Upsc ka essay in hindi-बड़े बांधों की सार्थकता 

Upsc ka essay in hindi-

Upsc ka essay in hindi-बड़े बांधों की सार्थकता 

जहां तक बड़े बांधों का प्रश्न है, विश्वस्तर पर किए गए सभी अध्ययन इसके विपक्ष में ही मत देते हैं। फ्रेड पियर्स की पुस्तक दियां, बांध तथा भावी जल संकट’ में कहा गया है कि चीन में 1949 से अब तक बने बड़े बांधों से लगभग सवा करोड़ लोग विस्थापित हुए हैं। बड़े बांधों का शुरू से ही विरोध करने वाले भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा तथा मेधा पाटकर के अनुसार पिछले चार दशकों में बड़े बांधों के संबंध में किए गए सभी अध्ययन यही सिद्ध करते हैं कि बांध विकास के मंदिर नहीं बल्कि विनाश के श्मशान हैं। मेधा पाटकर के अनुसार वर्तमान शताब्दी के उत्तरार्ध में देश में बड़े बांधों के दुष्परिणाम सामने आने लगेंगे। देश में उपजाऊ भूमि का एक बड़ा भाग इन बांधों के डूब क्षेत्र में होगा। बांधों के जलाशयों में गाद भर जाने के कारण जल विद्युत का उत्पादन कम हो जायेगा तथा आसपास की भूमि लवणीकृत और दलदली हो जायेगी। 

विश्व बांध आयोग का मानना है कि बड़े बांध चाहे जिस उद्देश्य से बनाए गए हों, वे अपने लक्ष्य को पाने में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं। उन बांधों के लाभ तो और भी कम हैं जो बहुउद्देशीय प्रयोजनों से बनाए गए हैं। आयोग के अनुसार बड़े बांध निश्चित समयावधि में पूरे नहीं हो पाते और इनकी लागत लगातार बढ़ती है। आयोग का मानना है कि ऊर्जा और सिंचाई के लिए अब दूसरे विकल्पों की तलाश करना आवश्यक हो गया है क्योंकि बड़े बांधों के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव इनसे प्राप्त हाने वाले लाभ से कहीं अधिक है। पयावरण और बांध नामक एक अध्ययन में खुलासा किया गया है कि वर्षों के अनुसंधान और बहसों के बाद यही निष्कर्ष सामने आया कि बाधों ने जहां मानव जाति के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा काह वहीं करोड़ों लोगों के विस्थापन तथा पर्यावरणीय हानि के रूप में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। 

बड़े बांधों से उत्सर्जित मीथेन गैस भी वैश्विक तापमान बढ़ने का कारण बन रही है। ब्राजील के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के इवान लीमा व सहयोगियों द्वारा किए गए शोध के मुताबिक भारत के बड़े बांधों से सालाना 3.35 करोड़ टन ग्रीनहाउस गैस मीथेन का उत्सर्जन होता है जो वैश्विक तापमान में निरंतर हो रही वृद्धि का एक कारण भी है। ‘मीथेन एमिशन फ्राम इंडियन लार्ज डैम’ नामक रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत के बड़े बांधों तथा अन्य सभी छोटे जलाशयों एवं जल भण्डारों का सटीक सर्वेक्षण किया जाये तो भारत से प्रतिवर्ष लगभग 4.58 करोड़ टन ग्रीन हाउस गैस मीथेन का उत्सर्जन होता है। अध्ययन के अनुसार विश्व के सभी छोटे बड़े जलाशयों से कुल 12 करोड़ टन मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि संपूर्ण विश्व में मीथेन गैस के सभी स्रोतों से होने वाले मीथन उत्सर्जन का 24 प्रतिशत उत्सर्जन बड़े बांधों एवं जलाशयों से होता है। ध्यान रहे इस अध्ययन में नाइट्रस आक्साइड तथा कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन को शमिल नहीं किया गया है। बड़े बांधों स हाने वाले इन गैसों के उत्सर्जन को भी यदि शामिल कर लिया जाय तो बड़े बांधों के ओजोन क्षरणकारी प्रभाव के आंकड़े और अधिक होंगे। भारतीय क्षेत्र के बढ़ते वैश्विक तापमान में भारत के बड़ बांधों का योगदान 19 प्रतिशत है जो अन्य देशों के मुकाबले में काफी अधिक है। 

“पिछले चार दशकों में बड़े बांधों के संबंध में किए गए सभी अध्ययन यही सिद्ध करते हैं कि बांध विकास के मंदिर नहीं बल्कि विनाश के श्मशान हैं।” 

भारत में बड़े बांधों तथा छोटे बांधों का तुलनात्मक अध्ययन कभी नहीं किया गया। बड़े बांधों को सिंचाई के एक मात्र विकल्प के रूप में शुरू से ही स्वीकार किया जाता रहा है। बड़े बाँधों से होने वाले लाभ को तो बहुप्रचारित किया गया किन्तु इससे होने वाली हानियों को छिपाया गया। छोटे बांधों को तो विषयवस्तु के रूप में कभी स्वीकार ही नहीं किया गया जबकि सच्चाई यह है कि छोटे बांध भी उतनी ही क्षमता से सिंचाई कर सकते हैं जितनी क्षमता से बड़े बांध कर सकते हैं। छोटे बांधों के दुष्प्रभाव भी न के बराबर है। छोटे बांधों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इनका डूब क्षेत्र कम होता है। अतः विस्थापन की समस्या लगभग न के बराबर होती है। पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी कम ही देखने को मिलता है जबकि बड़े बांधों की मुख्य समस्या विस्थापन एवं पर्यावरणीय दुष्प्रभाव है। बड़े बांधों से मच्छरों का प्रकोप बढ़ता है जिससे मलेरिया जैसे रोगों का प्रसार होता है। छोटे बांधों के मामले में ऐसे किसी प्रकोप की सूचना लगभग न के बराबर है। इसके अतिरिक्त देश में बड़े बांधों से प्रत्यक्ष सिंचाई के लाभ का आकलन ही किया जाता है। इस आकलन की तुलना में छोटे बांध कहीं नहीं ठहरते जबकि सच्चाई यह है कि छोटे बांध न केवल प्रत्यक्ष सिंचाई करते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से भूमिगत जल के स्तर में भी वृद्धि करते हैं। चूंकि परोक्ष सिंचाई का आकलन करना कठिन है इसलिए छोटे बांध पीछे छूट जाते हैं। वास्तव में भारत में जल नीति का आधार तुलनात्मक होना चाहिए और इसमें छोटे बांधों द्वारा होने वाली सिंचाई को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। 

“अपरिहार्य परिस्थितियों में बड़े बांधों का निर्माण किया जाना चाहिए साथ ही वैकल्पिक साधनों पर भी विचार किया जाना चाहिए।” 

बांधों का निर्माण यूं तो सदियों से होता आया है, लेकिन 1930 से 1970 के बीच यह मत तेजी से साथ उभरा कि बड़े बांधों के निर्माण से ही विकास और आर्थिक सुधार संभव है। आधुनिकीकरण के इस दौर में बांधों के निर्माण में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। बाढ़ को नियंत्रित करने, पन बिजली पैदा करने, सिंचाई या पेयजल आपूर्ति के लिए, उद्योग धंधों के लिए जल आपूर्ति जैसे कई उद्देश्यों से शुरू हुए बांध निर्माण ने जहां विकास के नए रास्ते खोले, वहीं सरकारों पर उधार का भारी बोझ, अत्यधिक लागत, डूब के क्षेत्र में आए हुए लोगों का विस्थापन और रोजी-रोटी का सवाल, मछली क्षेत्रों का विनाश, पर्यावरण का असंतुलन जैसे खतरे भी खड़े कर दिये हैं। आज संसार की आधी नदियां ऐसी हैं, जिन पर कम से कम एक बड़ा बांध बना दिया गया है। 1970 के आसपास बड़े बांधों के हानिकारक प्रभाव सामने आने लगे थे। उसके बाद से बड़े बांधों के निर्माण में कमी आने लगी। विश्व बांध आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़े बांधों ने नदियों की दशा और दिशा दोनों बदल दी है।

भारत में बड़े बांधों के कारण 5.9 करोड़ हेक्टेयर सिंचित भूमि में से 2 करोड़ हेक्टेयर भूमि लवणीकृत हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में शारदा सहायक के सिंचित क्षेत्र में दलदलीपन की समस्या से किसान परेशान हैं। बड़े बांधों हेतु बनाए गए जलाशयों के निर्माण से वनों का अत्यधिक विनाश होता है। यही नहीं इन जलाशयों के कारण असंख्य वनस्पतियों और उनकी प्रजातियां विनष्ट हो जाती हैं। वनों में रहने वाले हजारों जीव जन्तुओं का भी विनाश हो जाता है। अकेले टिहरी परियोजना से 4567 वर्ग किमी भूमि जलमग्न हुई है। 

बड़े बांधों के निर्माण से भूकंप की आंशका काफी बढ़ जाती है। टिहरी परियोजना पर गठित ढौढियाल समिति ने यद्यपि अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यह बांध 8 + मैग्नीट्यूड के भूकंपीय झटकों को बर्दाश्त कर लेगा किन्तु 260.5 मीटर ऊंचे तथा 354 करोड़ घनलीटर जल को ग्रहण करने वाले इस जलाशय में यदि दरार भी आयी तो संपूर्ण पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली में भीषण तबाही होगी। ऋषिकेश तथा हरिद्वार का तो नामोनिशान मिट जायेगा। बड़े बांधों के पक्षधर भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि बड़े बांधों के निर्माण से वन्य जीवों तथा वन सम्पदा का व्यापक विनाश होता है। हजारों लोगों को डूब क्षेत्र में आ जाने के कारण अपना मूल स्थान छोड़ कर अन्यत्र शरण लेनी पड़ती है। 

वास्तव में यदि तर्कों और वैज्ञानिक विश्लेषणों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाय तो यह कहना अनुचित न होगा कि बड़े बांध विकास के नहीं बल्कि विनाश के जलाशय हैं। यह सच है कि विकास की मौलिक आवश्यकताओं को देखते हुए बड़े बांधों के निर्माण को पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं ठहराया जा सकता है। बड़े बांधों के निर्माण से यथासंभव बचना चाहिए। बड़े बांधों के निर्माण के पूर्व छोटे बांधों के निर्माण की सभी संभावनाओं पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए। बड़े बांधों के निर्माण से होने वाले लाभों के आकलन के साथ-साथ हानियों का आकलन अति आवश्यक है। अपरिहार्य परिस्थितियों में बड़े बांधों का निर्माण किया जाना चाहिए साथ ही वैकल्पिक साधनों पर भी विचार किया जाना चाहिए। आज विश्वभर में छोटे बांधों के निर्माण पर अधिक बल दिया जा रहा है। अधिकांश देश बड़े बांधों को अपनी जलनीति में प्रतिबंधित कर रहे हैं। विश्व बांध आयोग भी यही विचार लेकर चल रहा है। ऐसे में छोटे बांधों की सार्थकता पर विचार अपरिहार्य हो जाता है। 

आज के समय में पर्यावरण असंतुलन की समस्या भयावह रूप धर चुकी है। जैव विविधता पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में विकास के नाम पर विनाश को आमंत्रण देना समझदारी नहीं है। यह बात बड़े बांधों पर भी लागू होती है, जो कि विकास के अपने लक्ष्य को तो कम प्राप्त कर पाते हैं, प्रकृति और पर्यावरण का विनाश अधिक करते हैं। साथ ही आम लोगों की दुश्वारियों को भी बढ़ाते हैं। अब यह हमें ही तय करना होगा कि हम अपने कदम किस तरफ बढ़ाएं? 

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