुसार, “कानून द्वारा समाज को बदलना’ और “समाज द्वारा कानून को बदलना”। ध्यातव्य है कि जब कानून समाज को बदलता है तो यह किसी भी क्षेत्र में समाज के विकास की शुरुआत का संकेत है। जब समाज कानून बदलता है, तो यह उस समाज की परिपक्वता का संकेत है। भारत के सन्दर्भ में बात करें तो हम अपने राष्ट्र के नागरिकों के प्रतिरोध को ‘निर्भया’ के मामले में देख सकते हैं. जहां आम जनता इस बात पर चर्चा कर रही थी कि कानून कैसा होना चाहिए, सजा क्या होनी चाहिए आदि, और इसने सरकार को जन भावनाओं पर विचार करने के लिए मजबूर किया। 

विधिक सुझाव देने के लिए एक आयोग की स्थापना की गयी और अंततः आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम अस्तित्व में आया। 

यह दूरदर्शितापूर्ण है कि भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार डॉ भीम राव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 368 को संविधान में सम्मिलित किया, जो यह प्रावधान करता है कि “संविधान के मूल ढांचे को नष्ट करने के अलावा उपयुक्त प्रक्रिया अपनाकर संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है। विभिन्न विधिक शोधकर्ताओं के अनुसार, कानून सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है, लेकिन कई बार सामाजिक परिवर्तन कानून बन जाता है। भारत में विधिक बदलाव के मुख्यतः दो स्रोत विद्यमान हैं जो कानून में बदलाव करते हैं। पहली है विधायिका जहां नए कानून बनाए जाते हैं या पुराने अधिनियमों में संशोधन किए जाते हैं जो समय की आवश्यकता के अनुरूप हैं। दूसरी संस्था हमारी न्यायपालिका है। 

गुलामी और बंधुआ श्रम प्रणाली का उन्मूलनः 1843 में भारत से गुलामी को हटाने के लिए, भारतीय दासता अधिनियम पारित किया गया था जिसमें घोषित किया गया था कि दासता भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 370, 371 द्वारा अपराध है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 23, तस्करी से रक्षा का प्रावधान करता हैं |

सती प्रथा भारत में प्राचीन हिन्दू समाज की एक घिनौनी एवं गलत प्रथा है। इस प्रथा में जीवित विधवा पत्नी को मृत पति की चिता में जिंदा ही जला दिया जाता था। ‘सती’ (सती, सत्य शब्द का सीलिंग रूप है) हिंदुओं के कुछ समुदायों की एक प्रथा थी, जिसमें हाल में ही विधवा हुई महिला अपने पति के अंतिम संस्कार के समय स्वयं भी उसकी जलती चिता में कूदकर आत्मदाह कर लेती थी। इस शब्द को देवी सती (जिसे दक्षायनी के नाम से भी जाना जाता है) से लिया गया है। देवी सती ने अपने पिता राजा दक्ष द्वारा उनके पति शिव का अपमान न सह सकने के कारण यज्ञ की अग्नि में जलकर अपनी जान दे दी थी। यह शब्द सती अब कभी-कभी एक पवित्र औरत की व्याख्या करने में प्रयुक्त होता है। यह प्राचीन हिन्दू समाज की एक घिनौनी एवं गलत प्रथा है। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को मिटाने के लिए भी प्रयत्न किया। उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन समाचार पत्रों तथा मंच दोनों माध्यमों से चला। इसका विरोध इतना अधिक था कि एक अवसर पर तो उनका जीवन ही खतरे में था। वे अपने शत्रुओं के हमले से कभी नहीं घबराये। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण लार्ड विलियम बैंटिक 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सके। 

विधवा विवाह से तात्पर्य ऐसी महिला से विवाह है जिसके विवाह के उपरांत उसके पति का देहांत हो गया हो और वह वैध्वय जीवन व्यतीत कर रही हो। कुलीन वर्गीय ब्राह्मणों में यह व्यवस्था थी कि पत्नी के निधन हो जाने पर वह किसी भी आयु में दूसरा विवाह कर सकते हैं। यह आयु वृद्धावस्था भी हो सकती थी। पत्नी के रूप वह किशोरवय लड़की का चयन करते थे और जब उनकी मृत्यु हो जाती थी तो उस विधवा को समाज से अलग कर उसके साथ पाश्विक व्यवहार किया जाता था। जो महिलाएं इस तरह के व्यवहार को सहन नहीं कर पाती थीं, वह खुद को समर्थन देने के लिए वेश्यावृत्ति की ओर कदम बढ़ा लेती थीं। विधवा विवाह को बेहद घृणित दृष्टि से देखा जाता था। इसी कारण बंगाल में महिलाओं विशेषकर बाल विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर महिलाओं की हालत को परिमार्जित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। अक्षय कुमार दत्ता के सहयोग से ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिंद समाज में स्थान दिलवाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके प्रयासों द्वारा 1856 में अंग्रेजी सरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर इस अमानवीय मनुष्य प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की कोशिश की। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया था। 

भारतीय कारखानों अधिनियम 1881 ने बाल श्रम के लिए न्यूनतम आयु के रूप में सात वर्ष निर्धारित किए गए, जिससे उन्हें प्रति दिन अधिकतम नौ घंटे काम करने की अनुमति मिली। फैक्ट्रीज एक्ट 1948 अब भी लागू है। इस अधिनियम की धारा 67 में 14 साल से कम उम्र के बच्चों के कारखाने में रोजगार पर प्रतिबंध है। 

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार को सुनिश्चित करने की ही एक वैधानिक कोशिश है। इसके मुख्य बिंदु हैं 

6 से 14 वर्ष तक की आयु के हर बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक अपने घर के पास स्थित स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। 

सरकारी मदद पाने वाले निजी स्कूलों को कमजोर वर्गों और पिछड़े तबके के 25 फीसदी बच्चों को प्रवेश देना होगा। निजी गैर अनुदानित स्कूलों को छोड़कर सभी स्कूलों का प्रबंधन स्कूल प्रबंधन कमेटियों द्वारा किया जाएगा, जिसके 75 फीसदी सदस्य छात्रों के माता-पिता और पालक होंगे। 

उपर्युक्त कानूनों से निश्चित रूप से सामाजिक बदलाव आये। इसके अतिरिक्त जनहित याचिकाओं के माध्यम से राष्ट्रीय महत्व के -विषयों को प्रकाश में लाया जा सकता है। इसी क्रम में समलैंगिकता को अपराध से बाहर करना, तीन तलाक को खत्म करना, इच्छामृत्यु की अनुमति आदि ऐसे विधिक प्रावधान है जिनसे निश्चित रूप से सामाजिक परिवर्तन होगा। 

हालांकि इन कानूनों के बावजूद आज भी हिंदुस्तान में विधवाओं के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार, दलितों के साथ भेदभाव, महिलाओं के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया जाता रहा है। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि कानुनी सुधारों के माध्यम से हमारे समाज को अधिक समता मूलक बनाने में मदद मिली है। उम्मीद की जानी चाहिये कि ये विधिक प्रावधान हमारे समाज के ज्ञान चक्षु को खोलेंगे एवं एक खूबसूरत समाज बनाने में मदद करेंगे। 

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