UPSC Essay topics 2022-ऑनलाइन जर्नलिज्म : मीडिया का बदलता स्वरूप | इंटरनेट पत्रकारिता

UPSC Essay topics 2022

UPSC Essay topics 2022-ऑनलाइन जर्नलिज्म : मीडिया का बदलता स्वरूप (Online Journalism : Changing Nature of Media) 

ऑनलाइन जर्नलिज्म से आशय उस पत्रकारिता से है, जो पूर्णतः कम्प्यूटर और इंटरनेट पर केंद्रित है तथा जिसमें पेपर वर्क की कोई गुंजाइश नहीं है। सब कुछ कंप्यूटर और इंटरनेट के जरिये नियंत्रित होता है। इंटरनेट ने दुनिया बदल दी है। मीडिया जगत भी इससे अछूता नहीं रहा। प्रौद्योगिकी ने पूरे मीडिया का चेहरा ही बदल कर रख दिया है। ऑन लाइन जर्नलिज्म के इस युग में सूचनाएं पंख लगाकर उड़ी रही हैं। मीडिया के परंपरागत तौर-तरीकों के बरक्स इंटरनेट, कंप्यूटर, लैपटॉप, चिप, मेमोरी कार्ड, डाटा कार्ड, मदरबोर्ड और कार्ड रीडर ने पत्रकारिता एवं सूचना के क्षेत्र में एक नई दुनिया रच डाली है, जिसने सचमुच सूचना क्रांति को सार्थकता प्रदान की है। मीडिया के इस बदले हुए स्वरूप ने पत्रकारिता को आसान बनाकर इसकी पहुंच को भी बढ़ाया है। ऑनलाइन अखबारों की शुरूआत हो चुकी है। बस माउस से क्लिक करने की जरूरत है और खो जाइए सूचनाओं और खबरों के संसार में। खासियत यह कि आज के अखबार के साथ आप दस दिन पुराना अखबार भी ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। 

यकीनन ऑनलाइन जर्नलिज्म ने मीडिया को नूतन संस्पर्श के साथ नये आयाम भी दिये हैं। जहां ट्विटर और फेसबुक जैसी सामाजिक नेटवर्किंग साइट्स ने अभिव्यक्ति और वैचारिक आदान प्रदान को गति प्रदान की है, वहीं ब्लॉग के माध्यम से संवाद बढ़े हैं। भारत में इस समय तीन करोड़ से भी ज्यादा लोग फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं। ट्विटर का इस्तेमाल भी लगभग एक करोड़ भारतीय कर रहे हैं। यह संख्या मामूली नहीं कही जा सकती। 

भारत में ऑनलाइन जर्नलिज्म की शुरुआत परंपरागत मीडिया के स्वरूप को प्रभावित करना शुरू किया। गतिशीलता और त्वरितता में प्रौद्योगिकी की इस नई देन ने परंपरागत मीडिया को पछाड़ कर रख दिया। परंपरागत मीडिया में सूचनाओं को सामने लाने में ज्यादा समय लगता था। परंपरागत मीडिया में खबरों के संकलन से लेकर उनकी प्रस्तुति और छपाई में पर्याप्त समय लग जाता था। फिर प्रसार की व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ती थी। इस प्रकार रोज का अखबार विविध चैनलों से होता हुआ एक निश्चित समय में पाठक के हाथ पहुंचता था। परंपरागत मीडिया का यह स्वरूप आज भी कायम है, किन्तु सूचनाओं के भूखे और उतावले लोगों के लिए ऑनलाइन जर्नलिज्म ने नये दरवाजे खोल दिये हैं। इसकी प्रक्रिया न सिर्फ संक्षिप्त है, बल्कि त्वरित भी है। कंप्यूटर पर सामग्री को व्यवस्थित रूप देकर बस एक क्लिक के जरिये समाचार और चित्र लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंच जाते हैं। ऑनलाइन जर्नलिज्म ने ‘पेपरलेस जर्नलिज्म’ को बढ़ावा दिया है। कम संसाधनों एवं कम समय में सूचनाएं एवं जानकारियां सज-धज कर लोगों के सम्मुख पहुंचने लगी हैं। सूचना तंत्र को इसने अधिक मजबूत तो किया ही है, पत्रकारिता को समृद्ध कर इसे जन-जन से जोड़ने का काम भी किया है। ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ इसी की देन है। अब एक आम शहरी भी बहुत अल्प समय में कोई भी सूचना या चित्र, जिसका खबरिया महत्त्व हो, ऑनलाइन भेजकर मीडिया जगत में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकता है। 

“ऑनलाइन जर्नलिज्म ने सूचनाओं की ताकत को बढ़ाकर उनके मजबूत संजाल को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है।” 

इसमें कोई दो राय नहीं कि ऑनलाइन जर्नलिज्म ने सूचनाओं की ताकत को बढ़ाकर उनके मजबूत संजाल को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है। हर पल नई सूचनाएं मिलने लगी हैं, जिनमें कुछ अत्यंत सनसनीखेज होती हैं। बहुत कुछ वह सामने आने लगा है, जो पहले सामने नहीं आ पाता था। विकीलीक्स और तहलका ने सूचना और  संचार के इसी माध्यम से सूचनाओं की ताकत और उनकी उपादेयता को प्रदर्शित किया। सिर्फ विकीलीक्स या तहलका ही नहीं, विश्व की अनेक वेबसाइट्स अपने ढंग से सूचनातंत्र को सुदृढ़ बनाने में लगी हैं। 

ऑनलाइन जर्नलिज्म से सूचना जगत में आई क्रांति का एहसास कनाडा के मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैकलुहान ने साठ के दशक में ही कर लिया था और ‘मीडियम इज द मैसेज’ का नारा दिया था। ‘माध्यम ही संदेश है’ इस नारे को ऑनलाइन जर्नलिज्म ने सार्थकता प्रदान की है। ऑनलाइन जर्नलिज्म से सूचनाओं का एक मुक्त संसार अस्तित्व में आ चुका है। यह संसार निरंतर ऊपर के पायदानों पर अग्रसर है। 

तरक्की पसंद लोगों का यह मानना है कि ऑनलाइन जर्नलिज्म के जरिये सूचनाओं को विलक्षण आजादी मिली है। सीमाओं को परे रखकर जिस तरह से संवाद और सूचनाएं सहज हुई हैं, उससे संचार को लोकतांत्रिक संस्पर्श मिला है। सूचना के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। अब सूचनाएं बंधक नहीं रहीं। सच तो यह है कि ऑनलाइन जर्नलिज्म के इस युग में सूचनाओं ने अपना निजी गणतंत्र स्थापित कर लिया है। उनका लोकतंत्रीकरण हो चुका है। हमें मीडिया के इस नये क्षितिज का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि इसमें आम आदमी की भागीदारी बढ़ी है और खास तबकों की रहस्यलीलाओं के पर्दाफाश की संभाव्यता बढ़ी है। 

मीडिया के इस नये स्वरूप ने सोशल मीडिया को भी स्थापित किया है, जिससे नजदीकियां बढ़ी हैं। ट्विटर-फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स अब मनोरंजन तक ही महदूद नहीं हैं। इससे आगे जाकर ये खबर देने और पाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया के मंच पारंपरिक मीडिया संस्थानों के लिए लोगों की प्रतिक्रिया जानने, रायशुमारी करने, अपनी ब्रांडिंग करने तथा फंड एकत्र करने का जरिया भी बन रहे हैं। खबरों की दुनिया में सोशल मीडिया की अहमियत बढ़ी है। बीबीसी के ग्लोबल न्यूज के निदेशक पीटर हरोक्स भी यह स्वीकार करते हैं कि सोशल मीडिया के तमाम माध्यम समाचार एकत्र करने का महत्त्वपूर्ण जरिया बन चुके हैं। इन माध्यमों के बेहतरीन इस्तेमाल की जानकारी पत्रकारों के लिए आवश्यक है। 

नया मीडिया कला संसार में भी लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि अधिकांश कलाकार नये मीडिया से जुड़ना चाह रहे हैं। जिस तरह से नये मीडिया का तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी विकास हुआ है, उसी तरह से अभिव्यक्ति के माध्यम और उपकरण भी बदले हैं। कला का प्रस्ततिकरण इससे सहज हुआ है। कला-संस्कृति को नये आयाम मिले हैं। नई प्रतिभाओं के लिए मंच के संकट की समस्या भी इस प्रकार हल होती दिख रही है। नये मीडिया ने कला को देखने और समझने के पूरे ढांचे को बदल दिया है। रचनात्मक अभिव्यक्ति में क्रांतिकारी बदलाव दिख रहा है। तकनीकी विकास में हए विस्फोट ने कलाओं की सीमाओं को समाप्त कर दिया है। कहने का आशय यह कि अब कला का नेतृत्व भी बदले हुए नये मीडिया के हाथों में चला गया है। यह एक नये सौंदर्य की रचना कर रहा है। विमर्श का दायरा बढ़ा है। नये मीडिया में कला को एक नया सुव्यवस्थित स्वरूप मिला है। 

“नये मीडिया ने सूचनाओं के लोकतांत्रिक संसार की रचना तो की है, किन्तु अक्सर उन्मुक्तता के रूप में ये ‘अतिवाद’ को भी बढ़ावा देती हैं। इससे उच्छृखलता एवं अनुशासनहीनता को भी बढ़ावा मिला है।”

 इसमें कोई दो राय नहीं कि मीडिया के बदले हुए स्वरूप ने सूचना एवं संचार को नये आयाम देते हुए राजनीति, समाज, कारोबार, कला, संस्कृति एवं साहित्य के नये क्षितिज को छुआ है, किंतु इसकी कुछ कमियां भी हैं, जिन पर दृष्टिपात करना जरूरी है। नये मीडिया ने सूचनाओं के लोकतांत्रिक संसार की रचना तो की है, किन्तु अक्सर उन्मुक्तता के रूप में ये ‘अतिवाद’ को भी बढ़ावा देती हैं। इससे उच्छृखलता एवं अनुशासनहीनता को भी बढ़ावा मिला है। ऑनलाइन जर्नलिज्म में अक्सर सूचनाओं के असंपादित अंश ही सामने आते हैं। अब यह पाठक पर है कि वह उन्हें स्वयं से संपादित कर पढ़े। इस प्रवृत्ति के बढ़ने से खबरों की विश्वसनीयता भी घटी है और इनसे जुड़े विवाद भी बढ़े हैं। चूंकि सूचनाओं को छानने की कोई चलनी नहीं है, अतएव अहितकर एवं विवादास्पद सूचनाओं के लोगों तक पहुंचने की गुंजाइश बराबर बनी रहती है। इससे माहौल बिगड़ता है। कभी-कभी चरित्र हनन के नियोजित प्रयास भी इन माध्यमों से होते हैं। किसी के कद को बढ़ाने या घटाने का चलन भी इस नये मीडिया में बढ़ा है। सोशल मीडिया के जरिये व्यक्तिगत सूचनाएं सामने आती हैं, जिनकी स्तरीयता और सत्यता को परखने का कोई पैमाना हमारे पास नहीं है। इसमें बहुत कुछ अनर्गल और असत्य तथ्य आकर ‘वैचारिक प्रदूषण’ को बढ़ा रहे हैं। साइबर क्राइम के रूप में नये-नये छल-प्रपंच सामने आ रहे हैं। अश्लीलता और आतंक को बढ़ाने वाले घातक अवयव भी इसमें मौजूद हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मीडिया के इस बदले हुए स्वरूप में विश्वसनीयता का संकट बढ़ा है। यदि इस संकट को दूर कर लिया जाए, तो इस नय मीडिया की उपादेयता और बढ़ सकती है। 

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