Upsc essay solved in hindi-अर्थ ऑवर 

Upsc essay solved in hindi

  Upsc essay solved in hindi-अर्थ ऑवर(Earth Hour) 

निःसंदेह पर्यावरण को बचाने तथा ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जन जागरण को लेकर अर्थ ऑवर के नाम पर जो पहल की जा रही है, वह श्लाघनीय है। जब सरकारें और शासन पर्यावरण को बचाने की दिशा में सार्थक पहल न कर पा रहे हों, ऐसे में इस तरह के प्रयास ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। जन-जागरूकता की दृष्टि से पर्यावरणविद् और प्रकृति प्रेमी भी इसे एक अच्छा प्रयास बता रहे हैं।

अर्थ ऑवर के नाम से शुरू की गई यह पहल ज्यादा पुरानी नहीं है। वर्ष 2007 में आस्ट्रेलिया के सिडनी नामक नगर में इसकी नींव रखी गई। इसके पीछे उद्देश्य था-पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा बचत और ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जन-जागरण को बढ़ाना। यह परिकल्पना ‘वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर’ और ‘द सिडनी मार्निंग हेराल्ड’ ने की थी। प्रकृति के संरक्षण के इस अभियान में वर्ष 2009 में भारत भी सम्मिलित हो गया। अर्थ ऑवर अभियान में शामिल क्षेत्रों में हर वर्ष मार्च महीने के अंतिम शनिवार को शाम 8.30 से 9.30 तक अधिकांश प्रसिद्ध इमारतों में गैर जरूरी बत्तियां बुझा दी जाती हैं। यह एक बेहतर संदेश है, ऊर्जा की बचत का तथा लोगों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूक करने का। सिडनी से शुरू हुए इस  अभियान में जिस तेजी से विश्व के अनेक देश जुड़ रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि यह धरती को बचाने का एक बड़ा स्वैच्छिक अभियान बन कर उभर रहा है। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि धरती इस समय संकट से घिरी है। पर्यावरण का क्षरण हो रहा है तो ग्लोबल वार्मिंग की विनाशकारी दस्तकें भी सुनाई दे रही हैं। धीरे-धीरे ऊर्जा का संकट भी बढ़ रहा है। प्रकृति का बड़ी निर्दयता से दोहन करके हम प्रलय को दावत दे रहे हैं। सुनामी जैसी जो घटनाएं घट रही हैं, वे प्रकृति के कोप का ही नतीजा हैं। ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में हम यह कह सकते हैं कि कुपित हो चुकी प्रकृति ने ‘खंड प्रलय’ का सिलसिला शुरू कर दिया है। हम अगर अब भी न चेते, तो आने वाली विनाशलीला के लिए तैयार रहें। 

“हम बराबर प्रकृति का दोहन करते रहे। स्थिति को इतना बदतर बना दिया कि धरती की आबोहवा जीने लायक नहीं रही।” 

पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी विकराल समस्याओं से जुड़ी विडंबना यह है कि इन पर चर्चाएं तो बहुत होती हैं, मगर सार्थक पहल कम होती है। सरकारों के पास न तो इच्छाशक्ति ही है और न ही पारदर्शिता। इसलिए ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए उनके ऊपर न तो निर्भर ही रहा जा सकता है और न ही भरोसा ही किया जा सकता है। हां, विकास के नाम पर सरकारें विनाश का खेल अवश्य ही बड़ी निरंकुशता के साथ खेलती हैं। यहां तक कि अलोकतांत्रिक तौर-तरीके अपनाए जाते हैं। इस तरह के विकास की तह में कहीं न कहीं राजनीतिक तुष्टीकरण भी होता है। दूसरी तरफ धरती को बचाने के नाम पर हो रहे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन भी किसी आडंबर जैसे साबित हो रहे हैं और सार्थक परिणाम देने में विफल हो रहे हैं। नतीजतन स्थिति अत्यंत भयावह होती जा रही है। 

हम बराबर प्रकृति का दोहन करते रहे। स्थिति को इतना बदतर बना दिया कि धरती की आबोहवा जीने लायक नहीं रही। हमने प्रकृति से इस हद तक छेड़-छाड़ की, कि भूकंप, ज्वालामुखी फटने, भूस्खलन, अतिवृष्टि, अनावृष्टि और सुनामी जैसी आपदाएं बढ़ने लगीं। वर्तमान में स्थिति यह है कि एक वर्ष में औसतन 500 प्राकृतिक आपदाओं को हमें झेलना पड़ता है। आने वाले दिन और खराब होंगे। शताब्दी के अंत तक इस बात की संभावना है कि तापमान ढाई से पांच सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। कारण, तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघलेंगे। समुद्र तल बढ़ने से महासागरों के अथाह जल भंडार के वितरण में परिवर्तन होगा। इससे पृथ्वी पर दबाव और बढ़ेगा। इस दबाव के चलते धरती पर दरारें बढ़ने और भूकंपीय गतिविधियों की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी। वर्षा अनियंत्रित हो जाएगी, इससे स्वास्थ्य, खाद्यान्न, जल सुरक्षा आदि से जुड़ी समस्याएं बढ़ेगी। 

“जब अर्थ ऑवर जैसे अभियानों से स्वयंसेवी संस्थाएं, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद् जुड़ेंगे, तो यकीनन सूरत बदलेगी।” 

आज हम विनाश के जिस मुहाने पर खड़े हैं, उसके लि जिम्मेदार भी हम ही हैं। अनियंत्रित नगरीकरण, औद्योगीकरण के लिए प्राकृतिक स्रोतों का जमकर दोहन किया गया। पेड़ों की अंधाध कटाई की। हरे-भरे वन क्षेत्र मरुस्थल में तब्दील हो गए। कैसी विडंबना व अचेतना है कि बड़े-बड़े तापगृह बनाये, तकनीकी विकास भी किया. मगर प्रकृति के संरक्षण के प्रति आंखें मूंदे रहे। अनियनित खनन से धरती की छाती को खोखला कर दिया। वृक्षों की खेती की तरफ ध्यान न देकर, बाग-बगीचों का सफाया कर दिया। रासायनिक खादों का बेहिसाब प्रयोग कर खेतों की सेहत बिगाड़ दी। जीवन में विलासिता भी बढ़ी। एयरकंडीशन, रेफ्रिजरेटर घर-घर में पहुंच गए। वाहनों में जबरदस्त वृद्धि हुई। इस सब चीजों से जहां प्रकृति जर्जर हुई, वहीं हरित गृह (ग्रीन हाउस) प्रभाव से उष्णता भी बढ़ी। जलवाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और ऋतु चक्र गड़बड़ाने लगा। विकास की अंधी होड़ में हमने पर्यावरण संरक्षण के अपने प्राचीन और परंपरागत उपायों की भी अनदेखी की। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति का कोप सारे कोपों से बढ़ कर होता है। हालांकि अभी भी समय है। हमें कुपित हो चुकी प्रकृति के प्रलयंकारी कदमों की आहट पर ध्यान देना होगा तथा अर्थ ऑवर’ जैसे अभियानों से जुड़कर धरती को बचाना होगा। इस काम को करने के लिए हमें खुद उठ कर खड़ा होना पड़ेगा। सरकारों का मुंह नहीं देखना होगा।

यकीनन ‘अर्थ ऑवर’ जैसी सकारात्मक पहल के साथ हमें दिल से जुड़ना होगा। आज प्रकृति को बचाने के लिए यह जरूरी हो गया है कि इंसान जागे और फ्रांसिस बेकन की इस बात को समझे कि हम प्रकृति का कहा माने बिना उसे काबू में नहीं कर सकते। यानी हम प्रकृति की बात माननी होगी और उसी के अनुरूप आचरण में बदलाव लाना होगा। 

‘अर्थ ऑवर’ की आत्मा को हर किसी को समझना होगा। इससे आशा की एक नई किरण जागी है, जो आने वाले दिना । अच्छा प्रभाव दिखा सकती है। जन जागरूकता की दृष्टि सय जरूरी है। यह भी सच है कि ऐसी समस्याओं का हल जनशक्ति जनक्रांति के बूते ही संभव है। जब अर्थ ऑवर जैसे अभियान स्वयंसेवी संस्थाएं, प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद् जुड़ेंगे, तो यक़ीनन सूरत बदलेगी। 

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