Upsc essay previous year question paper in hindi-हिन्दी काव्य में सत्यम् शिवम् सुन्दरम् 

Upsc essay previous year question paper in hindi

Upsc essay previous year question paper in hindi-हिन्दी काव्य में सत्यम् शिवम् सुन्दरम् 

सत्यम् शिवम् सुन्दरम् उच्चतम तात्विक मूल्य हैं जिन्हें भारतीय समाज में अति प्राचीनकाल से ही स्वीकार किया जाता रहा है। भारतीय समाज के लिए ये शब्द नए नहीं है। उपनिषद् कालीन ग्रंथों में उच्च आदर्शों से युक्त इस तरह के शब्दों का प्रयोग है। भारत की लगभग सभी संस्कृतियों में इसके सार रूप को ग्रहण एवं स्थापित किया गया है। विश्व साहित्य में इसका प्रयोग सम्भवतः प्रथम बार अरस्तू ने किया था। अरस्तू के ग्रंथों में The True, The good, The beautiful शब्दों का कई स्थानों पर प्रयोग हुआ है। बंगला साहित्य में देवेन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा इस शब्द का प्रयोग प्रथम बार किया गया। वास्तव में सत्यम शिवम् सुन्दरम् शब्द को वैदिक, उपनिषदीय अथवा किसी अन्य काल में बांधना इसके साथ अन्याय करना होगा। किसी क्षेत्र विशेष के साथ इसका परिसीमन भी न्यायपूर्ण न होगा। ये शब्द लौकिक अथवा अलौकिक भी नहीं हैं। वास्तव में ये शब्द उच्चतम् नैतिक मूल्यों का बोध कराते हैं। नैतिक मूल्यों का किसी भी युग, किसी भी काल और किसी भी क्षेत्र में समान महत्त्व होता है। 

जब काव्य के संबंध में इन तीनों तत्वों की चर्चा करते हैं तब उनका मूल्य कुछ भिन्न हो जाता है। वस्तुतः हम इन शब्दावलियों के द्वारा काव्य के औचित्य, अनौचित्य, सत्य के प्रति काव्य की चेष्टात्मक | प्रवृत्ति तथा काव्य का सौंदर्यबोध आदि का अध्ययन करते हैं। काव्य में सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के अध्ययन के लिए समग्र काव्य साहित्य के अध्ययन की आवश्यकता होती है। साथ ही काव्य के मूल उद्देश्यों, सौंदर्यात्मक अवधारणाओं तथा प्रेरणाओं को भी अध्ययन का क्षेत्र बनाया जा सकता है। 

कविता वास्तव में एक कला है, कवि की कल्पनाओं का विस्तार है। कल्पना और भावों पर आरूढ़ होकर एक कवि सौंदर्य की परम अनुभूति कराने वाले काव्य का सृजन करता है। मन के विचार सवित होकर काव्य कापलेत हैं और मानव हग्य को बिना प्रयास क ही झंकृत कर देते हैं। काव्य की रचनात्मक प्रक्रिया में कल्पना का बड़ा हाथ होता है। काव्य की संपूर्ण योजना प्रकृति या अनुभूति का लेकर इस तथ्य पर आधारित है कि वह शन द्वारा प्रतीति के स्तर पर आती है। ‘कमल’ एवं ‘कमल’ में सम्बद्ध अनुमति को कवि अपनी प्रतीति से प्रस्तुत करता है, और इस दावे के साथ कि कमल का अमूर्तन ही नहीं उसके साथ सम्बद्ध अनुभूति जिसे वह प्रकट करना चाह रहा है-शत प्रतिशत पाठक की अनुभूति से सम्बद्ध होगी। जहाँ भी अमूर्तन चाहे वह वस्तु का हो या किसी अनुभूति विशेष का जब शब्दों के माध्यम से व्यक्त होगा, एक विशेष प्रकार की काल्पनिक योजना अनिवार्य रूप से स्पष्ट होगी- और फिर इसका प्रभाव रचना प्रक्रिया के संपूर्ण संदों पर आवश्यक रूप से पड़ेगा। उदाहरणार्थ, कमल और कमल की एक विशिष्ट ‘अनुभूति’ के लिए काव्य की योजना इस प्रकार की होगी कि आपको विश्वास करना पड़ेगा कि ‘कमल है और उसके साथ ऐसी अनुमति है चाहे यह कमल पत्थर पर लिखा हो, पृथ्वी पर खिला हो या जल में, उसके साथ सम्बद्ध एक निश्चित यथार्थ को हम भूल जाते हैं। 

काव्य में शब्दों और उनके प्रयोग का बड़ा महत्त्व है। शब्द में अंतनिर्हित अर्थ को व्यक्त करने वाली क्रिया को शब्द-शक्ति कहते हैं। प्रसंग के साथ-साथ वक्ता तथा श्रोता के द्वारा भी शब्दों के अर्थ निर्धारित होते हैं। शब्द-शक्ति का मुख्य कार्य है शब्द का अर्थ विवर्तन। जिस प्रकार जल की शक्ति विभिन्न ग्रहों की सृष्टि करती है उसी प्रकार शब्द शक्ति भी विभिन्न प्रकार के अर्थों को उत्पन्न करती है। एक ही शब्द के कई वाच्यार्थ होते हैं और विभिन्न आधारों को लेकर उसके अर्थ ग्रहण किए जाते हैं। किसी शब्द का अर्थ क्या होगा, इसका निर्णय संयोग, वियोग, विराध, सहचर्य, काल, प्रसंग तथा स्वर भेद से किया जाता है। इसी प्रकार शब्दों के लाक्षणिक प्रयोग द्वारा भी काव्य की रचना की जाती है। काव्य साहित्य में प्रायः सौंदर्य बोध हेतु लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग किया जाता रहा है। यही लाक्षणिक प्रयोग कालान्तर में रूढ़ि हो जाते हैं और नए शब्दों के निर्माण में सहायक होते हैं। 

काव्य यथार्थ का मौलिक चित्रण ही हो यह आवश्यक नहीं किन्तु उसमें यथार्थता अवश्य होती है। यही यथार्थता उसे सत्य के निकट ले जाती है। सत्य एक तात्विक वस्तु है। यह निरपेक्ष नहीं है। शिवम तथा सन्दरम से इसका घनिष्ठ संबंध होता है। ये तीनों शब्द अलग-अलग होते हुए भी परस्पर सापेक्ष हैं। जब भी काव्य या साहित्य के संबंध में सत्य की चर्चा होती है तो उसका एक विशेष अर्थ होता है। प्रश्न यह है कि काव्य में सत्य की स्थिति क्या है? वास्तव में काव्य में सत्य की स्थिति का निर्णय अनुभूति की वस्तु है। काव्य में सत्य एक तत्व दर्शन है। काव्य किसी सत्य को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करता अपितु सत्यत्व का अनुभव कराता है। इसके साथ ही सत्य का एक और भी संदर्भ है, जिसमें प्रक्रिया दूसरी हो जाती है। इस सत्य का संदर्भ है—तर्क तथा ज्ञान प्रक्रिया में प्रकृत सत्य या यथार्थ की वास्तविकताओं की व्याख्या, नियम निदेश आदि जिसका संबंध दर्शन, ज्ञान, तर्क आदि से है। वस्तुतः सृष्टि में प्रकृत यथार्थ ही है और उस प्रकृत यथार्थ की व्याख्या, सम्बद्ध अनुभूति को अभिव्यक्ति आदि के लिए काव्य, दर्शन आदि माध्यम के रूप में हैं। अतः स्वतः स्पष्ट है कि काव्य के लिए एक वास्तविक प्रकृत यथार्थ की अनिवार्यता है। इस प्रकृत यथार्थ की ही पृष्ठभूमि पर काव्य निर्मित होता है। वर्षा, वसंत, ग्रीष्म, वृक्ष, नदी, निर्झर, पर्वत आणि अनुभूत प्राकृत यथार्थ ही हैं, जिनसे सम्बद्ध अनुभूतियों की अभिव्यक्ति काव्य में होती है।

काव्य की प्रेरणाओं के पीछे भी सत्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। काव्य का उद्देश्य या तो सत्य का उद्घाटन होता है या सत्य का बोध होता है। काव्य की समस्त मूल प्रेरणाओं का यदि विवेचन किया जाय तो सार रूप में काव्य के पीछे सत्यम् शिवम् सुंदरम् की भावना छिपी होती है। जीवन के समान काव्य का केंद्र बिन्दु आनन्द या सुख है। हम इष्ट की प्राप्ति द्वारा सुखी होना चाहते हैं अथवा अनिष्ट का निवारण करके दुःख से छुटकारा पाना चाहते हैं अथवा उसको दूर रखना चाहते हैं। इस प्रकार काव्य की प्रेरणाएं वस्तुतः या तो आनन्द प्रदायिनी हैं अथवा दुःख निवारणी हैं। अतः हम काव्य के समस्त प्रेरणा तत्व को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं—व्यक्तिगत आनन्द की प्राप्ति की प्रेरणा तथा सामूहिक आनन्द अथवा लोक मंगल की साधनापरक प्रेरणा। आनन्द की प्राप्ति, शक्ति व ज्ञान की प्राप्ति, सौंदर्यानुभूति के आनन्द का प्रकाशन, प्रभावित करना तथा कुतूहल वृत्ति की तृप्ति, व्यक्तिगत आनन्द की प्राप्ति की प्रेरणा के अन्तर्गत आते हैं। उपदेश, लोक व्यवहार की शिक्षा, राष्ट्र निर्माण आदि प्रेरणाएं लोकमंगल के हेतु हैं। सत्य का उद्घाटन साभिप्राय आत्माभिव्यक्ति तथा जीवन के प्रति आस्था उत्पन्न करना एवं जीवन के सौंदर्यों से परिचित कराना काव्य का मुख्य उद्देश्य है। इससे कवि का रंजन तो होता ही है, पाठक भी रंजन के साथ-साथ सत्यम् शिवम् सुन्दरम् से साक्षात् की अलौकिक अनुभूति प्राप्त करता है। गोस्वामी तुलसीदास ने शीर्ष पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की गाथा स्वान्तः सुखाय के वशीभूत होकर लिखी थी, किन्तु यह महाकाव्य प्रारंभ से आज तक भारतीय समाज को सत्यम् शिवम् सुंदरम् से अभिभूत कर कवि के प्रयासों को सार्थक कर रहा है। यह श्रेष्ठ काव्यमयी रचना समाज को सत्य से परिचित कराने के साथ-साथ समाज को नीति शास्त्र अर्थात् शिवम् तथा जीवन के सौंदर्य अर्थात् सुन्दरम् से परिचित करा रही है। 

साहित्य में ‘शिव’ की स्थिति भी कुछ भिन्न है। वस्तुतः यह ‘शिव’ नीति या आचरण शास्त्र का चरम सत्य और श्रेयस्थर्मा है। इस नैतिक चिंतन के दो पक्ष हैं—प्रथम तात्विक और दूसरा सहज। तात्विक चिंतन के अंतर्गत शास्त्र के रूप में इसका विश्लेषण एवं इसके सामाजिक औचित्य-अनौचित्य पर विचार करते हैं। किन्तु सहजरूप में संपूर्ण शिवत्व से सम्बद्ध नीतिशास्त्र मानव जीवन के प्रत्येक आचरण के लिए संहिता नहीं देखनी पड़ती अपितु इस सामाजिक भद्रता से मनुष्य स्वतः यंत्रवत् परिचालित है। काव्य में नैतिकता (शिवत्व) के संबंध में प्राचीन साहित्य मर्मज्ञों एवं पश्चिम के विचारकों ने अपने-अपने ढंग से विचार व्यक्त किए हैं। आज भी इस विषय पर विचार एवं शोध हो रहा है। कुछ विद्वानों ने काव्य का एक मात्र उद्देश्य जन-रंजन बताया है तो कुछ काव्य को नीति विश्लेषक बताते हैं। प्राचीन नीतिकारों ने भी अपनी नीतियों से समाज को परिचित कराने के लिए काव्य का सहारा लिया है। कुछ भारतीय चिंतक इसे काव्य नहीं मानते। इन सबके विपरीत कुछ विद्वानों ने काव्य का प्रयोजन समाज से अशिव (अकल्याणकर) को दूर करना माना है। पश्चिमी जगत के विचारकों में प्लेटो ने सर्वप्रथम काव्य में नैतिकता के भावों के महत्त्व को समझा। प्लेटो के अनुसार काव्य ही नहीं, किसी भी कला से नैतिकता के भाव को अलग नहीं किया जा सकता। जहां तक काव्य और शिवम् (नैतिकता) के पारस्परिक के सैद्धांतिक विवेचन का प्रश्न है, यह स्पष्ट ही है कि इसका नहीं है। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क दिये जाते रहे हैं। यहां मध्य मार्ग अपनाना उचित होगा। विभिन्न काव्य-कतियों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि काव्य का नैतिकता से संबंध है। किन्तु सभी काव्यों में यही भावना उजागर होती हो ऐसा है। कभी-कभी काव्य मात्र सोंदर्य बोध हेतु रचे जाते हैं। यहां यह भी करना उचित होगा कि काव्यकार नीति उपदेशक नहीं होता। वह अपने अनुभवों का तथा सोदर्य संबंधी अपनी परिकल्पनाओं का सहारा लेता है। जीवन के खट्ट-मीठ अनुभव नीतियों के अपालन से हए कष्ट सके काव्य के रुख को शिवत्व की ओर मोड़ देते हैं। यही कारण है कि काव्य में शिवत्व का समावेश रहता है। 

इसके अतिरिक्त काव्य के अंतर्गत उपयोगितावादी सिद्धांत भी कार्य करता है। जिसके अनुसार काव्य सामाजिक अभिव्यक्ति का साधन बन जाता है। समाज नियमों और मर्यादाओं से नियंत्रित एक संघटक है। काव्य में जो कुछ अभिव्यक्त है वह सामाजिकता से ओत प्रोत है। और इस प्रकार से काव्य में शिवत्व की दृष्टि परिलक्षित होती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शिवत्व काव्य की काव्यात्मकता के लिए घातक तत्व हे। शिवत्व का परिरक्षण करने के कारण काव्य में काव्यात्मकता का अभाव परिलक्षित होने लगता है। 

काव्य का संबंध सौंदर्य से है। शिव और सौंदर्य दो पृथक मानदण्ड हैं। शिवत्व काव्य की काव्यात्मकता को नष्ट करता है तो सोंदर्य काव्य की काव्यात्मकता को उजागर करता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका हे काव्य एक कला है। और कला बिना सौंदर्य के अपूर्ण है। अतः यह कहा जा सकता है कि काव्य के माध्यम से सामाजिक शिवत्व की परिकल्पना शायद काव्य के लिए व्यापक हो, क्योंकि यह चिंतन की एक स्वतः प्रक्रिया है, और काव्यात्मक रुचि के संरक्षण से उसका कोई प्रत्यक्षतः संबंध नहीं है किन्तु सुंदरम् (सौंदर्य बाध) के संबंध में मत इसके बिल्कुल विपरीत है। काव्य का सौंदर्य के साथ अनिवार्य संबंध है और यह काव्य को और अधिक सुरुचिपूर्ण बनाती है। किसी भी कला के मूल्यांकन में हम सर्वप्रथम उसके सौंदर्य पक्ष को देखते हैं। सौंदर्य सजन, सौंदर्य बोध एवं सौंदर्य अन्वेषण की प्रवृत्ति मानव में आदि काल से है। एक कवि इसी आदिम मानवीय प्रवृत्ति के सहारे सौंदर्य का अन्वेषण करता हुआ अपने ही द्वारा सृजित अनन्त कल्पनीयता की ओर दौड़ जाता है और चरम बिन्दु पर पहुंच रसादय से साक्षात्कार करता है। यहीं उसकी काव्यात्मक प्रतिभा प्रस्फुटित होकर शब्दों में बंध जाती है। 

सुदर और असुंदर जो काव्य के माध्यम से अनुभूति-प्रज्ञा का विषय बनता है, काव्य के लिए एक मात्र ग्राह्य है। काव्य अपनी प्रक्रिया में सौदर्य तत्व को अनिवार्य रूप में इस प्रकार स्वीकार करता हैं, ताकि उसकी प्रकति की सुरक्षा हो सके। काव्य स्वतः कलाओं की भांति एक विशिष्ट कला है। जिसमें चारूत्व अथवावर आधारित है। ‘अर्थबोध’ के माध्यम के रूप में वह शब्दों का प्रयाग करता है और अमूर्त को शब्दों के माध्यम से रमणीक बनाकर मूत करता है। उसकी यह प्रक्रिया कला की प्रक्रिया है, जिसका संबंध सौंदर्य से है। वास्तव में काव्य सौंदर्य का विवेचन नहीं करता आपतु सौंदर्य के विवेचन का आधार प्रस्तुत करता है। वह सौदय का अनुभूति को एक विशिष्ट स्थिति में रखकर सम्पूर्ण मानव मन का उसी स्थिति पर लाने की चेष्टा करता है। 

लियो टॉलस्टाय के अनुसार किसी भी कला का लक्ष्य सौंदर्य है।’ संसार में सौंदर्य आनंद प्रदान करने के लिए है। काव्य जनित सौंदर्य किसी भी प्रकार के आनंद से श्रेष्ठ होता है। कला अथवा काव्य सोंदर्य के अधीन है क्योंकि यही उसका प्राण है। काव्य में आदर्शवाद से अधिक आवश्यक तत्व सौंदर्यवाद है। कवि को सौंदर्य की रक्षा के लिए यथार्थ को त्याग कर कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। यथार्थ कष्टकर होता है। वह सुखद एवं सौंदर्य से परिपूर्ण नहीं बल्कि दुखद \और संतापकारी होता है। काव्य में इन स्थितियों का चित्रण काव्य को सुंदरम् से ही नहीं सत्यम् और शिवम् से भी दूर कर देता है। 

काव्य का सौंदर्य एक सामान्य सौंदर्य न होकर विशेष सौंदर्य दृष्टि है जिसकी स्थिति इस तथ्य पर आधारित है कि वह काव्यत्व को सुरक्षित ही न रखे, अपितु उसकी मर्यादा को अधिक प्रकृष्ट एवं गरिमामय बनाए रहे। कला के अन्य प्रारूप संगीत, चित्र, नत्य, मूर्ति, स्थापत्य आदि की अपनी पृथक प्रकृति एवं विशिष्टताएं हैं। ये संपूर्ण कलाएं सौंदर्य-चिंतन के आधार प्रस्तुत करती हैं, किन्तु सब की अपनी प्रकृतिगत भिन्नताएं हैं। चित्र या मूर्ति कला काव्य के सौंदर्य से प्रत्यक्षतः संबद्ध नहीं हैं। उनका लक्ष्य चित्रात्मकता या मूर्तिमत्ता के वैशिष्टय को सुरक्षित रखना है। अतः संपूर्ण कलाएं अपने आप में आत्म प्रकृति से ही परिचालित होती हैं। सम्भवतः इन कलाओं में काव्य सबसे पृथक है क्योंकि उसका कार्य अपनी सीमा विशेष में सबसे भिन्न है। 

निष्कर्षतः काव्य जीवन को सरस बनाता है। समाज में जीवनोपयोगी तत्वों का समावेश करता है। वह समाज को आदर्श स्थितियों से अवगत कराता है। उसे नीतिगत-रास्तों के अनुगमन की प्रेरणा देता है। सौंदर्य संबंधी उसकी प्राकृतिक प्रवृत्ति की तुष्टि करता है। उसका सत्य से साक्षात्कार करवाता है। अतः काव्य में सत्यम् शिवम् सुंदरम् प्रकारांतर से अवश्य उपस्थिति रहते हैं। ये उच्चतम तात्विक मूल्य सत् चित् आनंद का अन्य स्वरूप है जो काव्य ही नहीं, हमारी संस्कृति के अन्य तत्वों में भी उपस्थित रहते हैं|

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