UPSC Essay Topics in hindi 2022-राष्ट्र निर्माण में बुद्धिजीवियों की भूमिका 

UPSC Essay Topics in hindi 2022

UPSC Essay Topics in hindi 2022-राष्ट्र निर्माण में बुद्धिजीवियों की भूमिका 

बुद्धिजीवी प्रायः हर राष्ट्र और समाज में पाए जाते हैं तथा राष्ट्र और समाज के निर्माण में इस वर्ग की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। यही वह वर्ग है, जो राष्ट्र को दिशा-बोध करवाता है और उसे विकास के पथ पर आगे ले जाता है। राष्ट्र निर्माण में बुद्धिजीवियों की भूमिका बहुआयामी होती है और ये अनेक स्तरों पर राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। यानी ये सिर्फ सामाजिक सरोकारों पर ही मुखर अभिव्यक्ति नहीं देते, बल्कि शोध, अनुसंधान, तकनीकी विकास जैसे क्रिया-कलापों में भी केंद्रीय भूमिका निभाकर राष्ट्र को संबल प्रदान करते हैं। जब कभी राष्ट्र सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अथवा सांस्कृतिक स्तरों पर संक्रमण का शिकार होता है, तब इस संक्रमणकाल (TransitionPeriod) में जहां राष्ट्रवासियों की अपेक्षाएं बुद्धिजीवियों से बढ़ जाती है, वहीं बुद्धिजीवियों का दायित्व भी बढ़ जाता है और वे राष्ट्र को इस स्थिति से उबारने के लिए उद्यत हो उठते हैं। 

“हमारे समाज में कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, नाटककारों, दार्शनिकों, प्रोफेसरों, धार्मिक चिंतकों, लेखकों, उच्च अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों आदि के रूप में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति देखी जा सकती है। इन अनेक रूपों में ये बुद्धिजीवी राष्ट्र को संवारने और विकसित करने में ही लगे रहते हैं।” 

चर्चा को और आगे बढ़ाने से पूर्व पारिभाषिक स्तर पर बुद्धिजीवी के अभिप्राय को समझ लेना उचित रहेगा। सामान्य अर्थों में बुद्धिजीवी से अभिप्राय उस व्यक्ति से होता है, जो प्रमुख रूप से किन्हीं-न-किन्ही विचारों से जुड़ा हुआ होता है तथा उसके जीविकोपार्जन का मुख्य साधन उसका ज्ञान होता है। एडवर्ड शिल्स ने बुद्धिजीवी की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी है“बुद्धिजीवी वे व्यक्ति हैं, जो किसी कॉलेज (महाविद्यालय) या विश्वविद्यालय की बौद्धिक संस्कृति से प्रभावित होने की वजह से बौद्धिक अभिजन बने हैं, न कि आधुनिक व्यापार या प्रशासन के तरीकों में निपुणता प्राप्त करने के कारण बने हैं।” थोडा और स्पष्ट करते हुए शिल्स कहते हैं कि बुद्धिजीवी शब्द का प्रयोग उन सभी व्यक्तियों के लिए किया जाता है, जो उच्च आधुनिक मा प्राप्त हैं तथा अपन विषय से संबंधित बौद्धिक रुचि एवं सीता रखते हैं। शिल्स का यह भी मानना है कि बद्धिजीवी होने के लिए सिर्फ विश्वविद्यालय की उपाधि ही काफी नहीं है, अपितु इसके सफलीभूत होने के लिए उन्हें आधुनिक परिवेश और संस्कृति से परिचित होना भी अपरिहार्य है। 

थोड़ा विस्तारित संदर्भो में देखें तो बुद्धिजीवी की संज्ञा उस व्यक्ति को दी जाती है, जो सामाजिक मुद्दों, समस्याओं एवं सवालों से जुड़े आयामों पर अपनी राय जाहिर करता है तथा अपने अभिव्यक्त विचारों, दृष्टिकोणों, शोधकार्यों आदि से समाज को नई दिशा प्रदान करता है। बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनकी सोच समाज सापेक्ष हो तथा उनमें गलत विचारों, धारणाओं का खण्डन करने एवं सरकार के जनविरोधी-समाजविरोधी कार्यों, नीतियों-निर्णयों की आलोचना करने की क्षमता हो। प्रसंगवश यह जान लेना भी समीचीन रहेगा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया क्या होती है? आल्मंड तथा पॉवले के अनुसार राष्ट्र निर्माण वह प्रक्रिया है, जिसमें लघु जनजातियों में गांवों या स्थानीयता के प्रति निष्ठा एवं समर्पण की भावना को वृहद करके उसे केंद्रीय स्तर पर पूरे देश के प्रति समर्पित कराया जाता है। इस प्रक्रिया द्वारा जहां आंतरिक स्तर पर देश की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था का सशक्तीकरण कर एक शक्तिशाली केंद्र की संस्थापना का प्रयास किया जाता है, वहीं बाह्य स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य तथा अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर एक गौरवशाली राष्ट्र के रूप में देश को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जाता है। यानी आंतरिक एवं बाह्य दोनों स्तरों पर राष्ट्र की मजबूती एवं विकास के उपाय सुनिश्चित किए जाते हैं। 

हमारे समाज में कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, नाटककारों, दार्शनिकों, प्रोफेसरों, धार्मिक चिंतकों, लेखकों, उच्च अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों आदि के रूप में बुद्धिजीवियों की उपस्थिति देखी जा सकती है। इन अनेक रूपों में ये बुद्धिजीवी राष्ट्र को संवारने और विकसित करने में ही लगे रहते हैं। विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में बुद्धिजीवियों की भूमिका कुछ ज्यादा ही महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि ऐसे राष्ट्रों के बुद्धिजीवियों के समक्ष अपने-अपने राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की चुनौती रहती है। 

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के जो चार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटक हैं, उनमें पहला है राष्ट्र के प्रति पूर्ण आस्था-निष्ठा एवं समर्पण की | भावना का विकास करना। इस भावना को विकसित करने में बुद्धिजीवियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि उन्हें यह मालूम होता है कि इस भावना के अभाव में राष्ट्र न तो सशक्त बन सकता है और न ही विकास के पायदानों पर आगे बढ़ सकता। राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण की भावना इसलिए भी जरूरी होती है, क्योंकि इसके अभाव में जहां राष्ट्र के विघटन का खतरा बढ़ जाता है, वहीं सामाजिक न्याय, सौहार्द, स्वतंत्रता, सहभागिता, सद्भाव एवं सामाजिक समानता व समरसता जैसे लोकतांत्रिक मूल्य भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो सकते हैं। समग्र रूप से ये सभी बातें राष्ट्र के लिए अहितकर सिद्ध हो सकती हैं। बुद्धिजीवी वर्ग इन बातों को ध्यान में रखकर देशवासियों में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना के विकास में अपना योगदान देकर राष्ट्र को मजबूत अवलंब प्रदान करता है। 

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का दूसरा महत्त्वपूर्ण घटक है राष्ट्रीय पहचान की भावना का विकास। राष्ट्र की मजबूती एवं उन्नयन के लिए यह भावना जितनी आवश्यक होती है, उतनी ही आवश्यक उस अलगाववाद को नियंत्रित करने के लिए होती है, जो राष्ट्र को खोखला और अस्थिर बना देता है। राष्ट्रीय अस्मिता की भावना को विकसित करने में बुद्धिजीवियों की भूमिका अग्रणी होती है। विशेष रूप से चिंतकों, लेखकों, कवियों, पत्रकारों आदि की भूमिका इस भावना के विकास में सराहनीय रहती है। 

“राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अप्रतिम योगदान देकर बुद्धिजीवी विकासशील व्यवस्था का निर्माता बनने का गौरव प्राप्त करते हैं।” 

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का तीसरा महत्त्वपूर्ण घटक है, जनसाधारण में राजनीतिक चेतना का विकास करना। राष्ट्र की मजबूती के लिए जनसाधारण में पर्याप्त राजनीतिक चेतना का होना आवश्यक माना गया है। यदि जनसाधारण में राजनीतिक चेतना का अभाव होगा, तो स्वाभाविक-सी बात है कि वह राष्ट्र की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाएगा। ऐसे में राष्ट्र की प्रगति तो बाधक होगी ही। राजनीतिक चेतना के अभाव में जनसाधारण न तो अपनी समस्याएं ही सुलझा सकता है और न ही अवसरों का सही इस्तेमाल कर सकता है। इतना ही नहीं, एसी किसी चेतना के अभाव में राजनीतिक शचिता की संभावनाएं भी ताण पड़ जाती हैं। ऐसे में बद्धिजीवियों का यह दायित्व बनता है कि वे जनसाधारण में राजनीतिक चेतना के विकास के लिए प्रयासरत रहें। इस दायित्व का निर्वहन बद्धिजीवी बखूबी करते हैं। वे सिर्फ राजनीतिक चेतना ही विकसित नहीं करते हैं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के निर्माण, राजनीति के स्वरूप निर्धारण एवं निर्वाचन प्रक्रिया आदि के निर्धारण में भी अग्रणी भूमिका निभाते हैं। 

राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का चौथा महत्त्वपूर्ण घटक है आधुनिक अर्थव्यवस्था, तकनीकी ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास करना। मजबूत अर्थव्यवस्था, उच्च तकनीकी ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी वे अवयव हैं, जो किसी राष्ट्र को विकास के पथ पर ऊंचाई प्रदान तो करते ही हैं, विश्व मंच पर उसकी उपस्थिति को मजबूत और गौरवशाली भी बनाते हैं। प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भी यह आवश्यक होता है कि अर्थव्यवस्था उन्नत हो तथा तकनीक और प्रौद्योगिकी विकसित हो। इन सभी के विकास में बुद्धिजीवी वर्ग से जुड़े अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, शोधकर्ता एवं अनुसंधानकर्ता केंद्रीय भूमिका निभाते हैं और इस प्रकार राष्ट्र को मजबूत आधार प्रदान करते हैं, उसे शक्तिशाली और सामर्थ्यवान बनाते हैं। 

सारतः हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अप्रतिम योगदान देकर बुद्धिजीवी विकासशील व्यवस्था का निर्माता बनने का गौरव प्राप्त करते हैं। वे राष्ट्र के बौद्धिक आधार स्तंभ होते हैं। उनका ज्ञान-विज्ञान, चिंतन-मनन, अभिव्यक्ति, सोच, दृष्टिकोण, शोध एवं आलोचना राष्ट्र के विकास को बल एवं सकारात्मकता प्रदान करते हैं तथा आंतरिक एवं बाह्य दोनों स्तरों पर उसे सशक्त बनाते हैं। राष्ट्र एवं समाज के निर्माण तथा मानव जीवन को संवारने में बुद्धिजीवियों की भूमिका अमूल्य है। 

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