UPSC Essay topics in Hindi-गरीबों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता अथवा न्याय सबके लिए |नि:शुल्क कानूनी सहायता की गुणवत्ता

UPSC Essay topics in Hindi

UPSC Essay topics in Hindi-गरीबों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता अथवा न्याय सबके लिए 

न्याय को गरीब तक पहुंचना ही चाहिए। यानी न्याय को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो न तो एक न्यायशील समाज की स्थापना हो सकती है और न ही लोकतंत्र की जीवंतता कायम रह सकती है। इस स्थिति में एक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना तक नहीं की जा सकती क्योंकि जहां न्याय ही सर्वसुलभ न हो, वहां ‘कल्याण’ कैसा। संभवतः इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर 

भारतीय संविधान में ‘सबके लिए न्याय’ की अवधारणा पर बल देते हुए गरीबों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है। 

यदि कोई व्यक्ति गरीबी अथवा ऐसे ही किसी अन्य कारण से न्याय से वंचित रह जाता है, तो यह भी एक प्रकार का ‘अन्याय’ है, दूसरे शब्दों में यह ‘न्याय की हत्या’ है, जिसे औपनिवेशिक काल में नजदीक से देखा गया। इस अन्याय के साथ-साथ यह भी महसूस किया गया कि राजनीतिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर संविधान निर्माताओं ने आयरलैण्ड के संविधान से प्रेरणा लेकर भारतीय संविधान में राज्य की नीति के निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) का प्रावधान किया, ताकि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार किया जा सके। ‘न्याय सबके लिए’ की पहली पहल यहीं से शुरू होती है। 

इसी परिप्रेक्ष्य में सभी राज्य प्राधिकरणों में 9 नवंबर को हर वर्ष कानूनी सेवा दिवस मनाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पूरे भारत में कमजोर वर्ग के लोगों तथा गरीब लोगों को सहायता एवं समर्थन के लिए 1995 में शुरू किया था। 

“न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने यह व्यवस्था दी कि मुफ्त कानूनी सेवा ‘न्यायोचित, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत प्रक्रिया का एक अपरिहार्य अंग है, जिसके बगैर आर्थिक या अन्य कठिनाइयों से पीड़ित कोई व्यक्ति न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित रह जाएगा। अतः मुफ्त कानूनी सेवाओं का अधिकार किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के लिए न्यायोचित, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत प्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक है।” 

संविधान के भाग-4 (अनुच्छेद 36-51) में राज्य की नीति के निदेशक तत्व दिए गए हैं। इसमें अनुच्छेद 39 राज्य के सामाजिक उत्तरदायित्व को स्पष्ट करता है। सबके लिए न्याय की सुलभता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 39क जोड़ा गया, जो कि समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का उपबंध करता है। इसके अनुसार, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र द्वारा समान अवसर के आधार पर न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (Free Legal Aid) उपलब्ध कराई जाए एवं आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय से वंचित न रह जाए। 

संविधान में अनुच्छेद 39ए को शामिल किए जाने के कुछ वर्षों बाद ही 1979 में हुसैन आरा खातून के चर्चित मामले में देश की शीर्ष अदालत को मुफ्त कानूनी सहायता एवं अनुच्छेद 39ए पर संव्यवहार करने का अवसर प्राप्त हुआ। तब भारत में न्यायिक सक्रियता के जनक कहे जाने वाले न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने यह व्यवस्था दी कि मुफ्त कानूनी सेवा ‘न्यायोचित, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत’ प्रक्रिया का एक अपरिहार्य अंग है, जिसके बगैर आर्थिक या अन्य कठिनाइयों से पीड़ित कोई व्यक्ति न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित रह जाएगा। अतः मुफ्त कानूनी सेवाओं का अधिकार किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के लिए न्यायोचित, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत प्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक है और संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) की गारंटी में यह अवश्य निहित किया जाना चाहिए। 

न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती द्वारा दी गई यह व्यवस्था गरीबों के लिए वरदान साबित हुई, क्योंकि इसके जरिए उन्होंने मुफ्त कानूनी सेवाओं के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अनिवार्य अंग बना दिया, जो कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के भाग-III के अधीन एक मौलिक अधिकार की संरक्षा से संबंधित है, जो कि किसी कानूनी अदालत के समक्ष लागू करने योग्य होता है। दूसरे शब्दों में, न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने न्यायिक व्याख्या के जरिए राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांत का मौलिक अधिकार के दर्जे के रूप में उन्नयन कर दिया। यह एक महत्त्वपूर्ण फैसला था और गरीब एवं वंचित लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलबध कराने की दृष्टि से अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ। 

“गरीब, अशिक्षित और हाशिए पर खड़े लोग तथा ऐसे लोग जो अपराध, गिरफ्तारी या कैद के मामले में फंसने पर यह नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए, किससे मिलना चाहिए या कहां जाना चाहिए, मानवता के इस वर्ग तक वकीलों को निश्चित रूप से सकारात्मक होकर पहुंचना चाहिए। यदि वकील मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने के स्थान पर खुद ही उनका शोषण और उन्हें शिकार बनाने का कार्य करेंगे, तो कानून का पेशा विवादों में आ जाएगा। ऐसे में बड़ी संख्या में देश के लोगों का विश्वास वकीलों पर से उठ जाएगा, जिससे कि लोकतंत्र और कानून के शासन का क्षरण होगा।” 

सर्वोच्च न्यायालय व अन्य उच्च न्यायालयों एवं न्यायविदों के निर्देशों के अलावा न्याय सब स्तर पर चरितार्थ करने के लिए संविधान के अनुच्छेद-39क के तहत ‘कानूनी सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम’ को वर्ष 1987 में प्रभावी बनाया गया. जिसमें काननी सहायता एवं सेवाएं सनिश्चित करने के लिए एक समग्र तंत्र की व्यवस्था की गई। इस अधिनियम के अनुच्छेद 12 के तहत जिस वर्ग के लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता के लिए आच्छादित किया गया, वे हैं 

  • कोई महिला अथवा बच्चा। 
  • मानसिक रूप से बीमार अथवा अन्य प्रकार से निःशक्त कोई व्यक्ति। 
  • हिरासत में कोई व्यक्ति। 
  • संविधान के अनुच्छेद 23 में यथा संदर्भित, तस्करी का पीड़ित कोई व्यक्ति या भिखारी। 
  • अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य।
  • कोई औद्योगिक कामगार। 
  • खराब स्थितियों यथा-बड़ी आपदा, जातीय हिंसा, जातिगत दंगे, बाढ़, अकाल, भूकंप अथवा औद्योगिक आपदा की स्थिति के अधीन कोई व्यक्ति। 
  • कोई व्यक्ति जिसकी वार्षिक आय नौ हजार रुपये अथवा ऐसी कोई अन्य उच्चतर राशि, जिसे राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है, यदि मामला उच्चतम न्यायालय से अलग अदालत में है, से कम है और बारह हजार रुपय अथवा कोई अन्य उच्चतर राशि. जिसे केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है, यदि मामला उच्चतम न्यायालय में है, से कम है। 

‘कानूनी सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम’ के आधार पर देशभर में कानूनी सहायता कार्यक्रम को वैधानिक आधार देने के लिए ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (National Legal Services Au thority) का गठन किया गया, जिसका संरक्षक भारत के मुख्य न्यायाधीश को बनाया गया। ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण’ द्वारा जो व्यवस्थाएं की जाती हैं, वे हैं-

  • उचित मामलों में किसी कानूनी कार्यवाही के संबंध में प्रोसेस फीस, गवाहियों के खर्च एवं अन्य देय या लागू प्रभारों का भुगतान।
  • किसी कानूनी कार्यवाही में अधिवक्ता (Advocate) द्वारा प्रतिनिधित्व करना।
  • कानूनी दस्तावेज एवं विशेष याचिकाओं आदि का मसौदाकरण।
  • कानूनी कार्यवाहियों में दस्तावेजों के मुद्रण एवं अनुवाद सहित अभिवचनों, अपील के ज्ञापन, पेपर बुक तैयार करना तथा ऐसी कार्यवाहियों में निर्णयों, आदेशों, गवाहियों की टिप्पणी एवं अन्य दस्तावेजों की आपूर्ति।

उपरोक्त के अलावा विधिक सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम में केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय विधिक सेवाएं प्राधिकरण, राज्य स्तर पर राज्य विधिक सेवाएं प्राधिकरण तथा जिला स्तर पर जिला विधिक सेवाएं प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम में ‘तालुका विधिक सेवाएं समिति’ एवं ‘उच्चतम न्यायालय विधिक सेवाएं समिति की स्थापना का भी प्रावधान है। इस अधिनियम के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत, इन प्राधिकरणों और समितियों के लिए विवादों के निपटारे के लिए लोक अदालतों के संचालन का भी प्रावधान है। इसके अनुच्छेद 21(1) के प्रावधान के अनुसार, लोक अदालत द्वारा सुनाया गया कोई भी फैसला अंतिम एवं सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होगा। यानी इसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकेगी। 

यहां यह कहना असंगत न होगा कि हमारे देश में गरीबों और वचितों को निःशल्क काननी सहायता उपलब्ध करवाने के सवैधानिक प्रावधानों को पूरा करने के लिए एक व्यापक तंत्र मौजूद है तथा इस संदर्भ में न्यायपालिका का नजरिया भी सकारात्मक एवं उदार है। तथापि इस पहल को और प्रभावी बनाने के लिए न्याय क्षेत्र से जुड़े लोगों की उदार एवं सकारात्मक भूमिका भी आवश्यक है। कहने का आशय यह कि न्यायिक व्यवस्था में सभी के लिए न्याय की उपलब्धता बहुत हद तक वकीलों और पैरोकारों पर निर्भर करती है। न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने कभी कहा था कि वकीलों का कार्य मुश्किल में फंसे कमजोर लोगों की सहायता करना है। उन्होंने कहा था- “गरीब, अशिक्षित और हाशिए पर खड़े लोग तथा ऐसे लोग जो अपराध, गिरफ्तारी या कैद के मामले में फंसने पर यह नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए, किससे मिलना चाहिए या कहां जाना चाहिए, मानवता के इस वर्ग तक वकीलों को निश्चित रूप से सकारात्मक होकर पहुंचना चाहिए। यदि वकील मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने के स्थान पर खुद ही उनका शोषण और उन्हें शिकार बनाने का कार्य करेंगे, तो कानून का पेशा विवादों में आ जाएगा। ऐसे में बड़ी संख्या में देश के लोगों का विश्वास वकीलों पर से उठ जाएगा, जिससे कि लोकतंत्र और कानून के शासन का क्षरण होगा।” गरीबों को शत-प्रतिशत मुफ्त कानूनी सहायता के दायरे में लाने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायमूर्ति भगवती के इस कथन को अमल में लाया जाए। 

जीवंत लोकतंत्र, न्याय के व्यावहारिक निष्पादन, न्यायिक मूल्यों के उन्नयन, न्यायशील समाज एवं मानवाधिकारों की स्थापना तथा न्याय की हत्या को बचाने के लिए गरीबों एवं वंचितों को मुफ्त न्याय उपलब्ध करवाना नितांत आवश्यक है। जॉन रॉल्स की चर्चित कृति ‘थ्यौरी ऑफ जस्टिस’ में भी अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहंचने की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। यह सुखद है कि हमारा देश संविधान में किए गए वादे के अनुसार इस दिशा में अग्रसर है। जनभागीदारी से इसे और सुंदर एवं कल्याणकारी स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। हम उदारवादी लोकतंत्र के पक्षधर हैं तथा न्यायशील समाज की स्थापना हमारी प्राथमिकता है। 

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