UPSC निबंध लेखन-सामाजिक सरोकार और आकाशवाणी 

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UPSC निबंध लेखन-सामाजिक सरोकार और आकाशवाणी 

यह कहना असंगत न होगा कि भारत में आकाशवाणी सामाजिक सरोकारों की पर्याय रही है। लोगों के ‘मन की बात’ को साझा करने वाली आकाशवाणी का सारा ताना-बाना ही सामाजिक सरोकारों के ही इर्द-गिर्द बुना हुआ है। इसकी उद्देश्यपूर्ण पहलों ने जहां समाज के विकास में महती भूमिका निभाई, वहीं इसकी मूल अवधारणा सामाजिक सरोकारों पर केन्द्रित रही। ऐसा करते हुए इसने राष्ट्रीयता की भावना को भी विकसित किया और स्वस्थ मनोरंजन से भी जनमानस को जोड़े रखा। इसने सामाजिक व सार्वजनिक हितों को सर्वोपरि रखते हुए उच्च प्रतिमान स्थापित किये। सामाजिक सरोकारों के प्रति आकाशवाणी के अब तक के अवदानों को विस्मृत नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि रेडियो को न सिर्फ देश में अपार लोकप्रियता मिली, बल्कि इसने जनसामान्य के मध्य असाधारण पैठ बनाई। यह पैठ इलेक्ट्रानिक चैनलों और इंटरनेट के इस युग में भी कायम है तथा भारत की लगभग 70 फीसदी ग्रामीण जनता मनोरंजन, समाचारों व जनोपयोगी सूचनाओं के लिए आकाशवाणी पर ही निर्भर करती है। 

भारत में वैसे तो रेडियो की भारतीय सेवा प्रसारण का अस्तित्व वर्ष 1927 से माना जाता है, किंतु इसका सफरनामा वर्ष 1920 से शुरू हो गया था। रेडियो के इस सफर में कई मोड़ समय-समय पर देखने को मिले। वर्ष 1936 के जन माह से जहां यह प्रसारण सेवा ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के नाम से जानी जाने लगी, वहीं वर्ष 1957 में इसे हिन्दी नाम मिला ‘आकाशवाणी’। इसके बाद आकाशवाणी के बढ़ते कदमों ने एक अलग ही छाप छोड़ी आर न सिर्फ इसने लोकतंत्र की जड़ों को सींचा, बल्कि लोक मन के अनुरूप अपनी भूमिका को विस्तार दिया। 

“भारत में कृषि क्रांतियों को सफल बनाने में आकाशवाणी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के कृषक को खुशहाल बनाने में संचार के इस माध्यम से अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।” 

वर्ष 1959 के सितंबर माह में भारत में दूरदर्शन का प्रादुर्भाव हुआ, तो आशंका व्यक्त की गई कि शायद अब आकाशवाणी की पकड़ भारतीय जनमानस पर कमजोर पड़ेगी, किंतु ऐसा हुआ नहीं। हां, यह जरूर है कि समय के अनुरूप आकाशवाणी में बदलाव लाए गए, जिससे इसकी उपादेयता और बढ़ गई। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इस घटक ने बहुआयामी भूमिका निभानी शुरू की। इसने आवाम के बीच जहां सामाजिक सरोकारों को मुखरता प्रदान की, वहीं राष्ट्रीय कार्यों को भी व्यापकता प्रदान की। इसी के साथ सरकारी नीतियों को भी एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया। भारतीय जनमत को जनता के बीच बड़े ही सलीके से पहुंचाने का काम भी आकाशवाणी ने शुरू किया। 

आकाशवाणी की प्रसारण सेवा सुबह से शुरू होकर रात तक जारी रहती है और यह कहना असंगत न होगा कि इसका एक-एक पल जनता के लिए होता है और विश्वसनीय सूचनाओं के लिए बराबर जनता की निर्भरता इस पर बनी रहती है। ऐसा इसके उस स्वरूप के कारण ही संभव हुआ, जो जन सरोकारों से प्रतिबद्ध है। मनोरंजन, शिक्षा और सूचना के क्षेत्र में जितनी महत्त्वपूर्ण पहल आकाशवाणी ने की, संभवतः वैसी किसी अन्य प्रसार माध्यम ने नहीं की। आकाशवाणी ने अपने प्रसारणों में जहां हर आयु वर्ग का ध्यान रखा, वहीं भारतीय संस्कृति को भी व्यापक आयाम दिये। आम आदमी को साक्षर बनाने व जड़ता से मुक्त करने तथा उनकी जिज्ञासा को शांत करने में आकाशवाणी की मुखर भूमिका रही। सबसे खास बात यह रही कि आकाशवाणी ने सदैव भारत के कृषि प्रधान परिवेश को ध्यान में रखकर कृषि कार्यक्रमों को वरीयता दी, जिससे न सिर्फ कृषि क्षेत्र का उन्नयन हुआ, बल्कि कृषि जगत में चेतना भी बढ़ी। सच तो यह है कि भारत में कृषि क्रांतियों को सफल बनाने में आकाशवाणी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के कृषक को खुशहाल बनाने में संचार के इस माध्यम से अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कृषि क्षेत्र में आकाशवाणी के अवदान को इसी से समझा जा सकता है कि चावल की एक प्रजाति ही रेडियो राइस’ के नाम से जानी गई।

आकाशवाणी के समाचार प्रसारणों के तो कहने ही क्या! इसका स्वर्णिम अतीत रहा और वर्तमान भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। एक दौर वह भी था, जब चुनाव, युद्ध या अन्य संवेदनशील मौकों पर रेडियो से ‘ये आकाशवाणी है…’ सुनते ही लोगों की सांस थम जाती थी। गांव की चौपालों में लोग रेडियो (ट्रांजिस्टर) को घेर कर बैठ जाते थे। चलते-फिरते लोग भी छोटे ट्रांजिस्टर सेटों को कान से चिपकाए रखते थे। आज भी खेलों की कमेंट्री प्रसारण के समय ये दृश्य देखे जा सकते हैं। राष्ट्रीय पर्व के मौकों पर हमारे शीर्ष नेताओं की तकरीरें सुनवाने का काम भी आकाशवाणी ने प्रभावी ढंग से किया। 

“आकाशवाणी का सबसे उज्ज्वल पक्ष यह रहा कि संचार का यह माध्यम बाजारवाद से उस तरह प्रभावित नहीं हुआ, जिस तरह से संचार के अन्य माध्यम आज प्रभावित दिख रहे हैं।” 

भारत में आकाशवाणी का फलक काफी विस्तृत रहा। साथ ही इसका स्वरूप भी मर्यादित रहा। विस्तृत फलक का पता इसी से चलता है कि जन सरोकारों से जुड़ा कोई भी क्षेत्र न तो इससे अछूता ही रहा और न ही हाशिए पर रहा। इसने सबको समाहित किया। सभी को लेकर चली आकाशवाणी। कृषि, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला-संस्कृति, खेल, स्वास्थ्य, धर्म, राष्ट्रीयता, संगीत, शिक्षा, मनोरंजन व सूचना एवं समाचार, सभी को जगह दी आकाशवाणी ने। लोक संस्कृति से जुड़ी नौटंकी, बिरहा, फॉग, कजरी जैसी लोक विधाएं, जो आज विलोपन के कगार पर हैं, उन्हें आकाशवाणी ने प्रोत्साहित किया और जनमानस के बीच जीवंत बनाए रखा। इसके साथ ही अंधविश्वास, अस्पृश्यता, एवं अन्य अनेकानेक सामाजिक रूढ़ियों एवं विद्रूपताओं के खिलाफ एक सकारात्मक वातावरण निर्मित किया और इनके उन्मूलन के प्रयासों में शासन-प्रशासन को सहायता पहुंचाई। सरकार की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाकर जन-जागरूकता को बढ़ाया और विकासपरक पहलें कीं। आकाशवाणी की यह भमिका आज भी कायम है। यह कहना गलत न होगा कि भारत में आकाशवाणी जन-जागरण का एक सशक्त माध्यम रही। इस तरह इसने समाज में एक गहरी पैठ बनाई और सामाजिक सरोकारों से जुड़कर समाज का हित किया। 

वर्ष1997 में हमारे यहां प्रसार भारती बोर्ड अस्तित्व में आया और इसके बाद आकाशवाणी में भी कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले, जिन्होंने न सिर्फ अभिव्यक्ति को और विस्तृत फलक दिया, बल्कि जवाबदेही को बढ़ाया। फलक के विस्तार का अनुमान आप इसी से लगा सकते हैं कि रेडियो पर टीवी के प्रसारणों को भी सुने जाने की व्यवस्था की गई। जन-भागीदारी बढ़ाने की कोशिशें भी की गईं और इसे ध्यान में रखकर ‘फोन-इन’ और ‘हैलो फरमाइश’ जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की गई, जो खूब लोकप्रिय हुए। आकाशवाणी ने बदलते दौर के साथ आधुनिक प्रौद्योगिकी की दृष्टि से भी खुद को अद्यतन बनाए रखा। कल तक फरमाइशों के लिए चिट्ठी भेजी जाती थी, आज इंटरनेट पर ‘मेल’ के जरिये यह काम हो रहा है। इतना ही नहीं, आकाशवाणी के प्रसारण इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं। इसका डिजिटलीकरण भी हो चुका है। आज भी श्रोताओं को घर बैठे आकाशवाणी द्वारा प्रायः वह सब कुछ उपलब्ध करवाया जा रहा है, जो उसकी जरूरत है। यहां तक कि ट्रेनों की लेट-लतीफी की जानकारी भी रेडियो के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। मौसम का हाल भी बताया जाता है, तो रक्तदान के लिए अपील भी की जाती हैं|

बेरोजगार को अवसरों की जानकारी घर बैठे मिल जाती है। जन-सरोकारों के प्रति आकाशवाणी ने विश्वसनीयता की समृद्ध परंपराएं कायम की हैं और इसका अब तक का सफरनामा भरोसे का रहा है। आकाशवाणी ने राष्टीयता की भावना को जागृत करने और साम्प्रदायिक सौहार्द को कायम रखने में भी अद्भुत भूमिका निभाई है। श्रीरामचरितामनस का पाठ हो या गुरुवाणी का, आकाशवाणी ने सभी को समान वरीयता देते हुए ‘सर्वधर्म, समभाव’ की अवधारणा को मूर्त रूप दिया और सभी धर्मों को एक साथ लेकर चलते हुए कभी भी भारतीय संविधान की आत्मा को ठेस नहीं पहुंचने दी। इसने भारत के संघीय ढांचे को भी ध्यान में रखते हुए प्रांतीय प्रसारण सेवाओं को भी पर्याप्त समय देकर सराहनीय भूमिका निभाई। 

भारतीय जनमानस को स्वास्थ्य व मर्यादित मनोरंजन, खासतौर पर सिने संगीत और सिनेमा के सफर से रू-ब-रू कराने के लिए आकाशवाणी द्वारा वर्ष 1957 में विविध भारती की शुरुआत की गई, जिसने लोकप्रियता के कीर्तिमान स्थापित किये। विविध भारती का एक सुनहरा अतीत रहा और इसका वर्तमान भी कम रोचक नहीं है। आज भी विविध भारती, भारतीय जनमानस के दिलोदिमाग पर छाया हुआ है और लोग सोने से पहले इसके ‘छायागीत’ जैसे सुमधुर संगीत कार्यक्रमों को सुनना नहीं भूलते। सैनिक भाइयों के बीच ‘जयमाला’ आज भी बहुत लोकप्रिय है। फिल्मी फनकारों से जुड़ महत्त्वपूर्ण जानकारियां भी विविध भारती पर सुनने को मिलती है। 

आकाशवाणी ने कभी भी अपने प्रसारणों में ‘आधी दुनिया, यानी महिलाओं की अनदेखी नहीं की। इतना ही नहीं, महिलाओं के हर वर्ग के लिए संजोकर सामग्री पेश की, फिर चाहे वे शहरी महिलाएं हों या ग्रामीण, गृहणियां हों या कामकाजी महिलाएं, सभी का ध्यान रखा। ऐसा करते हुए जहां महिलाओं के मनोरंजन, घर परिवार की देख-भाल, बच्चों की परवरिश और स्वास्थ्य आदि मुद्दों का ध्यान रखा, वहीं नारी सशक्तीकरण की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। गृहलक्ष्मी और सखी-सहेली जैसे कार्यक्रमों ने खासी लोकप्रियता अर्जित की और ये महिलाओं की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन गये। आकाशवाणी ने जहां महिलाओं को जागरूक बनाया, वहीं उन्हें उनके विविध अधिकारों से अवगत करवा कर सशक्त बनाया। उन्हें उपयोगी व विश्वसनीय जानकारियां मुहैया करवा कर शोषण व उत्पीड़न से उबारा तथा देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई। 

आकाशवाणी का सबसे उज्ज्वल पक्ष यह रहा कि संचार का यह माध्यम बाजारवाद से उस तरह प्रभावित नहीं हुआ, जिस तरह से सचार के अन्य माध्यम आज प्रभावित दिख रहे हैं। खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया। अर्थ और वित्त की आवश्यकता हर संचार माध्यम को रहती है। आकाशवाणी भी इससे अछूती नहीं है। किंत आकाशवाणी ने कभी भी अर्थोपार्जन हेत गणवत्ता से समझौता नहीं किया। अर्थोपार्जन हेत विज्ञापन प्रसारण सेवा केंद्र और केंद्रीय विक्रय एकांश की स्थापना (प्रायोजित कार्यक्रमों हेतु) अवश्य की गई, किंतु ऐसा करते हुए आचार संहिता को सर्वोपरि रखा। यही कारण है कि आज भी आकाशवाणी का स्वरूप मर्यादित है और उच्छृखलता, वैचारिक अराजकता अथवा अभिव्यक्ति की आड़ में भोंड़ेपन की बू इसके कार्यक्रमों में नहीं आती है। 23 भाषाओं और 146 बोलियों में प्रसारण देने के बावजूद भाषा, व्याकरण, उच्चारण, विषय-वस्तु हर स्तर पर जहां मर्यादा और मानकों का ध्यान रखा गया, वहीं अपने इर्द-गिर्द श्लीलता का अभेद्य घेरा भी बनाए रखा। इस पर प्रसारित विज्ञापन आज भी घर-परिवार के साथ बैठकर सुने जा सकते हैं। 

हमने शुरुआत में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि आकाशवाणी सामाजिक सरोकारों का पर्याय रही। ऐसा अकारण नहीं है। चौपाल  से लेकर खेत-खलिहान तक, शहर से लेकर सड़क तक इसने अपनी मजबूत पैठ बनायी। ऐसा सामाजिक सरोकारों को साथ लेकर चलने | के कारण ही संभव हो पाया। एक ट्रॉली खींचने वाले या सब्जी | विक्रेता की भी रेडियो में उतनी ही दिलचस्पी रही, जितनी कि एक | सुविधासंपन्न शहरी की। आकाशवाणी को कोई नकार नहीं पाया और | इसने सदैव अपने हर वर्ग के श्रोता का ध्यान रखकर उससे मधुर और नितांत अपनेपन के संबंध कायम किये। देखते ही देखते आकाशवाणी जनमानस का परिवार जैसा बन गया। यही कारण है कि बदलता दौर तथा सूचना एवं संचार के नये-नये माध्यम आज तक इसे प्रभावहीन नहीं बना पाए। रेडियो का दौर कल भी था और आज भी है, कल भी रहेगा। 

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